Islamic Mahino Ke Naam – Islāmi Mahinon Ke Naam Aur Unke Naamkaran Ki Wajah

Islamic Mahino Ke Naam – Islāmi Mahinon Ke Naam Aur Unke Naamkaran Ki Wajah

इस्लामी कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) चाँद पर आधारित है, जिसे कमरी महीनों का कैलेंडर कहा जाता है। इन महीनों का इस्तेमाल अरब में इस्लाम से पहले भी होता था। समय के साथ इन नामों पर पूरा अरब एकमत हो गया और यही नाम आज तक चले आ रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इन महीनों के नामकरण की वजहों का इस्लामी शरीयत से सीधा संबंध नहीं है, क्योंकि ये नाम उस दौर में रखे गए थे जब अभी क़ुरआन नाज़िल नहीं हुआ था।

इस विषय पर प्रसिद्ध इतिहासकार और मुफ़स्सिर इब्न कसीर ने अपनी किताब तफ़्सीर इब्न कसीर में विस्तार से चर्चा की है।

इस्लामी महीनों के नाम (12 Islamic Months Names)

इस्लामी कैलेंडर में कुल 12 महीने होते हैं:

  1. मोहर्रम
  2. सफर
  3. रबी उल अव्वल
  4. रबी उस्सानी (रबी उल आखिर)
  5. जमादिल अव्वल
  6. जमादिल आखिर
  7. रज्जब
  8. शाबान
  9. रमज़ान
  10. शव्वाल
  11. ज़ुल कायदा
  12. ज़ुल हिज्जा

अब हम हर महीने के नाम और उसके नामकरण की वजह को विस्तार से समझते हैं।

Islamic Mahino Ke Naam – Overview Table

नीचे दी गई टेबल में 12 इस्लामी महीनों के नाम, उनका अर्थ और नामकरण की वजह संक्षेप में दी गई है:

महीने का नामअरबी अर्थनामकरण की वजह (संक्षेप में)
मोहर्रमपवित्र / सम्मानितयह हुरमत (सम्मान) वाला महीना था, इसलिए इसे विशेष आदर दिया गया
सफरखाली होनाइस महीने में लोग सफर और जंग पर निकलते थे, घर खाली हो जाते थे
रबी उल अव्वलबसंत (Spring)नामकरण के समय यह बसंत का मौसम था
रबी उस्सानीदूसरा बसंतरबी का दूसरा महीना, वही वजह जो रबी उल अव्वल की
जमादिल अव्वलजम जानासर्दी के कारण पानी जम जाता था
जमादिल आखिरदूसरा जमादजमाद का दूसरा महीना
रज्जबसम्मान करनायह भी हुरमत वाला महीना था, जिसका आदर किया जाता था
शाबानबिखरनालोग अलग-अलग दिशाओं में निकल जाते थे
रमज़ानतेज गर्मीनामकरण के समय सख्त गर्मी थी
शव्वालपूंछ उठानाऊंटों से जुड़ी अरबी कहावत से लिया गया नाम
ज़ुल कायदाबैठनालोग जंग छोड़कर घरों में बैठ जाते थे
ज़ुल हिज्जाहज करनाइस महीने में हज अदा किया जाता है

मोहर्रम का महीना

मोहर्रम “हराम” शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है सम्मानित या निषिद्ध।

अरब के लोग इस महीने को बेहद सम्मान देते थे और इसे लड़ाई-झगड़े से पाक समझते थे। हालांकि, जाहिलियत के दौर में वे कभी-कभी इसकी पाबंदी को दूसरे महीनों में बदल देते थे।

इब्न कसीर के अनुसार, इस महीने का नाम इसकी पवित्रता और हुरमत को जाहिर करने के लिए रखा गया।

सफर का महीना

“सफर” का मतलब होता है खाली होना।

इस महीने में अरब लोग युद्ध या सफर पर निकल जाते थे, जिससे उनके घर खाली हो जाते थे। अरबी में “सफिर-अल-मकान” का मतलब है – जगह का खाली हो जाना। इसी वजह से इसका नाम सफर पड़ा।

रबी उल अव्वल

“रबी” का अर्थ है बसंत (Spring)।

कहा जाता है कि जब इस महीने का नाम रखा गया तब मौसम बसंत का था और लोग घरों में सुकून से रहते थे। इसलिए इसे रबी उल अव्वल कहा गया।

रबी उस्सानी (रबी उल आखिर)

इसका नामकरण भी उसी वजह से हुआ जिस वजह से रबी उल अव्वल का हुआ। यह रबी का दूसरा महीना माना गया।

जमादिल अव्वल

“जमाद” का अर्थ है जम जाना।

जब इस महीने का नाम रखा गया, तब सर्दी इतनी ज्यादा थी कि पानी जम जाता था। इसी वजह से इसे जमादिल अव्वल कहा गया।

जमादिल आखिर

इस महीने का नामकरण भी जमादिल अव्वल की तरह ही हुआ। यह जमाद का दूसरा महीना है।

रज्जब का महीना

“रज्जब” अरबी शब्द “तरजीब” से निकला है, जिसका अर्थ है सम्मान करना।

यह भी हुरमत वाला महीना है और अरब इस महीने का खास सम्मान करते थे। इसलिए इसका नाम रज्जब रखा गया।

शाबान का महीना

“शाबान” शब्द “तशअब” से बना है, जिसका अर्थ है बिखरना या अलग-अलग हो जाना।

हुरमत वाले महीनों के बाद लोग इस महीने में अलग-अलग दिशाओं में निकल जाते थे, इसलिए इसे शाबान कहा गया।

रमज़ान का महीना

“रमज़ान” शब्द “रमज़ा” से निकला है, जिसका अर्थ है तेज गर्मी।

कहा जाता है कि जब इसका नाम रखा गया तब बहुत गर्मी थी। इस्लाम में यही वह महीना है जिसमें रोज़े रखे जाते हैं और क़ुरआन नाज़िल हुआ।

शव्वाल

“शव्वाल” उस समय बोला जाता था जब ऊंट अपनी पूंछ उठाता था।

यह नाम भी उस समय के हालात और कहावतों के अनुसार रखा गया।

ज़ुल कायदा

“कायदा” का मतलब है बैठ जाना।

इस महीने में लोग युद्ध और सफर छोड़कर अपने घरों में बैठ जाते थे। इसलिए इसका नाम ज़ुल कायदा रखा गया।

ज़ुल हिज्जा

“हिज्जा” का अर्थ है हज करना।

इस महीने में हज किया जाता है, इसलिए इसे ज़ुल हिज्जा कहा गया।

इतिहासकार जव्वाद अली ने अपनी प्रसिद्ध किताब अल मुफस्सल फी तारीख अल अरब क़ब्ल अल इस्लाम में भी इन महीनों के बारे में विस्तार से लिखा है।

अहम बात

  • महीनों के नाम मौसम और हालात के अनुसार रखे गए थे।
  • इंसानों के नाम मौसम के हिसाब से नहीं बदलते, लेकिन महीनों के नाम उस समय के हालात से जुड़े थे।
  • इन नामों का इस्लामी शरीयत से सीधा संबंध नहीं है।
  • ये नाम इस्लाम से पहले के दौर (जाहिलियत) में तय हुए थे।

निष्कर्ष

इस्लामी महीनों के नाम सिर्फ धार्मिक पहचान नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी रखते हैं। हर महीने के नाम के पीछे कोई न कोई कारण, मौसम या सामाजिक स्थिति जुड़ी हुई है।

अगर आप इस्लामी कैलेंडर को समझना चाहते हैं तो इन महीनों के नाम और उनके अर्थ को जानना बहुत जरूरी है।

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