हजरे अस्वद क्या है और मुसलमान इसे क्यों चूमते हैं?

हजरे अस्वद क्या है और मुसलमान इसे क्यों चूमते हैं?

इस्लाम में हज और उमरा बहुत अहम इबादत मानी जाती है। हज के दौरान मुसलमान मक्का में काबा शरीफ का तवाफ करते हैं। इसी तवाफ के दौरान काबा की दीवार में लगे एक खास पत्थर को चूमने या उसकी तरफ इशारा करने की रस्म होती है, जिसे हजरे अस्वद (Black Stone) कहा जाता है।

बहुत से लोगों के मन में सवाल आता है कि मुसलमान इस पत्थर को क्यों चूमते हैं? क्या यह पूजा है? क्या इसमें कोई ताकत है? या इसके पीछे कोई और मकसद है?

इस लेख में हम इस पूरे विषय को आसान और रोजमर्रा की हिंदी में विस्तार से समझेंगे।

हजरे अस्वद क्या है?

हजरे अस्वद काबा शरीफ की दीवार में लगा एक काला पत्थर है। अरबी भाषा में “हज्र” का मतलब पत्थर और “अस्वद” का मतलब काला होता है। यह पत्थर काबा के एक कोने में लगा है और तवाफ की शुरुआत और खत्म होने की निशानी भी माना जाता है।

आज के समय में यह पत्थर एक टुकड़े में नहीं है बल्कि कई छोटे-छोटे टुकड़ों में है और उन्हें चांदी के फ्रेम में लगाया गया है।

इस्लामी मान्यता के अनुसार इसे जन्नत से लाया गया था और हजरत इब्राहीम और उनके बेटे इस्माईल ने काबा बनाते समय इसे लगाया था।

हजरे अस्वद क्या है

तवाफ क्या होता है?

तवाफ का मतलब होता है काबा के चारों तरफ सात बार घूमना। यह हज और उमरा का जरूरी हिस्सा है।

इस दौरान मुसलमान हर चक्कर की शुरुआत हजरे अस्वद से करते हैं। अगर मौका मिले तो उसे चूमते हैं, नहीं तो हाथ लगाते हैं या दूर से इशारा करते हैं।

हजरे अस्वद को चूमने का असली मकसद क्या है?

यह अल्लाह की इबादत का हिस्सा है

इस्लाम में बताया गया है कि तवाफ, सफा-मरवा की सई और जमरात को कंकरी मारना — ये सब अल्लाह को याद करने के लिए हैं।

इसका मतलब यह है कि तवाफ करते समय जो भी काम होते हैं — चलना, दुआ पढ़ना, पत्थर को छूना या चूमना — ये सब इबादत के हिस्से हैं।

क्योंकि पैगंबर मोहम्मद ﷺ ने ऐसा किया

इस्लाम में सबसे बड़ा कारण यही माना जाता है कि पैगंबर मोहम्मद ﷺ हजरे अस्वद को चूमते थे, इसलिए मुसलमान भी उनका तरीका अपनाते हैं।

यह पूजा नहीं बल्कि सम्मान और सुन्नत है

इस्लाम में हजरे अस्वद की पूजा नहीं की जाती। यह सिर्फ एक निशानी और सुन्नत है।

इस बात को हजरत उमर (रज़ि.) के एक मशहूर कथन से समझा जा सकता है:
उन्होंने पत्थर को चूमकर कहा कि —
तू सिर्फ पत्थर है, न फायदा दे सकता है न नुकसान, लेकिन मैंने नबी को ऐसा करते देखा इसलिए मैं करता हूं।

अगर पत्थर तक पहुंच न हो तो क्या करें?

हज में बहुत भीड़ होती है। इसलिए हर व्यक्ति का पत्थर तक पहुंचना संभव नहीं होता।

इसलिए इस्लाम में यह भी बताया गया है:

  • अगर चूम नहीं सकते → हाथ से छू लें
  • अगर छू नहीं सकते → दूर से इशारा करें

और तवाफ फिर भी पूरा माना जाता है।

क्या हजरे अस्वद में कोई ताकत होती है?

इस्लामी शिक्षा के अनुसार:
❌ पत्थर खुद से फायदा या नुकसान नहीं देता
✔ असली ताकत सिर्फ अल्लाह की है

इसलिए इसे चूमना सिर्फ इबादत और सुन्नत माना जाता है।

कुछ लोग गलत क्या समझते हैं?

❌ गलत सोच 1 — पत्थर से बरकत मिलती है

इस्लाम में यह बात साफ कही गई है कि पत्थर खुद से कुछ नहीं देता।

❌ गलत सोच 2 — यह मूर्ति पूजा जैसा है

इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत होती है। पत्थर को चूमना सिर्फ एक धार्मिक तरीका है, पूजा नहीं।

हजरे अस्वद का इतिहास

  • माना जाता है कि इसे जिब्रईल फरिश्ता जन्नत से लाए थे
  • समय के साथ पत्थर टूट गया
  • इतिहास में इसे चोरी भी किया गया था और बाद में वापस लाया गया
  • आज यह चांदी के फ्रेम में लगा है

हदीस में हजरे अस्वद की अहमियत

हदीसों में बताया गया है:

  • यह जन्नत से आया पत्थर है
  • इसे छूना या चूमना गुनाहों के माफ होने का कारण बन सकता है (नीयत सही हो तो)

आसान उदाहरण से समझें

इसे ऐसे समझ सकते हैं:
जैसे लोग अपने देश के झंडे को सलाम करते हैं या चूमते हैं।
वे झंडे की पूजा नहीं करते — बल्कि सम्मान दिखाते हैं।

वैसे ही मुसलमान हजरे अस्वद को सम्मान देते हैं।

तवाफ क्यों खास माना जाता है?

तवाफ करते समय इंसान अल्लाह के करीब महसूस करता है।
दिल में नम्रता आती है और इंसान अपने गुनाहों की माफी मांगता है।

इसलिए तवाफ इस्लाम की बहुत बड़ी इबादत माना जाता है।

पूरी बात का आसान निष्कर्ष

  • हजरे अस्वद एक पवित्र निशानी है
  • इसे चूमना सुन्नत है
  • यह इबादत का हिस्सा है
  • यह पूजा नहीं है
  • असली इबादत सिर्फ अल्लाह की होती है

आखिरी बात

इस्लाम में हर इबादत का असली मकसद इंसान को अल्लाह के करीब करना है।
हजरे अस्वद को चूमना भी उसी इबादत का हिस्सा है — ना कि पत्थर की पूजा।

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