हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में माता सती की कहानी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह कहानी केवल एक देवी की कथा नहीं है, बल्कि इसमें प्रेम, सम्मान, त्याग, अहंकार और भक्ति की गहरी सीख छुपी हुई है। इस कहानी में हम देखेंगे कि कैसे एक बेटी, पत्नी और देवी के रूप में सती ने अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय लिया।
यह कहानी जुड़ी है उनके पति भगवान शिव, उनके पिता राजा दक्ष, और अन्य देवताओं से।
माँ सती कौन थीं?
माता सती हिंदू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक मानी जाती हैं। उन्हें देवी आदिशक्ति का अवतार माना जाता है। पुराणों के अनुसार वे राजा दक्ष की पुत्री थीं। बचपन से ही माता सती का स्वभाव बहुत शांत, धार्मिक और भक्ति भाव से भरा हुआ था। उन्हें साधना, पूजा और भगवान की भक्ति करना बहुत पसंद था। वे बाहरी दिखावे और ऐश्वर्य से दूर रहना पसंद करती थीं।
माँ सती का जीवन भगवान भगवान शिव से गहरे प्रेम और भक्ति के लिए जाना जाता है। उन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की और अंत में उनसे विवाह किया। माता सती को प्रेम, त्याग, शक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है। बाद में उन्होंने अपने पति के अपमान को सहन न कर पाने के कारण यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया और बाद में उनका पुनर्जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ।
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| माता सती कौन थीं | आदिशक्ति का अवतार |
| पिता | राजा दक्ष |
| पति | भगवान शिव |
| मुख्य घटना | दक्ष यज्ञ और सती का आत्मदाह |
| परिणाम | 51 शक्तिपीठों की स्थापना |
| पुनर्जन्म | माता पार्वती |
माता सती का जन्म – एक दिव्य अवतार
पुराणों के अनुसार माता सती देवी आदिशक्ति का अवतार थीं। उनके पिता राजा दक्ष एक शक्तिशाली राजा और प्रजापति थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके देवी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त किया था।
दक्ष की कई बेटियाँ थीं, लेकिन सती सबसे अलग थीं। वे बचपन से ही शांत, दयालु और आध्यात्मिक स्वभाव की थीं। उन्हें महलों की चमक-दमक से ज्यादा साधना और भक्ति पसंद थी।
माँ सती का बचपन से ही शिव के प्रति प्रेम
जब सती छोटी थीं, तभी से वे शिव की कहानियाँ सुनती थीं। उन्हें यह जानकर बहुत अच्छा लगता था कि शिव पहाड़ों में रहते हैं, साधना करते हैं और सभी जीवों से प्रेम करते हैं।
शिव का सादा जीवन सती को बहुत पसंद था। धीरे-धीरे यह पसंद प्रेम में बदल गई। सती ने मन ही मन तय कर लिया कि वे विवाह करेंगी तो केवल शिव से ही करेंगी।
माँ सती की शिव को पति रूप में पाने की तपस्या
शिव संसार की चीजों से दूर रहते थे। उन्हें किसी चीज का मोह नहीं था। इसलिए सती को पता था कि उन्हें शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या करनी होगी।
उन्होंने जंगलों में जाकर कई वर्षों तक कठोर तप किया। उनकी सच्ची भक्ति देखकर अंत में शिव प्रसन्न हो गए और उन्होंने सती को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया।
माँ सती के विवाह से पिता दक्ष का क्रोधित होना
जब सती ने शिव से विवाह किया, तब राजा दक्ष बहुत नाराज हुए। उन्हें लगा कि शिव राजा या देवता की तरह नहीं रहते। वे सादे कपड़े पहनते हैं, पहाड़ों में रहते हैं और भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं।
दक्ष को यह विवाह अपनी इज्जत के खिलाफ लगा। लेकिन सती अपने निर्णय पर अडिग रहीं।
देव सभा में अपमान की शुरुआत
एक बार भगवान ब्रह्मा ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया। इसमें सभी देवताओं को बुलाया गया।
जब दक्ष सभा में आए तो सभी देवता खड़े हो गए, लेकिन शिव शांत बैठे रहे। उन्हें सम्मान दिखाने की जरूरत नहीं लगी क्योंकि वे अहंकार से दूर थे।
दक्ष को यह बहुत बुरा लगा और उन्होंने वहीं शिव का अपमान किया।
दक्ष का अपना यज्ञ – बदले की भावना
कुछ समय बाद दक्ष ने खुद एक बहुत बड़ा यज्ञ करवाने का फैसला किया। उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया लेकिन शिव और सती को नहीं बुलाया।
सती को जब देवताओं को जाते हुए देखा तो उन्हें पता चला कि उनके पिता यज्ञ कर रहे हैं। उन्होंने शिव से वहाँ जाने की अनुमति मांगी।
यज्ञ में जाने का निर्णय
शिव ने सती को समझाया कि वहाँ उनका सम्मान नहीं होगा। लेकिन सती अपने पिता के घर जाना चाहती थीं। अंत में शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी।
यज्ञ में हुआ सबसे बड़ा अपमान
जब सती यज्ञ में पहुँचीं तो किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। उन्होंने देखा कि यज्ञ में शिव के लिए कोई स्थान नहीं रखा गया था।
जब सती ने कारण पूछा तो दक्ष ने शिव का अपमान किया और कहा कि वे भगवान नहीं हैं।
यह सुनकर सती का दिल टूट गया।
सती का आत्मदाह – सबसे दुखद घटना
पति का अपमान देखकर सती बहुत दुखी और क्रोधित हो गईं। उन्होंने सोचा कि ऐसे शरीर में रहना बेकार है जो उनके पति के अपमान का कारण बना।
उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग कर दिया।
शिव का क्रोध – ब्रह्मांड कांप उठा
जब शिव को यह खबर मिली तो वे बहुत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध से वीरभद्र का जन्म हुआ जिसने यज्ञ नष्ट कर दिया और दक्ष का वध कर दिया।
सती के शरीर से बने शक्तिपीठ
शिव सती के शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने सती के शरीर को टुकड़ों में विभाजित कर दिया।
जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बन गए। ये शक्तिपीठ आज भी भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूद हैं।
शिव के आँसू से बने पवित्र स्थान
कहते हैं कि शिव इतने रोए कि उनके आँसुओं से दो पवित्र कुंड बने —
- पुष्कर (राजस्थान)
- कटासराज मंदिर
सती का पुनर्जन्म – प्रेम फिर मिला
कुछ समय बाद सती का पुनर्जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ।
पार्वती ने भी शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की और अंत में शिव ने उन्हें फिर से पत्नी रूप में स्वीकार किया।
