मेमने के रूप में आया छलावा – पंडित की डरावनी कहानी

मेमने के रूप में आया छलावा – पंडित की डरावनी कहानी

रात का गहरा सन्नाटा था। आसमान में चाँद बादलों के पीछे छिपता-उभरता जा रहा था। दूर-दूर तक फैले खेत और बीच से गुजरता कच्चा जंगल वाला रास्ता किसी अनजाने डर का एहसास करा रहा था। उसी रास्ते से गाँव के पंडित हरिहर शास्त्री अपनी साइकिल से घर लौट रहे थे।

उनके साइकिल के पीछे पूजा का सामान, मिठाई, कपड़े और दक्षिणा का थैला बंधा हुआ था। रात काफी हो चुकी थी — लगभग डेढ़ से दो बजे का समय था।

पंडित जी भगवान का नाम लेते हुए धीरे-धीरे पैडल मारते जा रहे थे।

भूमिका – छलावा क्या होता है?

कहते हैं दुनिया में कुछ ऐसी शक्तियाँ भी होती हैं जो इंसान नहीं होतीं, लेकिन इंसानों के साथ खेल खेलती हैं। ये खेल डर का नहीं, बल्कि धोखे का होता है। ऐसी शक्तियों को गाँवों में छलावा कहा जाता है।

छलावा कभी भी किसी का भी रूप ले सकता है — जानवर, इंसान या कोई जान-पहचान वाली चीज़।

दादाजी और पोते की बातचीत

राजस्थान के नागौर जिले के एक छोटे से गाँव में एक पोता अपने दादाजी से पूछता है —
“दादाजी, छलावा क्या होता है? क्या वो भूत होता है?”

दादाजी मुस्कुराए —
“नहीं बेटा, भूत और छलावा अलग होते हैं। छलावा धोखा देता है, इंसान को फँसाता है।”

फिर दादाजी बोले —
“मैं तुम्हें अपने गाँव की एक सच्ची घटना सुनाता हूँ…”

पंडित हरिहर शास्त्री की कहानी

हरिहर शास्त्री गाँव के सबसे सम्मानित पंडित थे। लोग हर शुभ काम में उन्हें बुलाते थे। उनका जीवन बहुत साधारण था। घर छोटा था, लेकिन घर के बाहर उन्होंने एक छोटा मंदिर बनवाया था जहाँ उनकी पत्नी रोज पूजा करती थी।

उस रात की शुरुआत

एक रात पंडित जी शादी से लौट रहे थे। जंगल के रास्ते से गुजरते समय अचानक उनकी साइकिल के सामने एक छोटा सफेद मेमना आ गया।

उन्होंने तुरंत ब्रेक लगाया।

मेमना बिल्कुल शांत खड़ा था… जैसे उसे डर ही नहीं था।

पंडित जी को वह बहुत प्यारा लगा। उन्हें लगा इसे घर ले जाएँगे तो बच्चे खुश हो जाएंगे।

उन्होंने मेमने को पकड़कर साइकिल के पीछे बाँध लिया।

धीरे-धीरे बदलने लगा खेल

कुछ दूर जाने के बाद साइकिल भारी होने लगी।

पंडित जी ने पीछे मुड़कर देखा…

उनकी साँस रुक गई…

मेमने की जगह अब एक बड़ा चितकबरा बकरा बंधा था।

उनके शरीर में डर की लहर दौड़ गई।
उन्हें समझ आ गया — ये कोई साधारण चीज नहीं… ये छलावा है।

समझदारी से बची जान

पंडित जी ने सोचा —
“अगर अभी भागा तो ये हमला कर देगा।”

उन्होंने भगवान का नाम लेना शुरू किया और धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे।

आखिर वो जंगल पार करके गाँव की सीमा तक पहुँच गए।

मौत से बस कुछ कदम दूर

अब उनका घर सिर्फ 200 मीटर दूर था।
फिर 100 मीटर…
फिर 50 मीटर…

तभी साइकिल अचानक रुक गई।

जैसे पीछे किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो।

साइकिल टूट गई और पंडित जी गिर पड़े।

उन्हें लगा — पीछे कोई बड़ा जानवर खड़ा है।

वो जान बचाकर घर की तरफ भागे।

पीछे से भारी कदमों की आवाज आ रही थी।

घर पहुँचकर देखा असली रूप

उन्होंने दरवाजा पीटना शुरू किया।

पत्नी ने दरवाजा खोला।
पंडित जी अंदर आ गए।

खिड़की से बाहर देखा —
बाहर एक बड़ा काला भैंसा खड़ा था… गुस्से में।

मंदिर ने बचाई जान

कुछ देर बाद भैंसा गायब हो गया।

तभी पंडित जी की नजर घर के बाहर बने मंदिर पर गई।

उन्हें समझ आ गया —
मंदिर की वजह से वो शैतानी शक्ति अंदर नहीं आ सकी।

कहानी का संदेश

दादाजी ने पोते से कहा —
“बेटा, अच्छे कर्म और भगवान पर विश्वास इंसान की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।”

पोता डर भी गया… लेकिन उसे कहानी सुनकर मज़ा भी आया।

और उसने कहा —
“दादाजी… एक कहानी और सुनाओ…”

दादाजी मुस्कुरा दिए।

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