साधु-संतों का सत्संग अक्सर लोगों का जीवन सुधार देता है, लेकिन पयाग के साथ उल्टा ही हुआ। वह मेहनती और हँसमुख युवक था, पर धीरे-धीरे उसे गाँजा, चरस और भांग की बुरी लत लग गई। काम-धंधे से उसका मन हट गया और आलस्य उसकी आदत बन गया। जो युवक पहले हर काम के लिए तैयार रहता था, वही अब नशे और मस्ती की दुनिया में खोया रहने लगा।
सत्संग का उल्टा असर
गाँव के बाहर एक बड़े वट-वृक्ष के नीचे अक्सर साधुओं की धूनी जलती रहती थी। जटाधारी महात्मा बैठे रहते, भक्तजन घेरा बनाए रहते और चिलम के दम पर दम लगता रहता। बीच-बीच में भजन भी होता। पयाग का काम चिलम भरना था, और इसी बहाने उसे नशे का पहला कश मिल जाता।
भक्त लोग परलोक के पुण्य की आशा रखते थे, लेकिन पयाग को तुरंत मिलने वाला सुख ही सबसे प्रिय था। धीरे-धीरे वह उसी दुनिया में रम गया। उसे लगता मानो वह सुगंध, संगीत और रोशनी से भरी किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया हो।
घर की जिम्मेदारियाँ और बढ़ती दूरी
जब उसकी पत्नी रुक्मिन रात को उसे बुलाने आती, तो पयाग को बड़ा बुरा लगता। घर की जिम्मेदारियाँ उसे बोझ लगतीं। वह गाँव का चौकीदार था — महीने में थोड़ी-सी तनख्वाह मिलती थी और हफ्ते में एक दिन थाने पर जाकर छोटे-मोटे काम करने पड़ते थे।
पहले पति-पत्नी दोनों मेहनत करके घर चलाते थे। रुक्मिन लकड़ियाँ बेचती और पयाग खेत-मजूरी करता। किसी तरह गुज़ारा हो जाता था। लेकिन अब पयाग की कमाई बंद हो चुकी थी और घर की हालत धीरे-धीरे खराब होने लगी।
पति-पत्नी में तकरार
एक दिन रुक्मिन बाज़ार से लौटी तो पयाग ने पैसे माँगे—
“ला, कुछ पैसे दे दे, दम लगा आऊँ।”
रुक्मिन ने तुनककर कहा—
“इतनी ही चाट है तो काम क्यों नहीं करते?”
दोनों में तीखी नोकझोंक हुई। पयाग नाराज़ होकर घर से चला गया। रुक्मिन ने सोचा, थोड़ी देर में लौट आएगा। लेकिन जब वह अगले दिन भी नहीं आया, तो उसे चिंता होने लगी।
सौत का आगमन
सुबह-सुबह जब रुक्मिन थाने जाने को निकली, तभी उसने देखा— पयाग लौट रहा है… और उसके पीछे एक घूँघट वाली औरत भी है।
रुक्मिन का दिल धक से रह गया। पर उसने अपने दिल पर पत्थर रखकर उस औरत को घर के अंदर ले आई। उस नई स्त्री का नाम कौशल्या था, जिसे लोग सिलिया कहते थे।
पयाग ने हँसकर कहा—
“घर का काम करेगी, पड़ी रहेगी।”
रुक्मिन ने मन मसोसकर सब सह लिया। वह बाहर मेहनत करती और सिलिया को आराम देती रही। गाँव भर में उसकी सहनशीलता की चर्चा होने लगी।
घर में छिड़ी होड़
कुछ दिनों बाद सिलिया को घर बैठना अखरने लगा। उसने भी काम पर जाने की ठान ली। वह बहुत मेहनती निकली— सुबह चक्की पीसती, दिन में घास काटती, बाज़ार जाती और अच्छा पैसा कमाने लगी।
अब घर की बागडोर धीरे-धीरे उसके हाथ में आने लगी। पयाग भी उसी की तरफ झुकने लगा, क्योंकि वह ज्यादा पैसे लाती थी।
रुक्मिन के मन में जलन बढ़ने लगी। दोनों के बीच तकरार बढ़ती गई और एक दिन बात हाथापाई तक पहुँच गई।
मारपीट और टूटता घर
शाम को जब पयाग लौटा, तो सिलिया ने रो-रोकर अपनी शिकायत सुनाई। पहले से झल्लाया हुआ पयाग गुस्से में रुक्मिन पर टूट पड़ा और उसे बुरी तरह पीट दिया।
रुक्मिन ने दर्द सह लिया, लेकिन उसकी आत्मा भीतर से जल उठी। रात होते-होते वह चुपचाप घर से निकल गई।
विनाश की आग
उस समय खेतों में फसल पक कर तैयार खड़ी थी। पयाग रोज़ की तरह खेत की मड़ैया में सोने गया। रास्ते में उसने देखा— उसकी मड़ैया में आग लगी हुई है!
तेज़ हवा चल रही थी। अगर आग फैलती, तो पूरे गाँव की फसल जलकर राख हो जाती।
पयाग के होश उड़ गए। उसने बिना सोचे-समझे जलती हुई मड़ैया को लाठी पर उठाया और सिर पर रखकर गाँव से दूर ले जाने के लिए दौड़ पड़ा।
जलती फूस उसके शरीर पर गिर रही थी, हाथ जल रहे थे, मगर वह रुका नहीं। उसे बस एक ही चिंता थी— गाँव बच जाना चाहिए।
रुक्मिन का अंतिम बलिदान
अचानक एक स्त्री दौड़ती हुई आई— वह रुक्मिन थी।
उसने बिना एक पल गंवाए जलती मड़ैया अपने हाथों पर ले ली ताकि पयाग बच सके।
पयाग वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा।
रुक्मिन जलती हुई मड़ैया लेकर कुछ कदम चली, पर उसके हाथ, चेहरा और कपड़े आग में घिर गए।
वह गिर पड़ी… और देखते ही देखते अग्नि ने उसे अपने भीतर समा लिया।
रुक्मिन ने सचमुच अग्नि-समाधि ले ली।
दुखद अंत
जब पयाग को होश आया, उसने रुक्मिन की अधजली देह देखी और फूट-फूटकर रो पड़ा।
गाँव वाले उसे घर ले गए, उसका इलाज हुआ— लेकिन वह बच न सका।
जिस आग से वह गाँव को बचाना चाहता था, उसी आग और पछतावे की ज्वाला ने अंततः उसकी जीवन-लीला समाप्त कर दी।
कहानी से सीख
- बुरी संगति इंसान का जीवन बिगाड़ देती है।
- लालच और नशा परिवार को तोड़ देते हैं।
- सच्चा प्रेम त्याग में दिखाई देता है।
- क्रोध में किया गया अन्याय अंततः पछतावा बनकर लौटता है।
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