Kabir Ke Dohe in Hindi with Meaning (अर्थ सहित) | संत कबीर के प्रसिद्ध और प्रेरणादायक दोहे

Kabir Ke Dohe in Hindi with Meaning (अर्थ सहित) | संत कबीर के प्रसिद्ध और प्रेरणादायक दोहे

कबीर के दोहे हिंदी साहित्य और भक्ति आंदोलन की अनमोल धरोहर हैं। संत कवि कबीर दास ने अपने दोहों में जीवन का गहरा दर्शन, सच्ची भक्ति, प्रेम, सत्य और वैराग्य का संदेश दिया है। उनकी वाणी सरल है लेकिन अर्थ अत्यंत गहरा, इसलिए आज भी लोग उनके दोहों से प्रेरणा लेते हैं।

इस लेख में हम जानेंगे कि कबीर दास कौन थे, वे क्यों प्रसिद्ध हैं, और पढ़ेंगे कबीर के प्रसिद्ध दोहे हिंदी में अर्थ सहित। नीचे सभी महत्वपूर्ण दोहे क्रमवार दिए गए हैं ताकि आपको एक ही जगह पूरी जानकारी मिल सके।

Who is Kabir Das? (कबीर दास कौन थे)

कबीर दास 15वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि थे। उनका जन्म वाराणसी के आसपास माना जाता है। उन्होंने अपने समय में फैली जाति-पाति, अंधविश्वास और धार्मिक आडंबरों का खुलकर विरोध किया।

कबीर ने साखी और दोहों के माध्यम से लोगों को सच्ची भक्ति, मानवता और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। वे न तो बाहरी कर्मकांड में विश्वास करते थे और न ही पाखंड में — उनके लिए ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम और सत्य था।

विषयविवरण
पूरा नामकबीर दास
जन्मलगभग 1440 ई.
जन्म स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
गुरुरामानंद
प्रसिद्धिदोहे और साखियाँ
भाषासधुक्कड़ी / सरल हिंदी
मृत्युलगभग 1518 ई.

Kabir Das Ke Dohe (कबीर दास के दोहे)

नीचे कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित दिए गए हैं। ये दोहे जीवन को सही दिशा देने वाली अमूल्य सीख प्रदान करते हैं।

दोहा:
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥

अर्थ:
मनुष्य के पास अपना कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी है वह ईश्वर का दिया हुआ है, इसलिए अहंकार छोड़कर समर्पण भाव रखना चाहिए।

दोहा:
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ॥

अर्थ:
भगवान का स्मरण करते-करते भक्त का अहंकार समाप्त हो जाता है और उसे हर जगह ईश्वर ही दिखाई देते हैं।

दोहा:
मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीति।
कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीति॥

अर्थ:
हार और जीत मन पर निर्भर है। मजबूत मनोबल और विश्वास से ही सफलता तथा परमात्मा की प्राप्ति होती है।

दोहा:
प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ।
प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ॥

अर्थ:
सच्चा प्रेमी मिलना कठिन है। जब सच्चे भक्त मिलते हैं तो जीवन का दुख भी सुख में बदल जाता है।

दोहा:
साँच बराबरि तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै साँच है ताकै हृदय आप॥

अर्थ:
सत्य सबसे बड़ा तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप। जिसके हृदय में सत्य है वहाँ भगवान निवास करते हैं।

दोहा:
जिस मरनै थै जग डरै, सो मेरे आनंद।
कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥

अर्थ:
जिस मृत्यु से संसार डरता है, संत उसके माध्यम से परम आनंद (ईश्वर दर्शन) की प्रतीक्षा करता है।

दोहा:
बेटा जाए क्या हुआ, कहा बजावै थाल।
आवन जावन ह्वै रहा, ज्यौं कीड़ी का नाल॥

अर्थ:
जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है, इसलिए केवल जन्म पर अत्यधिक अहंकार या उत्साह उचित नहीं।

दोहा:
कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।
गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाऊँ॥

अर्थ:
कबीर पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं — वे स्वयं को भगवान का दास मानते हैं।

दोहा:
कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम।
मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण न देई राम॥

अर्थ:
माया मनुष्य को भगवान से दूर कर देती है और उसे सही मार्ग पर चलने नहीं देती।

दोहा:
चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ।
दोइ पट भीतर आइकै, सालिम बचा न कोई॥

अर्थ:
समय की चक्की सबको पीस देती है — कोई भी सदा सुरक्षित नहीं रहता।

दोहा:
काबा फिर कासी भया, राम भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठ कबीर जीम॥

अर्थ:
कबीर सांप्रदायिक एकता का संदेश देते हैं — ईश्वर एक है, नाम अलग-अलग हैं।

दोहा:
हम भी पांहन पूजते, होते रन के रोझ।
सतगुरु की कृपा भई, डार्या सिर पैं बोझ॥

अर्थ:
सच्चे गुरु की कृपा से ही मनुष्य अंधविश्वास से मुक्त होता है।

दोहा:
साँई मेरा बाँणियाँ, सहजि करै व्यौपार।
बिन डाँडी बिन पालड़ै, तोलै सब संसार॥

अर्थ:
ईश्वर बिना किसी साधन के ही सबके कर्मों का सही हिसाब रखता है।

दोहा:
कबीर यहु घर प्रेम का, ख़ाला का घर नाँहि।
सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माँहि॥

अर्थ:
ईश्वर की प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण और अहंकार त्याग आवश्यक है।

दोहा:
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥

अर्थ:
ईश्वर के गुण अनंत हैं — उन्हें पूरी तरह वर्णित नहीं किया जा सकता।

दोहा:
असुन्न तखत अड़ि आसना, पिण्ड झरोखे नूर।
जाके दिल में हौं बसा, सैना लिये हजूर॥

अर्थ:
सच्चा चेतन स्वरूप शरीर के इन्द्रिय-झरोखों से प्रकाश फैलाता है। वही ‘मैं’ के रूप में सबके दिल में उपस्थित है।

दोहा:
बिन देखे वह देश की, बात कहै सो कूर।
आपुहि खारी खात है, बेंचत फिरै कपूर॥

अर्थ:
जिसने आत्मानुभव नहीं किया, वह ज्ञान की बड़ी बातें करता है। वह स्वयं विषयों में डूबा है और दूसरों को ऊँचा ज्ञान बाँटता फिरता है।

दोहा:
जो जन भीजै रामरस, बिगसित कबहुँ न रुख।
अनुभव भाव न दरसे, ते नर सुख न दुख॥

अर्थ:
जो साधक आत्मचिंतन में डूबे रहते हैं, वे सांसारिक सुख-दुख से ऊपर उठ जाते हैं।

दोहा:
हंसा मोति बिकानिया, कंचन थार भराय।
जो जाको मरम न जाने, सो ताको काह कराय॥

अर्थ:
जो गुरु स्वयं मुक्ति का रहस्य नहीं जानता, वह शिष्य को क्या मार्ग दिखाएगा।

दोहा:
गोरख रसिया योग के, मुये न जारी देह।
माँस गली माटी मिली, कोरी माँजी देह॥

अर्थ:
सिर्फ बाहरी योग या दिखावे से मुक्ति नहीं मिलती—शरीर अंततः मिट्टी में ही मिल जाता है।

दोहा:
गही टेक छोड़ै नहीं, जीभ चोंच जरि जाय।
ऐसो तप्त अंगार है, ताहि चकोर चबाय॥

अर्थ:
सच्चा प्रेम इतना प्रबल होता है कि कष्ट सहकर भी प्रेमी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता।

दोहा:
मानुष तेरा गुण बड़ा, माँसु न आवे काज।
हाड़ न होते आभरण, त्वचा न बाजन बाज॥

अर्थ:
मनुष्य का असली मूल्य उसके सद्गुण हैं, शरीर का नहीं।

दोहा:
पाँच तत्व का पूतरा, युक्ति रची मैं कीव।
मैं तोहि पूछौं पंडिता, शब्द बड़ा की जीव॥

अर्थ:
कबीर पंडितों से पूछते हैं—बड़ा कौन है, शब्द या चेतन जीव?

दोहा:
बिरह बाण जेहि लागिया, औषध लगे न ताहि।
सुसुकि-सुसुकि मरि-मरि जिवै, उठे कराहि-कराहि॥

अर्थ:
जिसे परमात्मा के वियोग की पीड़ा लगती है, वह उसी में तड़पता रहता है।

दोहा:
बिरह की ओदी लाकड़ी, सपचै औ धुँधवाय।
दुख ते तबहीं बाँचिहो, जब सकलो जरि जाय॥

अर्थ:
वियोग की आग तब शांत होती है जब मन की सारी वासनाएँ जल जाती हैं।

दोहा:
बिनु डाँड़े जग डाँड़िया, सोरठ परिया डाँड़।
बाटनि हारे लोभिया, गुर ते मीठी खाँड़॥

अर्थ:
मनुष्य अपने अज्ञान और लोभ से स्वयं ही दुख पाता है।

दोहा:
मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुरि न दूजी बार।
पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुरि न लागै डार॥

अर्थ:
मानव जीवन बहुत दुर्लभ है—इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

दोहा:
प्रेम पाट का चोलना, पहिर कबीरु नाच।
पानिप दीन्हों तासु को, जो तन मन बोले साँच॥

अर्थ:
जीवन के हर काम प्रेम और सत्य से करने चाहिए।

दोहा:
कनक कामिनी देखि के, तू मत भूल सुरंग।
मिलन बिछुरन दुहेलरा, जस केंचुलि तजत भुवंग॥

अर्थ:
धन-माया के मोह में पड़ना अंततः दुख ही देता है।

दोहा:
मन माया की कोठरी, तन संशय का कोट।
बिषहर मंत्र माने नहीं, काल सर्प की चोट॥

अर्थ:
अज्ञान और भ्रम मनुष्य को सत्य से दूर रखते हैं।

दोहा:
घुँघुँची भर के बोइये, उपजा पसेरी आठ।
डेरा परा काल का, साँझ सकारे जात॥

अर्थ:
शरीर बनते ही समय का प्रभाव शुरू हो जाता है—जीवन क्षणभंगुर है।

दोहा:
पानि पियावत क्या फिरो, घर-घर सायर बारि।
तृषावन्त जो होयगा, पीवगा झख मारि॥

अर्थ:
जिसे सच में ज्ञान की प्यास होगी, वह स्वयं उसे ग्रहण करेगा।

दोहा:
गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहि मस्कला देय।
शब्द छोलना छोलिके, चित दर्पण करि लेय॥

अर्थ:
सच्चा गुरु मन को साफ करके उसे दर्पण जैसा निर्मल बना देता है।

दोहा:
जाका गुरु है आँधरा, चेला काह कराय।
अंधे अंधा पेलिया, दोऊ कूप पराय॥

अर्थ:
अज्ञानी गुरु और शिष्य दोनों भटक जाते हैं।

दोहा:
जो जानहु जग जीवना, जो जानहु सो जीव।
पानि पचावहु आपना, तो पानी माँगि न पीव॥

अर्थ:
यदि जीवन का ज्ञान है तो वासनाओं को त्यागो और आत्मनिर्भर बनो।

दोहा:
हंसा सरवर तजि चले, देही परिगौ सून।
कहहिं कबीर पुकारि के, तेहि दर तेहि थून॥

अर्थ:
जीव के जाने पर शरीर निर्जीव हो जाता है—सब नश्वर है।

दोहा:
ज्यों दर्पण प्रतिबिंब देखिये, आपु दुहुँनमा सोय।
यह तत्व से वह तत्व है, याही से वह होय॥

अर्थ:
जैसी हमारी भावना होती है, वैसा ही अनुभव बनता है।

दोहा:
हीरा परा बजार में, रहा छार लपटाय।
केतेहिं मूरख पचि मुये, कोइ पारखि लिया उठाय॥

अर्थ:
सत्य हमारे पास ही है, पर उसे पहचानने वाला पारखी चाहिए।

दोहा:
धौंकी डाही लाकड़ी, वो भी करे पुकार।
अब जो जाय लोहार घर, डाहै दूजी बार॥

अर्थ:
जीव संसार के दुखों से बचने के लिए सद्गुरु की शरण चाहता है।

दोहा:
चन्दन सर्प लपेटिया, चन्दन काह कराय।
रोम-रोम विष भीनिया, अमृत कहाँ समाय॥

अर्थ:
अहंकार और विषय-वासना होने पर ज्ञान का अमृत नहीं टिकता।

दोहा:
काला सर्प शरीर में, खाइनि सब जग झारि।
बिरले ते जन बाँचि हैं, जो रामहि भजे बिचारि॥

अर्थ:
काम-वासना से वही बचता है जो विवेकपूर्वक भक्ति करता है।

दोहा:
पाँच तत्त्व के भीतरे, गुप्त बस्तु अस्थान।
बिरला मर्म कोई पाइ हैं, गुरु के शब्द प्रमान॥

अर्थ:
शरीर के भीतर छिपे आत्मतत्व को गुरु के ज्ञान से ही जाना जा सकता है।

दोहा:
साँप बिच्छू का मंत्र है, माहुरहू झारा जाय।
विकट नारि के पाले परे, काढ़ि कलेजा खाय॥

अर्थ:
कुछ मोह-बंधन ऐसे होते हैं जिनसे निकलना बहुत कठिन होता है।

दोहा:
दोहरा तो नौ तन भया, पदहि न चीन्हैं कोय।
जिन्ह यह शब्द विवेकिया, छत्र धनी है सोय॥

अर्थ:
जो आत्मज्ञान पहचान लेता है वही सच्चा स्वतंत्र और सुखी होता है।

दोहा:
जो घर हैगा सर्प का, सो घर साध न होय।
सकल संपदा ले गये, विष भरि लागा सोय॥

अर्थ:
विषय-वासना आध्यात्मिक शक्ति को नष्ट कर देती है।

दोहा:
मूरख के सिखलावते, ज्ञान गाँठि का जाय।
कोइला होय न ऊजरा, जो सौ मन साबुन लाय॥

अर्थ:
मूर्ख को कितनी भी शिक्षा दो, वह नहीं सुधरता।

दोहा:
बिरह भुवंगम पैठी के, कीन्ह करेजे घाव।
साधू अंग न मोरिहैं, ज्यों भावै त्यों खाव॥

अर्थ:
सच्चा भक्त वियोग की पीड़ा भी प्रेम से स्वीकार करता है।

दोहा:
ई माया है चूहड़ी, औ चूहड़ों की जोय।
बाप पूत अरुझाय के, संग न काहु के होय॥

अर्थ:
माया जीव और मन को उलझाकर किसी का साथ नहीं देती।

दोहा:
साहेब साहेब सब कहैं, मोहिं अंदेशा और।
साहेब से परिचय नहीं, बैठोगे केहि ठौर॥

अर्थ:
केवल नाम जपने से नहीं—सच्चा परिचय जरूरी है।

दोहा:
कल काठी कालू घुना, जतन-जतन घुन खाय।
काया मध्ये काल बसत है, मर्म न काहू पाय॥

अर्थ:
समय धीरे-धीरे शरीर को नष्ट करता रहता है।

दोहा:
सेमर केरा सूवना, छिलवे बैठा जाय।
चोंच सँवारे सिर धुनै, ई उसही को भाय॥

अर्थ:
भ्रम में पड़कर मनुष्य बाद में पछताता है।

दोहा:
जहर जिमी दै रोपिया, अमी सींचे सौ बार।
कबीर खलक ना तजै, जामें जौन विचार॥

अर्थ:
मन में बुरे विचार जम जाएँ तो उन्हें हटाना कठिन होता है।

दोहा:
मानुष बिचारा क्या करे, जाके कहै न खुलै कपाट।
स्वनहा चौक बैठाय के, फिर-फिर ऐपन चाट॥

अर्थ:
जिसका मन नहीं खुलता, उसे उपदेश देना व्यर्थ है।

दोहा:
पाँच तत्त्व का पूतरा, मानुष धरिया नाँव।
एक कला के बीछुरे, बिकल होत सब ठाँव॥

अर्थ:
सद्बुद्धि बिना मनुष्य हर जगह दुखी रहता है।

दोहा:
लोभे जन्म गँमाइया, पापै खाया पून।
साधी सो आधी कहैं, ता पर मेरा ख़ून॥

अर्थ:
लोभ मनुष्य का जीवन और पुण्य दोनों नष्ट कर देता है।

दोहा:
रतन का जतन करु, माँड़ी का सिंगार।
आया कबीरा फिर गया, झूठा है हंकार॥

अर्थ:
जीवन क्षणभंगुर है—अहंकार व्यर्थ है।

दोहा:
शब्द-शब्द सब कोई कहैं, वो तो शब्द विदेह।
जिभ्या पर आवै नहीं, निरखि परखि करि लेह॥

अर्थ:
परम सत्य शब्दों से परे है—उसे अनुभव से जानो।

दोहा:
बड़े गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार।
सतगुरु के परचै बिना, चारों बरन चमार॥

अर्थ:
अहंकार मनुष्य को नीचे गिरा देता है।

दोहा:
मैं रोवों यह जगत को, मोको रोवे न कोय।
मोको रोवे सो जना, जो शब्द विवेकी होय॥

अर्थ:
संत जगत के दुख पर रोते हैं, पर उन्हें समझने वाले कम होते हैं।

दोहा:
सब ते साँचा भला, जो साँचा दिल होय।
साँच बिना नाहिना, कोटि करे जो कोय॥

अर्थ:
सच्चा हृदय ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।

दोहा:
नौ मन दूध बटोरि के, टिपके किया बिनास।
दूध फाटि काँजी भया, हुवा घृत का नाश॥

अर्थ:
थोड़ा सा अज्ञान पूरे जीवन को बिगाड़ सकता है।

दोहा:
मानुष बिचारा क्या करे, जाके शून्य शरीर।
जो जिव झाँकि न ऊपजे, तो कहा पुकार कबीर॥

अर्थ:
जिसमें आत्मजागरण की इच्छा ही नहीं, उसे उपदेश व्यर्थ है।

दोहा:
विष के बिरवे घर किया, सर्प रहा लपटाय।
ताते जियरहिं डर भया, जागत रैनि बिहाय॥

अर्थ:
मोह-माया में फँसा मनुष्य हमेशा भय में रहता है।

दोहा:
हीरा सोइ सराहिये, सहै घनन की चोट।
कपट कुरंगी मानवा, परखत निकरा खोट॥

अर्थ:
सच्चा मनुष्य वही है जो कठिन परीक्षा में खरा उतरे।

दोहा:
माया जग साँपिनि भई, विष ले पैठि पताल।
सब जग फंदे फंदिया, चले कबीरू काछ॥

अर्थ:
माया सबको बाँधती है, पर ज्ञानी उससे बच निकलता है।

दोहा:
चलते-चलते पगु थका, नगर रहा नौ कोस।
बीचहि में डेरा परा, कहहु कौन को दोष॥

अर्थ:
गलत मार्ग चुनने पर लक्ष्य दूर रह जाता है—दोष अपना ही होता है।

दोहा:
मूढ़ कर्मिया मानवा, नख शिख पाखर आहि।
बाहनहारा क्या करै, जो बान न लागै ताहि॥

अर्थ:
जो सुनना ही नहीं चाहता, उसे ज्ञान देना कठिन है।

दोहा:
संशय सब जग खंडिया, संशय खंडे न कोय।
संशय खंडे सो जना, जो शब्द विवेकी होय॥

अर्थ:
संदेह दूर वही करता है जो विवेकशील है।

दोहा:
राह बिचारी क्या करे, जो पंथि न चले बिचार।
आपन मारग छोड़ि के, फिरे उजार-उजार॥

अर्थ:
अच्छा मार्ग भी व्यर्थ है यदि चलने वाला सही न चले।

दोहा:
शब्द हमारा तू शब्द का, सुनि मति जाहु सरक।
जो चाहो निज तत्त्व को, तो शब्दहि लेह परख॥

अर्थ:
सत्य को समझने के लिए विवेकपूर्वक विचार करना जरूरी है।

दोहा:
आगि जो लागि समुद्र में, धुवाँ न परगट होय।
की जाने जो जरि मुवा, की जाकी लाई होय॥

अर्थ:
आत्मज्ञान की अग्नि भीतर ही भीतर जलती है—इसे अनुभवी ही समझता है।

दोहा:
शब्द हमारा आदि का, पल-पल करहु याद।
अन्त फलेगी माँहली, ऊपर की सब बाद॥

अर्थ:
मूल सत्य का निरंतर स्मरण करने से अंत में आत्मस्थिति प्राप्त होती है।

दोहा:
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन।
अंधे को अंधा मिला, राह बतावै कौन॥

अर्थ:
जो स्वयं सत्य को नहीं समझता और बिना जाने चल पड़ता है, वह अज्ञान में भटकता है। यदि अंधे को अंधा मार्गदर्शक मिले तो सही रास्ता कौन बताएगा? यही स्थिति उस व्यक्ति की है जो सच्चे गुरु के बिना आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है।

दोहा:
दर्पण केरी गुफा में, स्वनहा पैठा धाय।
देखि प्रतीमा आपनी, भूँकि-भूँकि मरि जाय॥

अर्थ:
जैसे कुत्ता दर्पण में अपनी छाया देखकर उसे दुश्मन समझकर भौंक-भौंक कर मर जाता है, वैसे ही मनुष्य अपनी ही बुरी भावनाएँ दूसरों में देखकर लड़ता रहता है और जीवन नष्ट कर देता है।

दोहा:
झिलमिल झगरा झूलते, बाकि छूटि न काहु।
गोरख अटके कालपुर, कौन कहावै साहु॥

अर्थ:
योग और चमत्कारों की चमक-दमक में फँसकर बड़े-बड़े योगी भी भ्रमित हो जाते हैं। जब महान लोग ही उलझ जाएँ तो सामान्य व्यक्ति का विवेक कहाँ टिकेगा?

दोहा:
बाजीगर का बाँदरा, ऐसा जीव मन के साथ।
नाना नाच नचाय के, ले राखे अपने हाथ॥

अर्थ:
जैसे बाजीगर बंदर को नचाता है, वैसे ही मन जीव को नचाता रहता है और उसे अपने वश में रखता है। इसलिए मन पर नियंत्रण जरूरी है।

दोहा:
चन्दन बास निवारहु, तुझ कारण बन काटिया।
जियत जीव जनि मारहू, मये सबै निपातिया॥

अर्थ:
मनुष्य को चाहिए कि वह वासनाओं का त्याग करे और शरीर को अनावश्यक कष्ट न दे। केवल शरीर को पीड़ा देने से मोक्ष नहीं मिलता।

दोहा:
भँवर बिलंबे बाग में, बहु फूलन की बास।
ऐसे जीव बिलंबे विषय में, अन्तहु चले निरास॥

अर्थ:
जैसे भौंरा फूलों की सुगंध में उलझ जाता है, वैसे ही मनुष्य भोग-विलास में फँसकर अंत में निराश होकर चला जाता है।

दोहा:
अमृत केरी मोटरी, शिर से धरी उतार।
जाहि कहौं मैं एक है, सो मोहिं कहै दुइ चार॥

अर्थ:
लोगों ने आत्मज्ञान की अमूल्य वस्तु को छोड़ दिया है। जब उन्हें एकत्व का ज्ञान बताया जाता है तो वे उलटी-सीधी बातें करने लगते हैं।

दोहा:
बेड़ा बाँधिन सर्प का, भवसागर के माँहिं।
जो छोड़े तो बड़े, गहै तो डँसे बाँहिं॥

अर्थ:
अधूरा ज्ञान और कर्मकांड ऐसे हैं जैसे साँपों का बेड़ा। उन्हें पकड़े रहो तो नुकसान, छोड़ो तो भी संकट। इसलिए सही ज्ञान आवश्यक है।

दोहा:
अम्मृत केरी पूरिया, बहु बिधि दीन्हा छोरि।
आप सरीखा जो मिलै, ताहि पियावहु घोरि॥

अर्थ:
सद्गुरु कहते हैं— मैंने ज्ञान का भंडार खोल दिया है। अब जो योग्य शिष्य मिले उसे यह ज्ञान अवश्य देना चाहिए।

दोहा:
बन ते भागि बेहड़े परा, करहा अपनी बान।
बेदन करहा कासो कहै, को करहा को जान॥

अर्थ:
जैसे डरकर भागा जीव और उलझन में फँस गया, वैसे ही मनुष्य एक बंधन छोड़कर दूसरे में फँस जाता है और फिर दुखी रहता है।

दोहा:
माया के झक जग जरे, कनक कामिनी लाग।
कहहिं कबीर कस बाँचिहो, रुई लपेटी आग॥

अर्थ:
धन और वासना की माया में फँसा मनुष्य ऐसे जलता है जैसे आग में लिपटी रूई। इससे बचना बहुत कठिन है।

दोहा:
लोग भरोसे कौन के, बैठ रहै अरगाय।
ऐसे जियरहिं जम लूटे, जस मटिया लुटे कसाय॥

अर्थ:
जो लोग बिना प्रयास के बैठे रहते हैं, उन्हें वासनाएँ वैसे ही लूट लेती हैं जैसे कसाई मांस को लूटता है।

दोहा:
लाई लावनहार की, जाकी लाई पर जरे।
बलिहारी लावनहार की, छप्पर बाँचे घर जरे॥

अर्थ:
सद्गुरु द्वारा जगाई गई ज्ञान की अग्नि अहंकार और आसक्ति को जला देती है और आत्मा को मुक्त करती है।

दोहा:
मन भर के बोइये, घुँघुँची भर नहिं होय।
कहा हमार माने नहीं, अंतहु चले बिगोय॥

अर्थ:
सकाम कर्म थोड़े भी हों तो जन्म का कारण बनते हैं। लोग चेतावनी नहीं मानते और अंत में पछताते हैं।

दोहा:
साखी पुरंदर ढहि परे, बिबि अक्षर युग चार।
कबीर रसना रंभन होत है, कोइ कै न सकै निरुवार॥

अर्थ:
लंबे समय से लोग शब्दों और कर्मकांड में उलझे हैं। सत्य का निर्णय करने वाला विरला ही होता है।

दोहा:
सावन केरा सेहरा, बुन्द परा असमान।
सारी दुनियाँ वैष्णव भई, गुरु नहिं लागा कान॥

अर्थ:
जैसे सावन में वर्षा बहुत होती है, वैसे ही आज गुरु बहुत हैं, पर सच्चा उपदेश देने वाला विरला है।

दोहा:
ये कबीर तैं उतरि रहु, तेरो सम्मल परोहन साथ।
सम्मल घटे न पगु थके, जीव बिराने हाथ॥

अर्थ:
कबीर कहते हैं— हे साधक! लोगों के कल्याण के लिए समाज में उतरकर उन्हें सही मार्ग दिखाओ।

दोहा:
बहुत दिवस ते हींड़िया, शून्य समाधि लगाय।
करहा पड़ा गाड़ में, दूरि परा पछिताय॥

अर्थ:
कबीर कहते हैं कि केवल शून्य समाधि में बैठे रहने से परम सत्य नहीं मिलता। जैसे खरगोश अपने घर से दूर गड्ढे में गिरकर पछताता है, वैसे ही बिना सही मार्ग के साधना व्यर्थ हो सकती है।

दोहा:
मानुष ह्वै के ना मुवा, मुवा सो डाँगर ढोर।
एकौ जीव ठौर नहिं लागा, भया सो हाथी घोर॥

अर्थ:
जो मनुष्य होकर भी मानवता नहीं अपनाता, वह पशु समान जीवन जीता है। सच्चा मनुष्य वही है जो विवेक और मानव धर्म को धारण करे।

दोहा:
ई मन चंचल ई मन चोर, ई मन शुद्ध ठगहार।
मन-मन करते सुर-नर मुनि जहँड़े, मन के लक्ष दुवार॥

अर्थ:
मन अत्यंत चंचल और छल करने वाला है। देवता और मुनि भी मन के जाल में उलझ जाते हैं क्योंकि मन के निकलने के अनेक रास्ते हैं।

दोहा:
समुझे की गति एक है, जिन्ह समुझा सब ठौर।
कहिं कबीर ये बीच के, बलकहिं और की और॥

अर्थ:
जिन्होंने सत्य को सही रूप में समझ लिया, उनकी अवस्था एक समान हो जाती है। अधूरे ज्ञान वाले लोग ही इधर-उधर की बातें करते हैं।

दोहा:
बेह्या दीन्हों खेत को, बेह्या खेतहिं खाय।
तीन लोक संशय परी, मैं काहि कहौं समुझाय॥

अर्थ:
जैसे खेत की रक्षा करने वाली बाड़ ही फसल को खा जाए, वैसे ही मनुष्य की बनाई माया ही उसे दुख देती है।

दोहा:
मन गयंद माने नहीं, चले सुरति के साथ।
महावत बिचारा क्या करे, जो अंकुश नांही हाथ॥

अर्थ:
मन मदमस्त हाथी की तरह है। यदि विवेक का अंकुश न हो तो जीव उसे नियंत्रित नहीं कर पाता।

दोहा:
जाग्रत रूपी जीव है, शब्द सोहागा सेत।
जर्द बुन्द जल कूकुही, कहहिं कबीर कोई देख॥

अर्थ:
जीव मूलतः शुद्ध चेतन है, पर विषय-वासनाओं में पड़कर वह अपनी असली स्थिति भूल जाता है।

दोहा:
चक्की चलती देख के, मेरे नैनन आया रोय।
दुइ पाट भीतर आय के, साबुत गया न कोय॥

अर्थ:
समय और संसार की चक्की सबको पीस देती है। इसके बीच कोई भी सदा सुरक्षित नहीं रहता।

दोहा:
मलयागिर की बास में, वृक्ष रहा सब गोय।
कहबे को चंदन भया, मलयागिर ना होय॥

अर्थ:
अच्छे लोगों की संगति से साधारण व्यक्ति भी सुगंधित लगता है, पर वह मूल रूप से महान नहीं बन जाता।

दोहा:
बलिहारी वह दूध की, जामें निकरे घीव।
आधी साखी कबीर की, चारि वेद का जीव॥

अर्थ:
जैसे घी देने वाला दूध श्रेष्ठ है, वैसे ही कबीर की थोड़ी-सी साखी भी वेदों के सार के समान है।

दोहा:
साँचा सौदा कीजिये, अपने मन में जानि।
साँचे हीरा पाइये, झूठे मूलहु हानि॥

अर्थ:
सत्य का व्यापार करो — सच्चाई अपनाने से ही असली लाभ मिलता है, झूठ अंततः नुकसान देता है।

दोहा:
पछापछी के कारने, सब जग रहा भुलान।
निर्पक्ष होय के हरि भजै, सोई सन्त सुजान॥

अर्थ:
पक्षपात और मोह के कारण लोग सत्य से भटक जाते हैं। निष्पक्ष होकर भक्ति करने वाला ही सच्चा संत है।

दोहा:
गुरु की भेली जिव डरे, काया सींचनहार।
कुमति कमाई मन बसे, लाग जुवा की लार॥

अर्थ:
भोगों में फँसा मनुष्य सद्गुरु की शिक्षा से डरता है क्योंकि उसका मन गलत कमाई और सुख-भोग में लगा रहता है।

दोहा:
कबीर जात पुकारिया, चढ़ि चन्दन की डार।
बाट लगाये ना लगे, पुनि का लेत हमार॥

अर्थ:
कबीर कहते हैं— मैं सन्मार्ग बता रहा हूँ। यदि लोग उस पर न चलें तो उनका ही नुकसान है।

दोहा:
शब्दै मारा गिर परा, शब्दै छोड़ा राज।
जिन्ह-जिन्ह शब्द विवेकिया, तिनका सरिगौ काज॥

अर्थ:
गलत शब्द मनुष्य को गिरा देते हैं और सही ज्ञान उसे वैराग्य की ओर ले जाता है।

दोहा:
जोबन सायर मूझते, रसिया लाल कराय।
अब कबीर पाँजी परे, पन्थी आवहिं जाय॥

अर्थ:
लोग बिना विचार किए हर वाणी को सत्य मान लेते हैं और उसी के अनुसार जीवन जीने लगते हैं।

दोहा:
साहु चोर चीन्है नहीं, अँधा मति का हीन।
पारख बिना बिनास है, कर बिचार होहु भीन॥

अर्थ:
विवेकहीन व्यक्ति सच्चे और झूठे गुरु में भेद नहीं कर पाता। परख के बिना पतन निश्चित है।

दोहा:
फहम आगे फहम पाछे, फहम दाहिने डेरि।
फहम पर जो फहम करै, सो फहम है मेरि॥

अर्थ:
हर दिशा में समझ और सावधानी रखने वाला ही सच्चा विवेकी है।

दोहा:
बाँह मरोरे जात हो, मोहि सोवत लिये जगाय।
कहहिं कबीर पुकारि के, ई पिंडे होहु कि जाय॥

अर्थ:
सद्गुरु जीव को जगाते हैं और संकेत देते हैं कि मुक्ति इसी जीवन में संभव है।

दोहा:
केते दिन ऐसे गये, अनरूचे का नेह।
ऊषर बोय न ऊपजै, जो अति घन बरसे मेह॥

अर्थ:
अश्रद्धालु व्यक्ति को उपदेश देना ऊसर भूमि में बीज बोने जैसा है — फल नहीं मिलता।

दोहा:
समुझि बूझि जड़ हो रहै, बल तजि निर्बल होय।
कहहिं कबीर ता संत का, पला न पकरै कोय॥

अर्थ:
सच्चा ज्ञानी अहंकार छोड़कर सरल बन जाता है — उसे कोई छल नहीं सकता।

दोहा:
कहन्ता तो बहुते मिला, गहन्ता मिला न कोय।
सो कहन्ता बहि जान दे, जो न गहन्ता होय॥

अर्थ:
ज्ञान की बातें करने वाले बहुत हैं, पर उसे जीवन में उतारने वाले बहुत कम।

दोहा:
गृह तजि के भये उदासी, बन खण्ड तप को जाय।
चोली थाकी मारिया, बेरई चुनि-चुनि खाय॥

अर्थ:
भावुक होकर घर छोड़ देना सच्चा वैराग्य नहीं। बिना समझ के संन्यास अंततः कठिनाई देता है।

दोहा:
जिभ्या केरे बन्द दे, बहु बोलन निरूवार।
पारखी से संग करू, गुरुमुख शब्द विचार॥

अर्थ:
वाणी पर संयम रखो और विवेकी संतों की संगति करो।

दोहा:
हीरा तहाँ न खोलिये, जहँ कुँजरों की हाट।
सहजै गाँठी बाँधि के, लगिये अपनी बाट॥

अर्थ:
अयोग्य लोगों के सामने ज्ञान की बातें करना व्यर्थ है।

दोहा:
तन संशय मन सोनहा, काल अहेरी नीत।
एकै डाँग बसेरवा, कुशल पूछो का मीत॥

अर्थ:
जब शरीर, मन और अज्ञान साथ हों तो जीवन संकट में रहता है।

दोहा:
हंस बकु देखा एक रंग, चरें हरियरे ताल।
हंस क्षीर ते जानिये, बकुहिं धरेंगे काल॥

अर्थ:
सच्चे और झूठे में भेद विवेक से ही पता चलता है।

दोहा:
कोठी तो है काठ की, ढिग-ढिग दीन्हीं आग।
पण्डित जरि झोली भये, साकत उबरे भाग॥

अर्थ:
अहंकारी ज्ञान भी विनाश का कारण बन सकता है; सरल व्यक्ति कभी-कभी बच जाता है।

दोहा:
शब्द-शब्द बहु अन्तरे, सार शब्द मथि लीजै।
कहहिं कबीर जहाँ सार शब्द नहिं, धृग जीवन सो जीजै॥

अर्थ:
हर शब्द समान नहीं होता — विवेक से सार ग्रहण करना चाहिए।

दोहा:
मूरख सों क्या बोलिये, शठ सों काह बसाय।
पहन में क्या मारिये, जो चोखा तीर नसाय॥

अर्थ:
मूर्ख को समझाना व्यर्थ है — अच्छा उपदेश भी असर नहीं करता।

दोहा:
ताकी पूरी क्यों परे, जाके गुरु न लाखई बाट।
ताके बेड़ा बूड़ि हैं, फिरि-फिरि औघट घाट॥

अर्थ:
सद्गुरु के बिना जीवन की नाव बार-बार डूबती है।

दोहा:
भँवरजाल बगुजाल है, बूड़े बहुत अचेत।
कहहिं कबीर ते बाँचि हैं, जाके हृदय विवेक॥

अर्थ:
माया के जाल से वही बचता है जिसके पास विवेक है।

दोहा:
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय।
हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥

अर्थ:
कबीर कहते हैं — मेरी वाणी को वही समझेगा जो गहरे ज्ञान का अधिकारी है।

दोहा:
समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई।
देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई॥

अर्थ:
जब ज्ञान जागता है तो विषय-वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं और आत्मा ऊँचे स्तर पर पहुँचती है।

दोहा:
हंसा तू तो सबल था, हलुकी अपनी चाल।
रंग कुरंगे रंगिया, तैं किया और लगवार॥

अर्थ:
हे जीव! तू मूल रूप से शक्तिशाली था, पर वासनाओं में फँसकर कमजोर हो गया।

दोहा:
ढिग बूड़ा उतरा नहीं, याहि अंदेशा मोहिं।
सलिल मोह की धार में, क्या नींदरि आई तोहिं॥

अर्थ:
मोह में डूबा जीव अपनी असली स्थिति भूल जाता है — यही कबीर की चिंता है।

दोहा:
चकोर भरोसे चन्द्र के, निगलै तप्त अंगार।
कहैं कबीर डाहै नहीं, ऐसी वस्तु लगार॥

अर्थ:
प्रेम इतना प्रबल होता है कि कष्ट भी महसूस नहीं होता।

दोहा:
एक-एक निरूवारिये, जो निरूवारी जाय।
दोय मुख का बोलना, घना तमाचा खाय॥

अर्थ:
सत्संग में स्पष्ट निर्णय करो — दोहरी बात करने वाला अपमान पाता है।

दोहा:
जाके जिभ्या बन्द नहिं, हृदया नाहीं साँच।
ताके संग न लागिये, घाले बटिया माँझ॥

अर्थ:
जिसमें संयम और सत्य न हो, उसका साथ नहीं करना चाहिए।

दोहा:
मन कहै कब जाईये, चित्त कहै कब जाव।
छौ मास के हींड़ते, आध कोस पर गाँव॥

अर्थ:
लक्ष्य पास होते हुए भी अज्ञान के कारण मनुष्य भटकता रहता है।

दोहा:
कबीर भरम न भाजिया, बहुबिधि धरिया भेष।
साँई के परचावते, अंतर रहि गइ रेष॥

अर्थ:
केवल बाहरी वेश बदलने से भ्रम नहीं मिटता — भीतर की वासना समाप्त करनी जरूरी है।

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