फाइनल ईयर तक पहुँचते-पहुँचते भी दीपांशु अपने दिल का राज अपने सीने में दबाए बैठा था। प्रिया उसके ही क्लास में पढ़ती थी, इसलिए दोनों के बीच बातचीत तो होती थी, लेकिन बस उतनी ही जितनी ज़रूरी हो। दीपांशु स्वभाव से बहुत शांत और शर्मीला लड़का था। कॉलेज में उसके दोस्त भी गिने-चुने थे। प्रिया को लेकर उसके दिल में जो भावनाएँ थीं, उनके बारे में पूरे कॉलेज में सिर्फ उसका सबसे करीबी दोस्त श्याम ही जानता था।
श्याम अक्सर दीपांशु को समझाता, “यार, कब तक दिल में दबाकर रखेगा? एक बार प्रिया से अपने दिल की बात कह दे।” दीपांशु हर बार मुस्कुरा कर बात टाल देता, लेकिन अंदर ही अंदर वह हर दिन थोड़ा और बेचैन होता जा रहा था। उसे डर था—कहीं प्रिया ने मना कर दिया तो? और यही डर उसे चुप रहने पर मजबूर कर देता।
कॉलेज के आखिरी दिन नज़दीक आने लगे। एक दिन श्याम ने दीपांशु को गंभीर आवाज़ में कहा, “दीपांशु, अब कुछ ही दिनों में कॉलेज खत्म हो जाएगा। अगर तूने अभी नहीं कहा, तो शायद जिंदगी भर पछताएगा।” श्याम की बात इस बार दीपांशु के दिल में उतर गई। उस रात दीपांशु ठीक से सो भी नहीं पाया। वह बार-बार यही सोचता रहा कि अब या कभी नहीं।
अगले दिन दीपांशु ने हिम्मत जुटाई। धड़कते दिल के साथ वह प्रिया के पास पहुँचा। उसकी आवाज़ हल्की काँप रही थी—“प्रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”
प्रिया ने सामान्य भाव से कहा, “हाँ दीपांशु, बोलो।”
दीपांशु ने गहरी साँस ली, “प्रिया… मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।”
प्रिया एक पल के लिए चौंक गई, “क्या?”
अब दीपांशु ने थोड़ा साहस बटोर लिया था, “हाँ प्रिया, मैं सच कह रहा हूँ। काफी समय से कहना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। जब से मैंने तुम्हें देखा है… तुम मेरी दुनिया बन गई हो।”
प्रिया का चेहरा अचानक सख्त हो गया। उसने गुस्से में कहा, “दीपांशु, तुम पागल हो गए हो क्या? मैं तुमसे प्यार नहीं करती। मैंने तुम्हें हमेशा एक सीधा-सादा लड़का समझा, लेकिन तुम तो…”
प्रिया की अधूरी बात और उसके कठोर शब्द दीपांशु के दिल को चीर गए। उसकी आँखों में आँसू भर आए। वह बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया। उस दिन के बाद दीपांशु की दुनिया जैसे रुक सी गई।
कुछ ही दिनों में कॉलेज खत्म हो गया और प्रिया आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चली गई। लेकिन दीपांशु वहीं रह गया—उसी यादों के साथ। अब उसका ज्यादातर समय प्रिया को याद करने में गुजरने लगा। उसकी मुस्कान, उसकी बातें, उसका चलना… और सबसे बढ़कर उसका वो इंकार—सब कुछ दीपांशु के दिल में बस गया था।
बाहर की दुनिया के सामने दीपांशु अब भी मुस्कुराने की कोशिश करता, लेकिन उसकी मुस्कान नकली हो चुकी थी। धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ने लगी। वह चुप-चुप रहने लगा, दोस्तों से दूर रहने लगा।
जब श्याम को दीपांशु की हालत का पता चला, तो वह तुरंत उसके पास पहुँचा। उसने चिंता भरे स्वर में पूछा, “दीपांशु, जब प्रिया तुमसे प्यार नहीं करती और अब वो दूर जा चुकी है, तो तुमने अपनी ये हालत क्यों बना रखी है? उसे दिल से निकाल क्यों नहीं देते? जिंदगी में तुम्हें कोई और भी मिल जाएगी।”
दीपांशु ने हल्की सी मुस्कान के साथ श्याम की ओर देखा। उसकी आँखों में दर्द तो था, लेकिन प्यार भी उतना ही सच्चा था। वह धीमी आवाज़ में बोला, “श्याम… हासिल करके तो हर कोई प्यार करता है। लेकिन खोकर भी किसी से प्यार करना… वही तो असली प्यार होता है। मैं प्रिया से बहुत प्यार करता हूँ—और करता रहूँगा… चाहे वो मेरे पास हो या नहीं।”
श्याम चुप हो गया। उस दिन उसे समझ आ गया कि कुछ प्यार कहानियों में पूरे नहीं होते… लेकिन फिर भी हमेशा जिंदा रहते हैं—दिल के किसी कोने में, चुपचाप, अधूरे होकर भी हमेशा के लिए पूरे।
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