बात उस समय की है जब बादशाह अकबर दिल्ली पर राज करते थे। अकबर का स्वभाव थोड़ा मज़ाकिया था। कभी-कभी वे दरबारियों और नगर के लोगों से हँसी-मज़ाक भी कर लिया करते थे।
एक दिन अकबर को शरारत सूझी। उन्होंने नगर के बड़े-बड़े सेठों को बुलाया और बोले,
“आज से तुम सब लोगों को रात में नगर की पहरेदारी करनी होगी।”
यह सुनते ही सेठों के होश उड़ गए।
वे आपस में कहने लगे,
“हम तो दुकान चलाने वाले लोग हैं, पहरेदारी कैसे करेंगे?”
घबराए हुए सेठ सीधे बीरबल के पास पहुँचे और अपनी परेशानी बताई।
बीरबल ने उनकी बात ध्यान से सुनी और मुस्कुराते हुए बोले,
“डरो मत, मैं एक उपाय बताता हूँ।”
बीरबल ने सेठों से कहा,
“आज रात तुम सब अपनी पगड़ी पैर में बाँध लो और पायजामा सिर पर पहन लो।
फिर नगर में घूमते रहो और ज़ोर-ज़ोर से कहते रहो —
‘अब तो आन पड़ी है! अब तो आन पड़ी है!’”
सेठों को बात अजीब लगी, लेकिन बीरबल पर भरोसा था।
रात होते ही उन्होंने वैसा ही किया।
उधर बादशाह अकबर भी भेष बदलकर नगर में घूमने निकले थे।
जब उन्होंने सेठों को यह अजीब हाल में देखा, तो पहले तो हँस पड़े।
फिर पास आकर बोले,
“अरे! यह सब क्या तमाशा है?”
सेठों के मुखिया ने हाथ जोड़कर कहा,
“जहाँपनाह, हम तो बचपन से गुड़, तेल और अनाज बेचते आए हैं।
हमें पहरेदारी की समझ कहाँ?
अगर हम पहरेदार होते, तो लोग हमें सेठ क्यों कहते, सिपाही क्यों नहीं कहते?”
यह सुनते ही अकबर समझ गए कि यह सब बीरबल की चाल है।
उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
अकबर हँस पड़े और बोले,
“ठीक है, यह हुक्म वापस लिया जाता है।”
इस तरह बीरबल ने अपनी समझदारी से सेठों को मुश्किल से बचा लिया।
शिक्षा
हर काम हर किसी के बस का नहीं होता।
समझदारी से काम लिया जाए, तो बड़ी समस्या भी हल हो जाती है।
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