बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में एक गरीब लेकिन मेहनती लकड़हारा रहता था। वह रोज सुबह जंगल में जाता, पेड़ काटता और लकड़ियाँ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था। उसकी जिंदगी भले ही साधारण थी, लेकिन वह बहुत ईमानदार और सीधा-सादा इंसान था।
एक दिन की बात है। लकड़हारा रोज की तरह जंगल में लकड़ी काटने गया। दोपहर होते-होते वह नदी के किनारे एक बड़े पेड़ को काटने लगा। नदी गहरी थी और उसका पानी तेज़ी से बह रहा था। लकड़हारा सावधानी से काम कर ही रहा था कि अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी फिसल गई और सीधे नदी में जा गिरी।
कुल्हाड़ी गिरते ही लकड़हारे के होश उड़ गए। वह घबरा कर नदी के किनारे बैठ गया। उसने कई बार पानी में उतरकर अपनी कुल्हाड़ी ढूँढने की कोशिश की, लेकिन नदी बहुत गहरी थी। थक-हारकर वह किनारे बैठ गया और दुखी होकर रोने लगा। उसे चिंता सताने लगी कि अब वह अपने परिवार का पेट कैसे भरेगा।
उसी समय वहाँ से एक देवदूत गुजर रहा था। उसने लकड़हारे को उदास बैठे देखा तो उसे उस पर दया आ गई। देवदूत उसके पास आया और प्यार से बोला,
“भाई, तुम इतने दुखी क्यों हो?”
लकड़हारे ने रोते हुए सारी बात बता दी। यह सुनकर देवदूत मुस्कुराया और बोला,
“चिंता मत करो, मैं अभी तुम्हारी कुल्हाड़ी ढूँढकर लाता हूँ।”
यह कहकर देवदूत नदी में कूद गया। कुछ ही देर बाद वह पानी से बाहर आया। उसके हाथ में चमचमाती सोने की कुल्हाड़ी थी। उसने लकड़हारे से पूछा,
“क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”
लकड़हारे ने कुल्हाड़ी को ध्यान से देखा और तुरंत सिर हिलाकर बोला,
“नहीं देवदूत जी, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी।”
देवदूत लकड़हारे की ईमानदारी देखकर खुश हुआ। वह फिर से नदी में डुबकी लगाकर गया। इस बार वह चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया और बोला,
“लो, क्या यह तुम्हारी है?”
लकड़हारे ने फिर विनम्रता से कहा,
“नहीं महाराज, यह भी मेरी नहीं है।”
देवदूत अब बहुत प्रसन्न हुआ। वह तीसरी बार नदी में उतरा और इस बार एक साधारण लोहे की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया। कुल्हाड़ी देखते ही लकड़हारे का चेहरा खिल उठा। वह खुशी से बोला,
“हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है।”
लकड़हारे की सच्चाई और ईमानदारी देखकर देवदूत बहुत प्रभावित हुआ। उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“तुम बहुत ईमानदार इंसान हो। तुम्हारी इसी सच्चाई से मैं प्रसन्न हूँ।”
इसके बाद देवदूत ने उसे उसकी लोहे की कुल्हाड़ी तो वापस दी ही, साथ में सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ भी इनाम में दे दीं।
लकड़हारा देवदूत को धन्यवाद देता हुआ खुशी-खुशी अपने घर लौट गया। उस दिन के बाद उसकी गरीबी भी काफी हद तक दूर हो गई, लेकिन उसने अपनी ईमानदारी कभी नहीं छोड़ी।
शिक्षा (Moral of the Story)
ईमानदारी से बढ़कर दुनिया में कोई दौलत नहीं होती।
सच्चा इंसान देर से सही, लेकिन उसका फल हमेशा मीठा मिलता है।
