आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी बातों में भी फायदा देखने लगते हैं, ऐसे में अगर कोई बिना लालच के सही काम करे तो वह दिल को छू जाता है।
ये कहानी है ऐसी ही सच्ची ईमानदारी की… जो इंसान को बड़ा बनाती है।
यह बात है कई साल पहले की।
उत्तर प्रदेश के एक शांत और पुराने शहर प्रतापगढ़ में एक सम्मानित परिवार रहता था। परिवार के मुखिया थे रघुवीर प्रसाद त्रिपाठी।
रघुवीर प्रसाद जी पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उन्होंने अपनी पूरी नौकरी ईमानदारी और साहस के साथ निभाई थी। उनकी सख्त छवि थी, लेकिन दिल से बहुत नरम थे। उन्हें अपनी सच्ची सेवा के लिए सरकार की ओर से कई सम्मान भी मिले थे।
उनका परिवार सादगी और संस्कारों के लिए पूरे मोहल्ले में जाना जाता था।
मासूम गलती
एक दिन घर में पूजा के बाद कुछ पुराने सिक्के और अशर्फियाँ निकाली गई थीं। ये परिवार की पुरानी धरोहर थीं।
उसी घर में सात-आठ साल का एक छोटा बच्चा था — आरव।
उसकी आँखों में शरारत थी, लेकिन दिल बिल्कुल साफ था।
खेलते-खेलते उसकी नजर उन चमकती अशर्फियों पर पड़ी।
उसे यह नहीं पता था कि उनकी कीमत क्या है।
उसे बस इतना समझ आया कि ये भी पैसे जैसे ही होते हैं… और पैसे से चीजें खरीदी जाती हैं।
बचपन की मासूमियत में उसने चुपके से एक अशर्फी उठा ली।
बाजार की रंगीन दुनिया
शाम के समय शहर के पुराने चौक पर एक बुजुर्ग आदमी रोज अपनी छोटी सी दुकान लगाते थे। उनका नाम था हकीम चाचा।
सफेद दाढ़ी, सिर पर टोपी, और चेहरे पर हमेशा मुस्कान।
वो बच्चों के लिए रंग-बिरंगी गेंदें, सीटी, और छोटी-छोटी खिलौने बेचते थे।
आरव की नजर एक लाल-पीली रंग की चमचमाती गेंद पर पड़ी।
वो दौड़कर हकीम चाचा के पास गया और हाथ में पकड़ी अशर्फी आगे बढ़ाते हुए बोला —
“चाचा, ये वाली गेंद दे दो।”
हकीम चाचा ने पहले तो सिक्के को देखा… फिर बच्चे की तरफ।
उनकी आँखों में समझदारी की चमक आ गई।
उन्होंने बिना कुछ कहे उसे गेंद दे दी और अशर्फी अपने पास रख ली।
आरव खुशी से उछलता-कूदता घर की ओर चल पड़ा।
ईमानदारी की मिसाल
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
हकीम चाचा कुछ देर बाद अपनी दुकान समेटकर सीधे आरव के घर पहुँच गए।
दरवाज़े पर रघुवीर प्रसाद जी खड़े थे।
हकीम चाचा ने आदर से कहा —
“जनाब, ज़रा बच्चों पर ध्यान रखिए। आपके बेटे ने मुझे ये अशर्फी देकर एक गेंद खरीदी है।”
रघुवीर जी चौंक गए।
उन्होंने अशर्फी देखी… और तुरंत समझ गए कि ये घर की पुरानी धरोहर में से है।
उन्होंने आरव को बुलाया।
आरव मासूमियत से सब बताने लगा। उसे अपनी गलती का अंदाज़ा ही नहीं था।
बड़ा दिल
रघुवीर प्रसाद जी की आँखों में हैरानी के साथ-साथ सम्मान भी था।
उन्होंने हकीम चाचा से कहा —
“आप चाहते तो इसे रख सकते थे। बच्चे को क्या पता इसकी कीमत?”
हकीम चाचा मुस्कुराए।
“साहब, ईमानदारी की कीमत किसी भी अशर्फी से ज्यादा होती है। अगर आज मैं इसे रख लेता, तो शायद मेरे ज़मीर को सुकून नहीं मिलता।”
रघुवीर जी ने उन्हें इनाम देने की कोशिश की।
लेकिन हकीम चाचा ने न तो इनाम लिया, न ही गेंद का पैसा।
उन्होंने अशर्फी वापस दी और धीरे से कहा —
“बच्चे को समझा दीजिएगा… यही मेरे लिए काफी है।”
और फिर वो चुपचाप लौट गए।
सीख जो जिंदगी भर साथ रही
उस दिन के बाद आरव को ईमानदारी का असली मतलब समझ आया।
रघुवीर जी ने उसे समझाया —
“बेटा, इंसान की पहचान उसके पैसों से नहीं, उसके चरित्र से होती है।”
वो छोटा सा बच्चा उस दिन बड़ा सबक सीख गया।
और मोहल्ले में हकीम चाचा की इज्जत और भी बढ़ गई।
कहानी की सीख
ईमानदारी एक ऐसा गुण है जो इंसान को अंदर से अमीर बनाता है।
सच्चा इंसान वही है जो मौका मिलने पर भी गलत रास्ता न चुने।धन-दौलत तो आ जाती है,
लेकिन इज्जत और भरोसा कमाने में पूरी जिंदगी लग जाती है।
