घने हरे जंगल में बंदरों का एक बड़ा झुंड रहता था। पेड़ों पर कूदना, झूले झूलना और दिन भर उछल‑कूद करना उनकी रोज़ की जिंदगी थी। उन बंदरों का सरदार बूढ़ा जरूर था, लेकिन बहुत समझदार और शांत स्वभाव का था। सभी उसे “दादू” कहकर बुलाते थे, और ज़रूरत पड़ने पर उसी से सलाह लेते थे।
एक साल गर्मी इतनी ज़्यादा पड़ी कि जंगल के छोटे‑छोटे तालाब सूखने लगे। पेड़ों की पत्तियाँ मुरझा गईं और कई जगह घास भी जलकर भूरी हो गई। पानी कम हुआ तो खाने के फल भी कम होने लगे। बंदरों के छोटे बच्चे अक्सर रो पड़ते, “दादू, भूख लगी है।” सरदार बंदर उन्हें प्यार से सहलाकर कहता, “थोड़ा सब्र करो, हम सब मिलकर कुछ न कुछ रास्ता निकाल लेंगे।”
एक दिन सुबह‑सुबह एक युवा बंदर जिसका नाम ‘चिन्टू’ था, ऊँचे पेड़ पर चढ़कर दूर‑दूर तक देखने लगा। अचानक उसकी नज़र जंगल के किनारे लगे खेतों पर पड़ी। उसे लगा जैसे वहाँ कुछ चमक रहा हो, मानो बहुत सारे पक्के फल या अनाज ज़मीन पर बिखरे हों। वह घबराते‑घबराते नीचे आया और दादू से बोला, “दादू, जंगल के बाहर खेतों में ज़मीन पर बहुत सारा खाना दिख रहा है, शायद हमारा पूरा झुंड पेट भर सकता है!”
दादू ने थोड़ा सोचा। उसे याद था कि इंसान कभी‑कभी जानवरों को पकड़ने के लिए चाल चलते हैं। फिर भी उसने तय किया कि पहले ठीक से देखना जरूरी है। वह बोला, “अकेले जाना खतरा है। हम सब मिलकर, संभलकर चलते हैं, और पहले ऊपर से देखकर समझते हैं कि मामला क्या है।” पूरे झुंड ने दादू की बात मानी और सब धीरे‑धीरे पेड़ों से होते हुए खेत की तरफ बढ़ने लगे।
जब वे खेत के नज़दीक पहुंचे तो चिन्टू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ज़मीन पर सचमुच बहुत सारे पीले‑पीले मक्के के दाने बिखरे हुए थे। कुछ छोटे बंदर उछल पड़े, “वाह, इतना सारा खाना!” लेकिन दादू की नज़र एक तरफ पेड़ पर लटके बड़े से जाल पर पड़ी, जिसे इंसानों ने बड़े चालाकी से पत्तों के पीछे छुपाया हुआ था। दादू ने गंभीर आवाज़ में कहा, “रुको, अभी कोई नीचे नहीं उतरेगा। ये दाने इतने सीधे‑साधे तरीके से ज़मीन पर क्यों बिखरे होंगे? ज़रूर इसमें कोई न कोई चाल है।”
कुछ युवा बंदर बोले, “पर दादू, हमें बहुत भूख लगी है, अगर हमने ये मौका छोड़ दिया तो क्या होगा?” दादू ने प्यार से समझाया, “भूख में हम गलती जल्दी करते हैं। अगर हम बिना सोचे‑समझे दौड़ पड़े, तो शायद कभी वापिस जंगल नहीं लौट पाएँ। हमें एक साथ रहकर, दिमाग से काम लेना होगा।”
तभी सामने वाले पेड़ से एक तोता जोर से बोला, “दादू सही कह रहे हैं! मैंने कल शाम इसी खेत में एक हिरण को जाल में फँसते देखा था। इंसान उसे पकड़कर ले गए।” यह सुनकर झुंड के सब बंदर सहम गए। अब उन्हें समझ में आ गया कि दाने सिर्फ चारा हैं, असली मकसद उन्हें फँसाना है।
दादू ने तुरंत एक योजना बनाई। उसने कहा, “हम इंसान के जाल को तोड़ भी सकते हैं, पर अकेले‑अकेले नहीं। हमें पहले ये तय करना होगा कि किसका काम क्या होगा।” उसने झुंड को तीन हिस्सों में बाँट दिया:
- पहला समूह ऊपर पेड़ों पर चौकीदारी करेगा, ताकि इंसान आते ही आवाज़ लगा सके।
- दूसरा समूह जाल के किनारों को अपनी पूरी ताकत से खींचेगा।
- तीसरा समूह जमीन पर बिखरे दानों को इकट्ठा करके एक सुरक्षित जगह, पेड़ों की ऊँचाई पर ले जाएगा।
दादू ने सबको संकेत दिया, “जब मैं ‘अब’ कहूँ, तब सब अपने‑अपने काम पर पूरे जोर से लग जाना। अगर कोई एक भी आलस करेगा, तो हम सब मुसीबत में पड़ सकते हैं।”
संकेत मिलते ही पहला समूह ऊँचे पेड़ों पर चढ़ कर आस‑पास निगरानी करने लगा। दूसरा समूह जाल के पास पहुँचा और हर बंदर ने जाल के अलग‑अलग हिस्से को पकड़ लिया। तीसरा समूह सावधानी से नीचे उतरा और दानों को अपनी बाहों में भर‑भर कर पेड़ों पर ले जाने लगा। कुछ देर तक जाल बिल्कुल हिला भी नहीं, लेकिन जैसे ही सबने एक साथ खूब जोर लगाया, तना हुआ जाल एक तरफ से फटने लगा।
इसी बीच दूर से इंसान आता दिखाई दिया, जो शायद रोज की तरह जाल देखने आ रहा था। ऊपर बैठे चौकीदार बंदर ने तुरंत जोर से आवाज़ लगाई, “भागो, इंसान आ रहा है!” दादू ने झट से चिल्लाया, “सब एक साथ, आखिरी बार ज़ोर लगाओ!” जाल पर काम कर रहे सभी बंदरों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। एक जोरदार आवाज़ के साथ जाल लगभग बीच से फट गया और वे भाग कर जल्दी से पेड़ों पर चढ़ गए।
इंसान ने जाल की हालत देखी तो गुस्से से चिल्लाया, “ये बंदर आज तो बच गए, लेकिन अगली बार नहीं बचेंगें।” पर बंदर अब तक ऊँचे पेड़ों की शाखाओं पर पहुँच चुके थे। जिन बंदरों ने दाने इकट्ठा किए थे, उन्होंने उन्हें बड़े‑से पेड़ की ऊँची शाखा पर रख दिया। दादू ने तय किया कि अब झुंड वहाँ बारी‑बारी से आकर शांतिपूर्वक अपना पेट भरेगा।
रात को जब हवा थोड़ी ठंडी हुई, सब बंदर एक बड़े पेड़ पर जमा हो गए। दादू ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखो, अगर तुममें से कोई अकेले‑अकेले भागकर दाना खाने चला जाता, तो शायद जाल में फँस जाता। लेकिन हमने मिलकर सोचा, मिलकर काम किया, इसलिए हम सब सुरक्षित हैं और हमारे पास खाना भी है।”
चिन्टू ने सिर झुकाकर कहा, “दादू, आज समझ में आ गया कि केवल बहादुरी काफी नहीं, एकता और समझदारी भी जरूरी है। अगर हम सब एक‑दूसरे की बात न सुनते, तो ना हम बचते और ना ही ये खाना मिलता।” बाकी बंदरों ने भी सहमति में सिर हिलाया।
उस दिन के बाद से जंगल के सभी बंदरों ने यह नियम बना लिया कि किसी भी खतरे या लालच के समय वे अकेले निर्णय नहीं लेंगे। पहले सरदार से बात करेंगे, फिर पूरे झुंड के साथ मिलकर योजना बनाएँगे। धीरे‑धीरे जंगल में बारिश भी लौटी, तालाब फिर से भर गए और पेड़ों पर नए‑नए फल लगने लगे, लेकिन बंदरों ने “एकता की ताकत” वाला सबक कभी नहीं भुलाया।
सीख
जब लोग या जानवर मिलकर सोचते हैं और साथ खड़े रहते हैं, तब बड़ा से बड़ा जाल, खतरा या मुश्किल भी कमजोर पड़ जाती है। एकता से न सिर्फ़ जान बचती है, बल्कि भविष्य भी सुरक्षित होता है।
कहानी से जुड़े उपयोगी FAQ
इस कहानी की मुख्य सीख यह है कि मुश्किल समय में अगर सब मिलकर सोचें और एक‑दूसरे का साथ दें, तो बड़ी से बड़ी समस्या और चालाक दुश्मन को भी हराया जा सकता है।
सरदार बंदर बुद्धिमान नेता की तरह पूरे झुंड को संभालता है, खतरे को पहचानता है, योजना बनाता है और सबको एकजुट करके सुरक्षित रास्ता दिखाता है।
बच्चे सीख सकते हैं कि लालच में आकर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, बड़ों की बात सुननी चाहिए और टीमवर्क से काम करने पर नतीजे हमेशा बेहतर आते हैं।
यह कहानी स्कूल की moral stories, parents द्वारा bedtime story, या “एकता में बल” वाले निबंध/प्रोजेक्ट के लिए समझाने के तौर पर बहुत काम आती है।
नहीं, यह कहानी बड़ों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि यह याद दिलाती है कि परिवार, टीम या समाज में मिलजुलकर फैसले लेने से ही सुरक्षित और अच्छा परिणाम मिलता है।
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