आँखें – एक अधूरी मोहब्बत की कहानी

आँखें – एक अधूरी मोहब्बत की कहानी

यह कहानी उन भावनाओं की है जो कभी पूरी नहीं हो पातीं… लेकिन दिल में हमेशा ज़िंदा रहती हैं। यह कहानी है हनीफा की… और उस इंसान की… जिसे उसकी आँखों से मोहब्बत हो गई थी।

मुझे हमेशा से अस्पतालों से नफ़रत रही है। वहाँ की गंध, वहाँ का माहौल, लोगों के चेहरे — सब कुछ मुझे बेचैन कर देता है। लेकिन उस दिन मुझे मजबूरी में अस्पताल जाना पड़ा। मेरा एक करीबी रिश्तेदार ऑपरेशन के बाद जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। मेरी पत्नी के बार-बार कहने पर मुझे उसे देखने जाना पड़ा।

मैं अस्पताल के जनरल वार्ड के बरामदे में खड़ा था कि तभी मैंने उसे देखा।

वह बुर्का पहने हुए थी… लेकिन नकाब उठा हुआ था। उसके हाथ में दवा की बोतल थी। उसके साथ एक छोटा लड़का था। लेकिन मेरी नज़र उसके चेहरे पर नहीं… उसकी आँखों पर जाकर ठहर गई।

मैं यह नहीं कहूँगा कि उसकी आँखें बहुत खूबसूरत थीं।

नहीं।

लेकिन उनमें कुछ ऐसा था… जो दिल को खींच ले।

वो न पूरी काली थीं… न भूरी… न नीली… न हरी।
लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी… जैसे अंधेरी रात में अचानक कार की हेडलाइट जल जाए।

वह धीरे-धीरे चल रही थी। अचानक उसने उस लड़के का हाथ कसकर पकड़ा और बोली —
“तुमसे चला नहीं जाता क्या?”

लड़का झुंझलाकर बोला —
“चल तो रहा हूँ… तू तो अंधी है!”

यह सुनकर मैं चौंक गया।

मैंने फिर उसकी आँखों को देखा।

और पता नहीं क्यों… मैं उसकी तरफ खिंचता चला गया।

वह मेरे पास आई और बोली —
“एक्स-रे कहाँ होता है?”

संयोग से मेरा एक दोस्त एक्स-रे विभाग में काम करता था। मैंने तुरंत कहा —
“आओ… मैं ले चलता हूँ।”

वह मेरे साथ चल दी।

एक्स-रे रूम के बाहर भीड़ थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से गुस्से की आवाज आई… लेकिन जब मेरे दोस्त ने दरवाज़ा खोला और मुझे देखा, तो अंदर बुला लिया।

कुछ देर बाद कमरे में सिर्फ हम दोनों रह गए।

डॉक्टर ने पूछा —
“क्या परेशानी है?”

वह बोली —
“मुझे नहीं पता… मोहल्ले के डॉक्टर ने एक्स-रे कराने को कहा।”

जब डॉक्टर ने उसे मशीन के पास बुलाया —
वह टकरा गई।

डॉक्टर झुंझला गया —
“दिखाई नहीं देता क्या?”

वह चुप रही।

जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा —
“छाती बिल्कुल साफ है।”

फिर उसने नाम पूछा।

वह बोली —
“मेरा नाम हनीफा है।”

हनीफा।

नाम सुनते ही मुझे लगा जैसे यह नाम मैंने पहले भी कहीं सुना हो… या शायद मैं सुनना चाहता था।

वह बाहर निकली।

मैं उसके पीछे चला गया।

पता नहीं क्यों।

शायद उसकी आँखों की वजह से।

ताँगे के अड्डे पर मैंने पूछा —
“कहाँ जाना है?”

उसने एक गली का नाम लिया।

मैंने झूठ बोल दिया —
“मुझे भी उधर ही जाना है… मैं छोड़ देता हूँ।”

ताँगे में बैठते समय जब मैंने उसका हाथ पकड़ा…
मुझे लगा जैसे मैं उसकी हड्डियों तक देख सकता हूँ… लेकिन उसकी आँखें…
वो पूरी तरह ज़िंदा थीं।

ताँगा चल पड़ा।

हम बातें करने लगे।

उसने कहा —
“हम भी कश्मीरी हैं।”

मैंने कहा —
“अच्छा!”

वह मुस्कुराई।

और उसकी आँखें… और गहरी हो गईं।

रास्ते में कई बार झटके लगे। उसका सिर मेरे कंधे से टकराता। मेरा मन करता उसे संभाल लूँ… लेकिन मैं चुप रहा।

जब उसका घर आया…
ताँगा रुका।

मैंने कहा —
“घर आ गया।”

वह बोली —
“बदरू कहाँ है?”

मैंने कहा —
“यहीं है।”

फिर उसने लड़के से कहा —
“मुझे उतार दो।”

लड़के ने उसका हाथ पकड़ा… और धीरे-धीरे नीचे उतारा।

मैं हैरान रह गया।

मैंने लड़के से पूछा —
“ये खुद क्यों नहीं उतरती?”

लड़का बोला —
“इन्हें दिखाई नहीं देता… ये देख नहीं सकतीं।”

उस पल…

मुझे लगा जैसे किसी ने मेरा दिल पकड़ कर दबा दिया हो।

मैं जिन आँखों पर फिदा था…

वो दुनिया को देख ही नहीं सकती थीं।

उस दिन के बाद…

मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा।

लेकिन आज भी…

जब कभी अंधेरे में अचानक कोई रोशनी चमकती है…

मुझे उसकी आँखें याद आ जाती हैं।

सीख

कभी-कभी हम जिस चीज़ से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं…
उसकी सच्चाई हमें सबसे ज्यादा तोड़ देती है।

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