मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के सबसे बड़े लेखकों में से एक थे। उन्होंने अपने समय की वास्तविकताओं और समाज की सच्चाइयों को अपने लेखन में बहुत साफ और सच्चाई के साथ पेश किया। उनकी ज़िंदगी और काम की पूरी कहानी उनके बेटे अमृत राय ने अपनी किताब में लिखी है।
छुट्टियाँ जैसे-तैसे खत्म हुईं और नवाब फिर कानपुर लौट आया। वहां उसके पुराने दोस्तों की महफ़िलें शुरू हो गईं। दोस्त मिलकर हँसते, गप्पें मारते और शेर-ओ-शायरी करते। यह सब नवाब के जीवन के खालीपन को थोड़े समय के लिए भर देता था। लेकिन धीरे-धीरे यह मस्ती उसे भारी लगने लगी। उसने सोचना शुरू किया कि कब तक वह इसी तरह अपने जीवन को बिना दिशा के बिताएगा।
नवाब अब पच्चीस साल का हो चुका था। यह उम्र थी जब इंसान का जीवन स्थिर होना चाहिए और घर-परिवार बसाना चाहिए। अकेलेपन ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने महसूस किया कि उसका जीवन केवल हँसी-खुशी और दोस्तों की महफ़िलों तक सीमित नहीं रह सकता। उसे घर और जिम्मेदारी चाहिए थी।
नवाब का मन हमेशा यही सोचता रहा कि वह शादी क्यों करे और किस प्रकार की पत्नी उसे चाहिए। वह चाहता था कि उसकी पत्नी साधारण, घरेलू और समझदार हो। नवाब के लिए कुंआरी लड़कियों की मस्ती और बेफिक्र जिंदगी के मज़े आकर्षक नहीं थे। उसे चाहिए था कि जो भी लड़की उसके साथ रहे, वह उसके जीवन के सुख-दुख दोनों में साथ दे सके।
पंद्रह-सोलह साल की उम्र से ही उसने देखा था कि जिन लड़कों के जीवन में जिम्मेदारी आ जाती है, उनके लिए मस्ती और बेफिक्री का समय बहुत कम होता है। नवाब ने तय कर लिया कि यदि वह शादी करेगा, तो किसी बाल विधवा कन्या से ही करेगा। यह सोच उसके परिवार के लिए नया था। घर की चाची और रिश्तेदार इस विचार से सहमत नहीं थे। समाज और बिरादरी का विरोध भी सामने आ सकता था। लेकिन नवाब ने अपनी सोच और विवेक से तय कर लिया कि उसका निर्णय वही सही होगा, जो उसके लिए उचित है।
किस्मत ने नवाब का साथ दिया। एक दिन उसकी नजर अख़बार में एक इश्तहार पर पड़ी। इसमें लिखा था कि फतेहपुर जिले के सलेमपुर डाकखाने में मुंशी देवीप्रसाद अपनी बाल विधवा कन्या का विवाह करना चाहते हैं। इच्छुक सज्जनों से पत्राचार करने को कहा गया था।
नवाब ने तुरंत उसी पते पर पत्र लिखा। जवाब में उसे पच्चीस-तीस पन्नों का एक किताबचा मिला। इस किताबचे में सिर्फ शादी का ही विवरण नहीं था, बल्कि समाज और कायस्थ समाज की रीति-रिवाज और उनकी परिस्थितियों का पूरा चित्र भी दिखाया गया था। नवाब को यह किताबचा पढ़कर बहुत मज़ा आया। इसमें साफ था कि मुंशी देवीप्रसाद अपनी बेटी शिवरानी का पुनर्विवाह करना चाहते हैं, जो विधवा हो चुकी थी। शिवरानी का पहला विवाह केवल तीन महीने चला था और वह विधवा हो गई थी।
मुंशी देवीप्रसाद समाज में बहुत प्रभावशाली और इज्जतदार व्यक्ति थे। उनके पास ज़्यादा धन नहीं था, लेकिन उनके पास समाज में मान-सम्मान बहुत था। उन्होंने अपने बच्चों का विवाह समय पर कर दिया था। लेकिन छोटी बेटी शिवरानी के विधवा होने के बाद उनका परिवार बहुत दुखी था।
किताबचे में लिखा गया था कि समाज और बिरादरी विरोध कर सकते हैं, लेकिन मुंशी देवीप्रसाद ने तय किया था कि यह विवाह चोरी-छिपे नहीं बल्कि खुले तौर पर होगा। उन्होंने हिंदी और उर्दू में इश्तहार छपवाकर दूर-दूर तक भेजा। यह संदेश था कि कायस्थ समाज में विधवा कन्याओं का पुनर्विवाह सही और सम्मानजनक है।
नवाब ने किताबचे पढ़कर तुरंत अपनी रज़ामंदी भेजी। फिर मुंशी देवीप्रसाद ने नवाब को फतेहपुर बुलाया। जब नवाब वहां पहुँचा, तो ससुर ने भी उसे पसंद किया। शादी का निर्णय तुरंत हो गया। दोनों पक्ष समझ रहे थे कि समाज और बिरादरी का विरोध सहना पड़ेगा।
शादी की तैयारी शुरू हुई। नवाब और शिवरानी दोनों ने अपनी-अपनी तैयारी पूरी की। नवाब को अपने जीवन साथी में सुंदरता कम, बल्कि सादगी और घरेलू समझ चाहिए थी। शिवरानी बिल्कुल वही थी। वह सीधी-सादी, दुबली-पतली, सरल और घरेलू लड़की थी। नवाब को यह बिलकुल पसंद आया।
आख़िरकार, 1906 के फागुन में शिवरात्रि के दिन शादी संपन्न हुई। नवाब के छोटे भाई महताब को छोड़कर कोई रिश्तेदार नहीं था। बस कुछ दोस्त और हमजोली मौजूद थे। मुंशी दयानरायन ख़ास रूप से बारात में शामिल थे।
यह शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं थी। यह समाज की परंपराओं, विधवा कन्याओं के अधिकार और सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम था। नवाब ने अपनी बुद्धिमत्ता और समझ से यह दिखा दिया कि समाज की परंपराओं के बावजूद सही निर्णय लेना संभव है।
शादी के बाद नवाब और शिवरानी का जीवन धीरे-धीरे व्यवस्थित हुआ। नवाब ने पत्नी के साथ मिलकर अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाई और समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी। उनके जीवन में संतुलन आया और परिवार में सुख-शांति रही।
मुंशी प्रेमचंद की यह जीवनी हमें दिखाती है कि वह केवल लेखक नहीं थे, बल्कि समाज के प्रति संवेदनशील, न्यायप्रिय और सुधारक व्यक्ति थे। उनके जीवन और निर्णयों से यह सीख मिलती है कि किसी भी समाजिक दबाव के बावजूद सही और न्यायसंगत निर्णय लेना चाहिए।
कहानी की सीख
- समाज और परंपराओं के विरोध के बावजूद सही निर्णय लेना चाहिए।
- विधवा कन्याओं का पुनर्विवाह सम्मानजनक है और समाज को इसे स्वीकार करना चाहिए।
- व्यक्तिगत विवेक और संवेदनशीलता समाज में सुधार ला सकती है।
- अपने जीवन साथी में सुंदरता से ज्यादा सादगी, समझदारी और घरेलू गुण अहम होते हैं।
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