ब्राह्मण किसकी पूजा करे? – तेनालीराम की बुद्धिमत्ता भरी कहानी

ब्राह्मण किसकी पूजा करे? – तेनालीराम की बुद्धिमत्ता भरी कहानी

ब्राह्मण किसकी पूजा करे:-
एक दिन विजयनगर के राजदरबार में असाधारण शांति थी। न तो किसी प्रजा की शिकायत आई थी और न ही किसी मंत्री ने कोई विशेष समस्या रखी थी। महाराज कृष्णदेव राय अपने सिंहासन पर बैठे सोच रहे थे कि आज का दरबार यूँ ही खाली-खाली न निकल जाए।

कुछ देर मौन रहने के बाद महाराज ने मुस्कराते हुए कहा,
“आज दरबार में कोई बड़ा कार्य नहीं है। ईश्वर की कृपा से राज्य में सब कुशल है। क्यों न आज हम किसी ज्ञानवर्धक विषय पर चर्चा करें?”

महाराज की बात सुनकर सभी मंत्री और दरबारी सतर्क हो गए।
महाराज ने आगे पूछा,
“क्या आप लोगों में से कोई ऐसा विषय सुझा सकता है, जिस पर सार्थक चर्चा हो सके?”

तभी तेनालीराम ने विनम्रता से हाथ जोड़ते हुए कहा,
“महाराज, यदि विषय का चयन आप स्वयं करें, तो वह चर्चा और भी उपयोगी होगी।”

महाराज को तेनालीराम की यह बात पसंद आई। उन्होंने कुछ क्षण सोचा और फिर बोले,
“आप सभी जानते हैं कि हमारे समाज में ब्राह्मण को पूजनीय माना जाता है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—तीनों वर्ग ब्राह्मण का सम्मान करते हैं। अब मेरा प्रश्न यह है कि ब्राह्मण किसकी पूजा करे?”

यह प्रश्न सुनते ही कई मंत्री मुस्करा दिए। उन्हें यह प्रश्न बहुत सरल लगा।
एक मंत्री तुरंत बोला,
“महाराज, इसमें सोचने की क्या बात है? ब्राह्मण गाय को पवित्र मानते हैं। गाय तो कामधेनु का प्रतीक है, इसलिए ब्राह्मण को गाय की पूजा करनी चाहिए।”

उस मंत्री की बात सुनकर दरबार में बैठे अधिकतर लोग सहमति में सिर हिलाने लगे। सबको लगा कि प्रश्न का सही उत्तर मिल चुका है।

महाराज ने अब तेनालीराम की ओर देखा और बोले,
“तेनालीराम, क्या तुम भी इसी उत्तर से संतुष्ट हो या तुम्हारी कोई अलग राय है?”

तेनालीराम ने शांत स्वर में उत्तर दिया,
“महाराज, गाय को तो सभी पवित्र मानते हैं—मनुष्य भी और देवता भी। इस बात से मैं भी सहमत हूँ और हमारे अनेक विद्वान भी।”

महाराज ने तुरंत एक और प्रश्न दाग दिया,
“यदि गाय इतनी पवित्र है, तो ब्राह्मण गौ-चर्म यानी गाय की खाल से बने जूते और चप्पल क्यों पहनते हैं?”

यह सुनते ही पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
मंत्रियों के चेहरे उतर गए। किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था। महाराज का प्रश्न बिल्कुल सही था, पर उसका समाधान किसी को नहीं सूझ रहा था।

कुछ देर बाद महाराज ने घोषणा की,
“जो भी इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देगा, उसे मैं एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार स्वरूप दूँगा।”

एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ सुनते ही सबके कान खड़े हो गए, लेकिन उत्तर फिर भी किसी के पास नहीं था। सब चुपचाप अपनी-अपनी जगह बैठे रहे।

तभी तेनालीराम अपने आसन से उठा।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
“महाराज, ब्राह्मण के चरण यानी पैर अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। कहा जाता है कि ब्राह्मण के चरण स्पर्श करना भी तीर्थ यात्रा के समान पुण्य देता है। इसलिए यदि ब्राह्मण गौ-चर्म से बने जूते पहनता है, तो उस गाय को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।”

दरबार में कुछ लोग मुस्कराए, कुछ हैरान रह गए।

महाराज ने गम्भीर स्वर में कहा,
“तेनालीराम, तर्क चाहे जैसा भी हो, गलत तो गलत ही होता है। गौ-चर्म से बने जूते-चप्पल पहनना उचित नहीं कहा जा सकता—चाहे पहनने वाला ब्राह्मण हो या किसी अन्य वर्ग का।”

फिर महाराज मुस्कराए और बोले,
“लेकिन मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि तेनालीराम ने बिना डरे उत्तर देने का साहस किया और अपनी चतुर बुद्धि का परिचय दिया। इसलिए यह एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ उसी को दी जाएँगी।”

यह सुनते ही पूरा दरबार तालियों से गूँज उठा।
तेनालीराम ने विनम्रता से पुरस्कार स्वीकार किया और एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि उसकी बुद्धि और साहस ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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