भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला पावन पर्व हरछठ (हलषष्ठी) माताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख और रक्षा के लिए व्रत रखती हैं और हरछठ माता की पूजा करती हैं। उत्तर प्रदेश और खासकर अवध क्षेत्र में Halshashthi Vrat Katha, Harchat ki kahani और Harchat ki katha बड़े श्रद्धा भाव से सुनी और सुनाई जाती है।
नीचे दी गई कथा सरल भाषा में प्रस्तुत है ताकि हर कोई इसे आसानी से समझ सके।
राजा का सगरा – हरछठ की अवधी लोककथा
बहुत समय पहले एक राजा थे। उन्होंने अपने राज्य में एक बहुत बड़ा सगरा (तालाब) खुदवाया और उसके चारों ओर सुंदर घाट बनवाए। सब कुछ तैयार हो गया, लेकिन बड़ी परेशानी यह थी कि उस सगरे में पानी ही नहीं भर रहा था। राजा बहुत चिंतित हो गए।
उन्होंने गांव के पुरोहित को बुलाकर उपाय पूछा। पंडित ने काफी सोच-विचार के बाद कहा, “राजन, उपाय तो है, लेकिन बहुत कठिन है।” राजा ने घबराकर पूछा, “बताइए, चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो।”
पंडित बोला, “यदि आप अपने बड़े बेटे की संतान की बलि दे दें, तो सगरा पानी से भर जाएगा।”
यह सुनकर राजा के होश उड़ गए। वे सोच में पड़ गए—कौन सी मां अपने बच्चे की बलि देगी? लेकिन चिंता इतनी बड़ी थी कि उन्होंने एक चाल चली। उन्होंने अपनी बहू को यह कहकर मायके भेज दिया कि उसकी मां की तबीयत बहुत खराब है।
बहू हरछठ का व्रत रखे हुए थी। वह रोती-बिलखती मायके पहुंची। वहां उसकी मां ने उसे स्वस्थ देखकर पूछा, “बिटिया, हम तो ठीक हैं, तुम इतनी घबराई क्यों हो?” तब मां को शक हुआ और उसने सारा भेद समझ लिया। उसने तुरंत बेटी से कहा, “तुम्हारे साथ छल हुआ है, जल्दी वापस जाओ।”
बहू हरछठ माता को याद करती हुई भागी-भागी वापस लौटी। रास्ते में उसने देखा कि वही सूखा सगरा अब लबालब पानी से भरा हुआ है। कमल के पत्ते लहरा रहे थे और किनारे एक छोटा बालक खेल रहा था।
पास जाकर उसने देखा—वह तो उसका अपना बेटा था!
वह खुशी से रो पड़ी, बच्चे को सीने से लगा लिया और हरछठ माता का धन्यवाद करने लगी। घर पहुंचकर उसने सास-ससुर को सारी बात बताई। यह चमत्कार देखकर सबकी आंखें भर आईं। वे बहू के चरणों में गिर पड़े और हरछठ माता का गुणगान करने लगे।
कहा जाता है कि हरछठ माता की कृपा से ही उस दिन बालक की रक्षा हुई।
हलषष्ठी व्रत कथा – ग्वालिन की सीख
प्राचीन समय में एक ग्वालिन (दूध बेचने वाली) रहती थी। उसका प्रसवकाल बहुत नजदीक था, लेकिन उसे दूध-दही बेचने की चिंता ज्यादा थी। उसने सोचा कि अगर अभी प्रसव हो गया तो उसका सामान खराब हो जाएगा।
वह दूध-दही के घड़े लेकर निकल पड़ी। रास्ते में उसे तेज प्रसव पीड़ा हुई और वह एक झरबेरी की झाड़ी के पास रुक गई। वहीं उसने एक बच्चे को जन्म दिया और उसे वहीं छोड़कर दूध बेचने चली गई।
उस दिन हल षष्ठी का व्रत था। ग्वालिन ने लालच में आकर गाय-भैंस के मिले दूध को केवल भैंस का दूध बताकर बेच दिया, जो कि उस दिन धर्म के विरुद्ध माना जाता है।
उधर खेत में हल जोत रहे एक किसान के बैल अचानक भड़क गए और हल का फल गलती से उस बच्चे को लग गया, जिससे बालक की मृत्यु हो गई। किसान बहुत दुखी हुआ। उसने झरबेरी के कांटों से बच्चे के पेट को सिलकर वहीं रख दिया और चला गया।
कुछ देर बाद जब ग्वालिन लौटी तो अपने बच्चे की हालत देखकर उसका कलेजा फट गया। उसे तुरंत समझ आ गया कि यह उसके झूठ और लालच का परिणाम है।
वह पश्चाताप से भर उठी। वह उसी गांव में वापस गई और गली-गली घूमकर अपनी गलती सबको बताने लगी। गांव की स्त्रियों ने उसकी सच्ची पश्चाताप भावना देखकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।
जब वह फिर झरबेरी के पास पहुंची तो आश्चर्य से भर गई—उसका बच्चा जीवित था!
उस दिन से ग्वालिन ने प्रण लिया कि वह जीवन में कभी झूठ नहीं बोलेगी।
हलषष्ठी (हरछठ) व्रत का महत्व
हलषष्ठी व्रत मातृत्व, सत्य और संतान की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएँ—
- बच्चों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं
- हल से जोती हुई चीजें नहीं खातीं
- हरछठ माता की कथा सुनती हैं
- सत्य और धर्म का पालन करने का संकल्प लेती हैं
इस व्रत की कथाएँ हमें सिखाती हैं कि मां की श्रद्धा, सच्चा पश्चाताप और ईश्वर पर विश्वास से बड़ी से बड़ी विपत्ति टल सकती है।
सीख (Moral)
हलषष्ठी व्रत कथा हमें यह संदेश देती है कि—
- मातृ प्रेम सबसे शक्तिशाली होता है
- छल और झूठ का फल हमेशा बुरा होता है
- सच्चे मन से की गई प्रार्थना जरूर सुनी जाती है
- हरछठ माता अपने भक्तों की रक्षा करती हैं
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