बहुत समय पहले की बात है। एक लेखक कलकत्ता शहर में रहता था। उसकी एक छोटी-सी बेटी थी जिसका नाम मिनी था। मिनी लगभग पाँच साल की थी और बहुत ही चंचल और बातूनी थी। वह एक पल भी चुप नहीं रह सकती थी। सुबह उठते ही वह तरह-तरह के सवाल पूछना शुरू कर देती थी।
उसकी माँ अक्सर उसे डाँट देती थी, लेकिन उसके पिता ऐसा नहीं कर पाते थे। उन्हें मिनी की बातें बहुत प्यारी लगती थीं। जब भी वह लिखने बैठते, मिनी उनके पास आकर कुछ न कुछ पूछने लगती।
एक दिन सुबह लेखक अपने उपन्यास का एक अध्याय लिख रहे थे। तभी मिनी दौड़ती हुई आई और बोलने लगी—
“बाबूजी, रामदयाल दरबान कौए को काक कहता है। उसे कुछ पता ही नहीं!”
लेखक अभी कुछ जवाब देते, उससे पहले ही मिनी दूसरा सवाल पूछ बैठी—
“और बाबूजी, भोला कहता है कि आसमान में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसलिए बारिश होती है। क्या वह झूठ बोलता है?”
लेखक मुस्कुराने लगे। मिनी की बातें सुनकर उनका काम बार-बार रुक जाता था।
काबुलीवाले से पहली मुलाकात
उसी दिन अचानक मिनी खिड़की की ओर भागी और जोर से चिल्लाई—
“काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला!”
सड़क पर एक लंबा-सा आदमी चल रहा था। उसने ढीले-ढाले कपड़े पहन रखे थे, सिर पर पगड़ी थी और कंधे पर सूखे मेवों से भरी झोली टंगी हुई थी। वह अफगानिस्तान के काबुल शहर से आया था, इसलिए लोग उसे काबुलीवाला कहते थे। उसका नाम रहमत था।
मिनी ने जैसे ही उसे पुकारा, वह मुस्कुराते हुए घर की ओर आने लगा। लेकिन उसे अपनी तरफ आता देखकर मिनी डर गई और तुरंत घर के अंदर भाग गई। उसे लगता था कि उसकी झोली में बच्चों को डालकर ले जाता होगा।
थोड़ी देर बाद वह आदमी घर के सामने आ गया। लेखक ने सोचा कि उसे खाली हाथ लौटाना ठीक नहीं होगा। इसलिए उन्होंने उससे थोड़े मेवे खरीद लिए और उससे बातें करने लगे।
उसका नाम रहमत था और वह हर साल काबुल से कलकत्ता मेवे बेचने आता था।
मिनी और रहमत की दोस्ती
लेखक ने सोचा कि मिनी का डर दूर करना चाहिए। उन्होंने उसे अंदर से बुलवाया। मिनी धीरे-धीरे आई और अपने पिता के पास खड़ी हो गई।
रहमत ने अपनी झोली से किसमिस और बादाम निकालकर उसे देने की कोशिश की, लेकिन मिनी ने कुछ नहीं लिया। वह अपने पिता से चिपकी रही।
यही उनकी पहली मुलाकात थी।
कुछ दिनों बाद लेखक ने देखा कि मिनी और रहमत के बीच अच्छी दोस्ती हो गई है। रहमत अक्सर घर के पास आता और मिनी से बातें करता।
मिनी हमेशा उससे एक ही सवाल पूछती—
“काबुलीवाला, तुम्हारी झोली में क्या है?”
रहमत मजाक में कहता—
“हाथी!”
यह सुनकर दोनों जोर से हँसने लगते।
मज़ेदार बातचीत
उनकी बातचीत में एक और मज़ेदार बात होती थी। रहमत अक्सर मिनी से कहता—
“तुम ससुराल मत जाना।”
मिनी को “ससुराल” शब्द का मतलब ठीक से समझ में नहीं आता था। इसलिए वह उल्टा उससे पूछती—
“तुम ससुराल कब जाओगे?”
तब रहमत मजाक में मुट्ठी तानकर कहता—
“हम ससुर को मारेगा!”
यह सुनकर मिनी बहुत हँसती।
इस तरह एक छोटे बच्चे और एक बड़े आदमी के बीच अजीब लेकिन प्यारी दोस्ती हो गई।
मिनी की माँ का डर
मिनी की माँ को रहमत पर बिल्कुल भरोसा नहीं था। उन्हें हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं वह मिनी को उठा न ले जाए।
वह अपने पति से कहती—
“क्या पता, काबुल में बच्चों को बेचते हों!”
लेकिन लेखक को ऐसा नहीं लगता था। उन्हें रहमत एक अच्छा इंसान लगता था।
अचानक घटी एक घटना
एक दिन सुबह अचानक सड़क पर बहुत शोर हुआ। लेखक बाहर आए तो देखा कि दो सिपाही रहमत को पकड़कर ले जा रहे हैं।
उसके कपड़ों पर खून के दाग थे और एक सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा था।
पता चला कि रहमत ने एक आदमी को चाकू मार दिया था। उस आदमी ने उससे उधार लिया था लेकिन पैसे देने से मना कर दिया। इसी बात पर दोनों में झगड़ा हो गया।
मिनी दौड़ती हुई बाहर आई और बोली—
“काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला!”
रहमत उसे देखकर मुस्कुराया।
मिनी ने पूछा—
“तुम ससुराल जाओगे?”
रहमत ने हँसकर कहा—
“हाँ, वहीं जा रहा हूँ।”
लेकिन इस बार उसके हाथ बंधे हुए थे।
इस घटना के बाद उसे कई साल की जेल की सजा हो गई।
कई साल बाद
समय बीतता गया। मिनी बड़ी हो गई। अब वह पहले जैसी चंचल बच्ची नहीं रही थी।
धीरे-धीरे उसने रहमत को भी भूल दिया।
कई साल बाद मिनी की शादी तय हो गई। घर में शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। शहनाई बज रही थी और हर तरफ खुशी का माहौल था।
उसी समय अचानक रहमत घर आ गया। वह जेल से छूटकर आया था।
पहले तो लेखक उसे पहचान नहीं पाए। अब उसके बाल छोटे थे और चेहरा पहले जैसा नहीं रहा था।
रहमत ने पूछा—
“बाबू साहब, आपकी बच्ची कहाँ है?”
लेखक ने कहा—
“आज घर में शादी है, आज मिलना मुश्किल है।”
रहमत उदास हो गया और जाने लगा।
एक पिता का दर्द
जाते-जाते उसने कहा—
“ये अंगूर और मेवे बच्ची के लिए लाया था।”
फिर उसने अपने कपड़ों से एक पुराना कागज निकाला।
उस कागज पर एक छोटे बच्चे के हाथ की छाप थी।
रहमत ने बताया कि वह उसकी बेटी के हाथ की छाप है। वह हर साल उसे देखकर अपनी बेटी को याद करता था।
यह देखकर लेखक की आँखें भर आईं। उन्हें लगा कि रहमत भी उनकी तरह एक पिता है।
उन्होंने मिनी को बुलवाया।
भावुक मिलन
मिनी अब बड़ी हो चुकी थी। शादी के कपड़ों में सजी हुई वह शर्माते हुए आई।
रहमत उसे देखकर कुछ देर चुप रहा।
फिर मुस्कुराकर बोला—
“लल्ली, ससुराल जा रही है क्या?”
मिनी शरमा गई और कुछ बोल नहीं पाई।
रहमत समझ गया कि उसकी बेटी भी अब बड़ी हो गई होगी।
लेखक का दिल पिघल गया।
उन्होंने रहमत को पैसे दिए और कहा—
“अपने देश लौट जाओ और अपनी बेटी से मिल आओ।”
रहमत खुशी-खुशी अपने देश लौट गया।
कहानी से शिक्षा
इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं—
- पिता और बेटी का प्यार दुनिया में सबसे पवित्र होता है।
- इंसान चाहे किसी भी देश का हो, भावनाएँ सबकी एक जैसी होती हैं।
- दोस्ती उम्र या भाषा नहीं देखती।
- मानवता सबसे बड़ा धर्म है।
आइये पढ़ते और जानते है की रबीन्द्रनाथ टैगोर जी का जीवन परिचय क्या है
