बहुत समय पहले नारायणगढ़ नाम का एक छोटा सा लेकिन बहुत सुंदर गाँव था। चारों तरफ हरे-भरे पेड़, साफ रास्ते और खुशहाल लोग रहते थे। इस गाँव की सबसे खास बात थी वहाँ की पाठशाला। दूर-दूर के गाँवों से बच्चे यहाँ पढ़ने आते थे। यहाँ पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थी, बल्कि खेल, कहानियों और मजेदार तरीकों से बच्चों को सिखाया जाता था। इसलिए हर कक्षा में हँसी की आवाज गूंजती रहती थी।
लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। बच्चों के चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं रही। वे चुप-चुप रहने लगे। कई बच्चे गृहकार्य से डरने लगे। कुछ बच्चे बहाने बनाने लगे — कोई कहता सिर दर्द है, कोई कहता किताब खो गई। रात को बच्चों को डरावने सपने आने लगे। कोई अंधेरे जंगल में खो जाता, कोई ऊँची इमारत से गिरता, तो कोई गुस्से वाले अध्यापक से डरता।
इसी स्कूल में कक्षा पाँच में पढ़ने वाली एक होशियार और समझदार लड़की थी — सरगम। वह पढ़ाई में अच्छी थी, लेकिन कुछ दिनों से वह भी डरी-डरी रहने लगी थी। एक रात वह अपनी माँ के पास आई और धीरे से बोली,
“माँ, मुझे अब पढ़ाई से डर लगता है। लगता है जैसे किताब खोलते ही कोई मुझे देख रहा हो। और रात को एक काली छाया मेरे सपनों में आती है।”
माँ ने उसे प्यार से गले लगाया और बोली,
“बेटा, यह सिर्फ सपना नहीं है। यह काली परी का असर है। काली परी तब आती है जब बच्चों के मन में डर, आलस, झूठ और जलन घर कर जाते हैं।”
सरगम घबरा गई।
“क्या सच में काली परी होती है?”
माँ मुस्कराईं और बोलीं,
“हाँ, लेकिन उससे भी ज्यादा ताकतवर एक सफ़ेद परी भी होती है। वह तब आती है जब बच्चे मेहनत, सच्चाई और हिम्मत को अपनाते हैं।”
सरगम ने पूछा,
“क्या वह मेरी मदद करेगी?”
माँ ने कहा,
“ज़रूर, लेकिन पहले तुम्हें खुद कोशिश करनी होगी। डर से भागना नहीं, उसका सामना करना होगा।”
उस रात सरगम बहुत देर तक सोचती रही। उसने तय किया कि अब वह पढ़ाई से नहीं डरेगी। अगले दिन से उसने अपनी आदतें बदलनी शुरू कर दीं। वह समय पर स्कूल जाने लगी, ध्यान से पढ़ाई करने लगी और घर आकर खुद ही गृहकार्य करने बैठ जाती। जो सवाल समझ नहीं आता, वह पूछ लेती। धीरे-धीरे उसे पढ़ाई मजेदार लगने लगी।
एक रात फिर वही काली छाया उसके सपने में आई। उसने कहा,
“पढ़ाई छोड़ दो, चलो खेलते हैं, मज़े करते हैं। पढ़ना बहुत बोरिंग है।”
सरगम थोड़ी डर गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। तभी अचानक चारों तरफ तेज रोशनी फैल गई। एक सुंदर सफ़ेद परी उसके सामने आ गई। उसके पंख चमक रहे थे और उसके हाथ में चमकती छड़ी थी।
परी बोली,
“सरगम, तुमने डर को हराने की कोशिश की है। इसलिए मैं तुम्हारी मदद करने आई हूँ।”
उसने अपनी छड़ी घुमाई और काली छाया धीरे-धीरे गायब हो गई।
फिर सफ़ेद परी सरगम को एक जादुई जगह पर ले गई। वहाँ बहुत सुंदर बगीचा था। रंग-बिरंगे फूल थे, चहकते पक्षी थे, और बहुत सारे बच्चे खुशी-खुशी कुछ नया सीख रहे थे। कोई किताब पढ़ रहा था, कोई खेल-खेल में गणित सीख रहा था, कोई विज्ञान के प्रयोग कर रहा था।
सरगम ने पूछा,
“ये बच्चे कौन हैं?”
परी बोली,
“ये वे बच्चे हैं जो सीखने से नहीं डरते। जो सवाल पूछते हैं और मेहनत करते हैं।”
सरगम बहुत खुश हुई। सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह पहले से ज्यादा खुश और आत्मविश्वासी थी।
अब उसने अपने दोस्तों की भी मदद करनी शुरू की। उसने उन्हें काली परी और सफ़ेद परी की कहानी सुनाई। धीरे-धीरे बाकी बच्चों का डर भी खत्म होने लगा। अब फिर से स्कूल में हँसी लौट आई।
नारायणगढ़ की पाठशाला फिर से खुशियों से भर गई। बच्चे अब सपने देखने से नहीं डरते थे, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करते थे।
इस कहानी से यह सीख मिलती है कि डर, आलस और झूठ हमारे मन को कमजोर बनाते हैं। लेकिन मेहनत, सच्चाई और आत्मविश्वास हमें मजबूत बनाते हैं। पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि सपनों तक पहुँचने का रास्ता है।
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