कलाकार – सपनों और सच्चाई के बीच की कहानी

कलाकार – सपनों और सच्चाई के बीच की कहानी

यह कहानी उन लोगों की है… जो कला से प्यार करते हैं।
लेकिन दुनिया… हमेशा कला से प्यार नहीं करती।

शुरुआत – एक मुलाक़ात

शहर के पुराने हिस्से में एक बड़ा सा पार्क था। शाम के समय वहाँ अक्सर लोग टहलने आते थे। उसी पार्क में एक दिन सना अपनी दो सहेलियों के साथ टहल रही थी। उसने काला बुर्का पहना हुआ था, लेकिन चेहरा खुला था। उसकी हँसी बहुत साफ और सच्ची थी।

उसी समय पार्क की एक बेंच पर बैठा आरिफ़ उसे देख रहा था।

वह पेशे से कुछ नहीं था… लेकिन दिल से कलाकार था। उसे पेंटिंग बनाना पसंद था। वह चेहरों में भावनाएँ ढूंढता था।

सना को देखकर वह जैसे खो गया।

वह उसके पीछे चलने लगा। उसे यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह गलत कर रहा है।

अचानक उसने हिम्मत करके कहा —
“आपका दुपट्टा हवा में उड़ रहा है… संभाल लीजिए।”

सना डर गई। उसने शोर मचा दिया।
पुलिस आ गई।
और आरिफ़ को पकड़ लिया गया।

गलती… और सज़ा

आरिफ़ ने लाख समझाने की कोशिश की…
लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी।

उसे दो महीने की जेल हो गई।

जेल में वह बहुत टूटा।
उसे पेंटिंग से प्यार था…
लेकिन वहाँ उससे चक्की पिसवाई जाती थी।

वह कई बार बच्चों की तरह रोया।

अनपेक्षित मुलाक़ात

एक दिन जेल में उसे बताया गया कि कोई मिलने आया है।

वह हैरान था।

जब वह मुलाक़ात की सलाखों तक पहुँचा…
वहाँ सना खड़ी थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

उसने धीरे से कहा —
“मुझे माफ़ कर दीजिए… मेरी वजह से आप यहाँ आए।”

आरिफ़ मुस्कुराया —
“गलती आपकी नहीं… किस्मत की है।”

उस दिन के बाद सना हर पंद्रह दिन में उससे मिलने आने लगी।

धीरे-धीरे… दोनों को एक-दूसरे से मोहब्बत हो गई।

सपनों का घर

दो महीने बाद जब आरिफ़ जेल से बाहर आया…
सना उसका इंतज़ार कर रही थी।

दोनों ने शादी कर ली।

सना को संगीत से प्यार था।
आरिफ़ को पेंटिंग से।

दोनों ने फैसला किया —
“हम अपनी कला के लिए जिएँगे।”

संघर्ष की शुरुआत

शुरुआत में सब अच्छा था।

लेकिन धीरे-धीरे पैसे खत्म होने लगे।

घर का सामान बिकने लगा।
कभी खाना होता… कभी नहीं।

लेकिन दोनों खुश थे।

उन्हें लगता था —
“सच्चे कलाकार भूख सह सकते हैं… लेकिन कला नहीं छोड़ सकते।”

मजबूरी

एक दिन सना को एक अमीर घर में म्यूजिक सिखाने का काम मिला।

आरिफ़ बोला —
“हम कलाकार हैं… नौकरी नहीं करेंगे।”

सना मुस्कुराई —
“लेकिन जीना भी तो है।”

फिर भी… उसने आरिफ़ से छुपाकर काम शुरू कर दिया।

छुपे हुए सच

कुछ दिन बाद आरिफ़ भी पैसे लेकर आया।
उसने कहा —
“मैंने पेंटिंग बेची है।”

लेकिन सच यह था…
वह फैक्ट्री में काम कर रहा था।

दूसरी तरफ…
सना भी उसी फैक्ट्री में काम कर रही थी।

दोनों एक-दूसरे से छुपा रहे थे।

सच्चाई का पल

एक शाम सना घर आई।
उसके बालों में रूई फंसी हुई थी।

आरिफ़ ने पूछा —
“ये क्या हालत बना रखी है?”

सना मुस्कुराई —
“हम कलाकार हैं… हमें होश कहाँ रहता है।”

आरिफ़ चुप रहा।

फिर बोला —
“सच बताओ… तुम कहाँ काम करती हो?”

सना रो पड़ी।

“उसी फैक्ट्री में… जहाँ तुम काम करते हो।”

दोनों कुछ देर चुप रहे।

फिर दोनों हँस पड़े।

आख़िरी एहसास

आरिफ़ बोला —
“हम दोनों कला के लिए झूठ बोल रहे थे।”

सना बोली —
“कला भी ज़रूरी है… और ज़िंदगी भी।”

दोनों ने फैसला किया —
अब वे सच में साथ जिएँगे।

कला भी करेंगे…
और ज़िंदगी भी।

सीख

सपने ज़रूरी हैं…
लेकिन साथ निभाने वाला इंसान उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है।

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