बहुत समय पहले की बात है। एक घना-सा जंगल था, जहाँ तरह-तरह के जानवर रहते थे। उसी जंगल में एक बहुत चालाक लोमड़ी रहती थी। वह अपनी मीठी-मीठी बातों और चालाक दिमाग से अक्सर दूसरे जानवरों को फँसा लेती थी। कोई उसे समझ नहीं पाता था, और लोमड़ी हर बार अपना काम निकाल लेती थी।
उसी जंगल में एक शान्त और समझदार पक्षी रहता था — सारस। उसकी टाँगें लंबी थीं और चोंच भी बहुत लंबी थी। सारस सीधा-सादा था और किसी का बुरा नहीं सोचता था। एक दिन लोमड़ी की नज़र सारस पर पड़ी। उसने सोचा,
“अगर इस सारस को दोस्त बना लिया जाए, तो मज़ा आएगा।”
लोमड़ी बड़ी चालाक थी। वह सारस के पास गई और बोली,
“मित्र सारस, तुम कितने अच्छे हो। क्यों न हम दोनों दोस्त बन जाएँ?”
सारस ने खुशी-खुशी दोस्ती स्वीकार कर ली। कुछ दिनों बाद लोमड़ी ने सारस को अपने घर खाने पर बुलाया। सारस बहुत खुश हुआ और तय समय पर लोमड़ी के घर पहुँच गया।
लोमड़ी ने खाने में सूप बनाया था। लेकिन उसने सूप दो सपाट तश्तरियों में परोसा। लोमड़ी बड़े आराम से सूप चाटने लगी।
वह बोली,
“मित्र सारस, बताओ सूप कैसा लगा?”
बेचारा सारस तश्तरी में सूप देखता ही रह गया। उसकी लंबी चोंच तश्तरी में सूप पी ही नहीं पा रही थी। उसे बहुत बुरा लगा, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। शान्त रहते हुए बोला,
“सूप तो अच्छा लग रहा है, लेकिन आज मेरा पेट ठीक नहीं है।”
इतना कहकर सारस चुपचाप वहाँ से चला गया। लोमड़ी मन-ही-मन हँसती रही। उसे लगा कि उसने बड़ा मज़ाक किया है।
कुछ दिन बीत गए। अब बारी सारस की थी। उसने लोमड़ी को अपने घर खाने का न्योता दिया। लोमड़ी बिना कुछ सोचे-समझे खुशी-खुशी पहुँच गई।
सारस ने भी स्वादिष्ट सूप बनाया था। लेकिन इस बार उसने सूप लंबी और सँकरे मुँह वाली सुराहियों में परोसा। सारस अपनी लंबी चोंच सुराही में डालकर आराम से सूप पीने लगा।
पीते-पीते सारस ने कहा,
“मित्र लोमड़ी, यह सूप मैंने खास तुम्हारे लिए बनाया है। खूब मज़े से खाओ।”
अब लोमड़ी की बारी थी। वह सुराही में मुँह डालने की कोशिश करती रही, लेकिन उसका मुँह अंदर जा ही नहीं पाया। वह चाहकर भी सूप का एक घूँट नहीं पी सकी।
थोड़ी ही देर में लोमड़ी को अपनी गलती याद आ गई। उसे समझ आ गया कि उसने पहले सारस के साथ जो चाल चली थी, आज वही उसके साथ हो रही है। उसे बहुत शर्म आई। सिर झुकाकर वह बिना कुछ कहे वहाँ से चली गई।
उस दिन के बाद लोमड़ी ने कभी किसी के साथ चालाकी नहीं की।
शिक्षा (Moral of the Story)
जैसे को तैसा।
जो व्यवहार हम दूसरों के साथ करते हैं, वही व्यवहार एक दिन हमारे पास लौटकर ज़रूर आता है।
