बात उस समय की है जब दिल्ली पर बादशाह अकबर राज करते थे। अकबर के दरबार में बीरबल सबसे समझदार और तेज़ दिमाग वाले मंत्री माने जाते थे। राजा अकबर भी बीरबल की बुद्धि के बहुत कायल थे और हर मुश्किल काम में उसी से सलाह लेते थे।
लेकिन अकबर के साले साहब को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी। उन्हें हमेशा लगता था कि बीरबल की जगह उन्हें मंत्री बनना चाहिए। वे अकबर की बेगम के भाई थे, इसलिए अकबर भी उन्हें सीधा मना नहीं कर पाते थे।
एक दिन अकबर ने सोचा,
“चलो, एक ऐसा काम दिया जाए जिससे साले की अक्ल भी परख ली जाए।”
अकबर ने अपने साले को बुलाया और एक कोयले से भरी बोरी देकर कहा,
“अगर तुम यह बोरी हमारे राज्य के सबसे चालाक और लालची सेठ, सेठ दमड़ीलाल, को बेच सको, तो मैं तुम्हें बीरबल की जगह मंत्री बना दूँगा।”
यह सुनकर अकबर का साला हैरान रह गया। वह जानता था कि सेठ दमड़ीलाल बहुत चालाक आदमी है। फिर भी वह बोरी लेकर सेठ के पास चला गया।
सेठ ने बोरी देखी और हँसते हुए बोला,
“अरे! इस बेकार कोयले के बदले मैं एक पैसा भी नहीं दूँगा।”
साले साहब बहुत कोशिश करते रहे, लेकिन सेठ टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार हार मानकर वे खाली हाथ महल लौट आए।
अब अकबर ने वही काम बीरबल को सौंप दिया।
बीरबल मुस्कुराए और बोले,
“जहाँपनाह, मैं सिर्फ यह पूरी बोरी ही नहीं, बल्कि कोयले का एक छोटा-सा टुकड़ा भी दस हज़ार में बेच दूँगा।”
यह कहकर बीरबल काम पर निकल पड़े।
सबसे पहले उन्होंने एक बढ़िया दर्जी से महँगा कुर्ता सिलवाया, गले में चमकदार माला पहनी, नई जूती पहनी और कोयले को बारीक पीसकर सुरमे जैसा बना लिया। फिर उस कोयले को एक छोटी-सी सुंदर डिब्बी में भर लिया।
अब बीरबल ने अपना भेष बदल लिया और शहर में यह खबर फैला दी कि
“बगदाद से एक बड़े शेख आए हैं, जिनके पास चमत्कारी सुरमा है। यह सुरमा लगाने से अपने पूर्वज दिखाई देते हैं और छिपा हुआ धन भी पता चल जाता है।”
यह खबर पूरे शहर में फैल गई।
सेठ दमड़ीलाल ने जब यह सुना, तो उसके मन में लालच आ गया। उसने सोचा,
“जरूर मेरे पूर्वजों ने कहीं धन छिपाया होगा।”
वह तुरंत शेख बने बीरबल के पास पहुँचा।
बीरबल ने सुरमे की कीमत बीस हज़ार बताई। काफी मोलभाव के बाद दस हज़ार में सौदा तय हो गया।
लेकिन सेठ चालाक था। उसने कहा,
“मैं अभी सुरमा लगाऊँगा। अगर कुछ नहीं दिखा, तो पैसे वापस लूँगा।”
बीरबल ने कहा,
“बिल्कुल, शहर के चौराहे पर सबके सामने लगा लीजिए।”
चौराहे पर भीड़ जमा हो गई।
बीरबल ने ऊँची आवाज़ में कहा,
“अगर सेठ सच्चे और ईमानदार परिवार की औलाद हैं, तो उन्हें उनके पूर्वज दिखाई देंगे। लेकिन अगर कहीं भी बेईमानी हुई होगी, तो कुछ भी नहीं दिखेगा।”
यह सुनकर सेठ घबरा गया।
बीरबल ने उसकी आँखों में सुरमा लगा दिया।
सेठ ने आँखें खोलीं…
कुछ नहीं दिखा।
अब सेठ क्या करता?
सबके सामने अपनी इज्जत बचाने के लिए उसने तुरंत दस हज़ार रुपये बीरबल को दे दिए और चुपचाप वहाँ से चला गया।
बीरबल सीधे अकबर के पास पहुँचे और सारी बात बता दी।
अकबर ज़ोर से हँस पड़े।
अकबर का साला यह सब देखकर चुपचाप अपने घर लौट गया।
उस दिन के बाद उसने कभी बीरबल की जगह लेने की बात नहीं की।
शिक्षा
अक्ल और समझ का कोई मुकाबला नहीं होता।
चालाकी से बड़ा हथियार बुद्धि होती है।
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