बहुत समय पहले की बात है। दो छोटे-छोटे गाँव थे और उन दोनों गाँवों के बीच एक घना जंगल पड़ता था। उस जंगल में बहुत सारे शरारती बंदर रहते थे। पास के एक गाँव में एक मेहनती आदमी रहता था, जिसका काम रंग-बिरंगी टोपियाँ बेचने का था। लोग उसे प्यार से टोपीवाला कहते थे।
टोपीवाला हर सुबह जल्दी उठता, अपनी बड़ी टोकरी में अलग-अलग रंगों की टोपियाँ सजाकर रखता और उन्हें सिर पर लादकर गाँव-गाँव बेचने निकल पड़ता। वह बहुत ईमानदार और मेहनती था। दिनभर घूम-घूमकर टोपियाँ बेचता और शाम तक घर लौट आता।
एक दिन उसने सोचा कि क्यों न आज पास के दूसरे गाँव में जाकर टोपियाँ बेची जाएँ। वह टोपियों से भरी टोकरी लेकर जंगल के रास्ते चल पड़ा।
दोपहर का समय था। सूरज तेज़ चमक रहा था। चलते-चलते टोपीवाला बहुत थक गया और उसका गला भी सूख गया। तभी उसे रास्ते में एक कुआँ और उसके पास एक बड़ा बरगद का पेड़ दिखाई दिया।
वह खुश हुआ। उसने टोकरी पेड़ के नीचे रखी, कुएँ से ठंडा पानी निकाला और जी भरकर पिया। फिर उसने सोचा —
“थोड़ी देर यहीं आराम कर लेता हूँ, फिर आगे चलूँगा।”
उसने टोकरी में से एक टोपी निकाली, अपने सिर पर पहनी और पेड़ के नीचे गमछा बिछाकर लेट गया। थकान इतनी थी कि उसे तुरंत गहरी नींद आ गई।
जंगल के बंदर बहुत नकलची और शरारती थे। जब उन्होंने टोपीवाले को सोते देखा, तो धीरे-धीरे पेड़ से नीचे उतर आए। उन्होंने टोकरी खोली और सारी रंग-बिरंगी टोपियाँ निकाल लीं। हर बंदर ने अपने सिर पर एक-एक टोपी पहन ली और फिर सब पेड़ पर चढ़कर उछल-कूद करने लगे।
कुछ देर बाद शोर-शराबे से टोपीवाले की नींद खुली। उसने आँखें मलते हुए टोकरी की ओर देखा —
अरे! टोकरी तो खाली थी!
वह घबरा गया। तभी उसे ऊपर से बंदरों की आवाज़ सुनाई दी। उसने ऊपर देखा तो हैरान रह गया —
सभी बंदरों ने उसकी टोपियाँ पहन रखी थीं!
टोपीवाला पहले तो बहुत गुस्सा हुआ। उसने पत्थर उठाकर बंदरों की ओर फेंकना शुरू कर दिया। लेकिन बंदर भी कम शरारती नहीं थे। वे भी पेड़ से फल और टहनियाँ तोड़कर उसकी तरफ फेंकने लगे।
अब टोपीवाला और परेशान हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी टोपियाँ वापस कैसे पाए।
कुछ देर सोचने के बाद उसे अचानक एक बात याद आई —
“बंदर नकल करने में माहिर होते हैं!”
बस फिर क्या था!
उसने अपने सिर से टोपी उतारी और ज़ोर से जमीन पर फेंक दी।
पेड़ पर बैठे बंदरों ने यह देखा…
और जैसा कि उनकी आदत थी — उन्होंने भी उसकी नकल उतारी!
एक-एक करके सभी बंदरों ने अपनी टोपियाँ उतारकर नीचे फेंक दीं।
टोपीवाला तुरंत दौड़ा और जल्दी-जल्दी सारी टोपियाँ इकट्ठी करके टोकरी में भर लीं। अब वह बहुत खुश था। उसने चैन की साँस ली और मुस्कुराते हुए दूसरे गाँव की ओर चल पड़ा।
उस दिन उसने एक बड़ी सीख सीखी —
समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, सूझबूझ से उसका हल निकाला जा सकता है।
कहानी से सीख (Moral)
- सूझबूझ और समझदारी से हर कठिनाई का समाधान निकाला जा सकता है।
- गुस्से से नहीं, दिमाग से काम लेना चाहिए।
- मुश्किल समय में शांत रहना ही सबसे बड़ी समझदारी है।
