Renuka Nibandh के इस लेख में हम हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक फणीश्वरनाथ रेणु के चर्चित आत्मकथात्मक निबंध ‘बट बाबा’ को आसान और सरल हिंदी में समझेंगे। इस निबंध में रेणु ने अपने बचपन, गाँव, दादी की यादों, बीमारी, अंधविश्वास, ग्रामीण जीवन, प्रकृति, पक्षियों और अपने जीवन से जुड़े उस विशाल बरगद के पेड़ का वर्णन किया है, जिसे पूरा गाँव ‘बट बाबा’ के नाम से पूजता था। यह केवल एक पेड़ की कहानी नहीं है, बल्कि लेखक के बचपन, स्मृतियों, भावनाओं और अपनी मिट्टी से जुड़े गहरे संबंध की कहानी है।
फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी साहित्य के महान आंचलिक कथाकार माने जाते हैं। उनका जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उन्होंने अपने साहित्य में गाँव, किसान, मजदूर, लोकजीवन, ग्रामीण संस्कृति और आम आदमी के सुख-दुख को बहुत करीब से प्रस्तुत किया। ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’, ‘मारे गए गुलफाम’, ‘पंचलाइट’, ‘ठेस’ और ‘संवदिया’ जैसी उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखती हैं। ‘बट बाबा’ में भी उनके अपने गाँव और बचपन की स्मृतियाँ इतनी जीवंत हैं कि पाठक स्वयं उस बरगद के नीचे खड़ा महसूस करने लगता है।
फणीश्वरनाथ रेणु का ‘ईश्वर रे, मेरे बेचारे’ निबंध
अपने बारे में कुछ लिखने की बात सोचते ही फणीश्वरनाथ रेणु के मन में सबसे पहले अपने गाँव का वह विशाल बरगद का पेड़ दिखाई देता है, जिसे वे ‘बट बाबा’ कहते थे। उनके लिए वह केवल एक पेड़ नहीं था। वह उनके बचपन का साथी था, गाँव की पहचान था, गाँव के लोगों की आस्था का केंद्र था और उनके जीवन की अनगिनत यादों का साक्षी था। इसलिए जब रेणु अपने जीवन के बारे में लिखना चाहते हैं, तो उन्हें लगता है कि बट बाबा को पीछे छोड़कर अपनी कहानी लिखना संभव ही नहीं है।
लेखक के मन में बट बाबा की छवि किसी साधारण वृक्ष की नहीं, बल्कि एक विशाल और पूजनीय शक्ति की है। उन्हें वह एक महान पेड़, एक विशाल वटवृक्ष और ऋषि के समान दिखाई देता है। उसके नीचे उनका बचपन बीता था। उसी पेड़ के आसपास उन्होंने गाँव का जीवन देखा था। उसकी शाखाओं पर पक्षियों का बसेरा था, उसकी छाया में राहगीर आराम करते थे और गाँव के लोगों की अनेक धार्मिक तथा सामाजिक परंपराएँ उससे जुड़ी हुई थीं।
रेणु अपने जीवन की शुरुआत करने से पहले बट बाबा को याद करते हैं। वे बताते हैं कि वे बचपन से ही ऐसे वातावरण में पले-बढ़े जहाँ पेड़-पौधों और प्रकृति को भी धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता था। गाँव के लोग बट बाबा को केवल पेड़ नहीं मानते थे। उनके लिए वह एक देवता थे। गाँव का हर व्यक्ति किसी नए काम की शुरुआत करने से पहले उस पेड़ के सामने सिर झुकाता था। गाँव से बाहर जाते समय और वापस लौटते समय भी लोग बट बाबा को प्रणाम करते थे।
लेखक बताते हैं कि जब वे केवल छह महीने के थे, तब उनकी दादी उन्हें एक अमावस्या की रात उस बरगद के नीचे लेकर गई थीं। दादी ने उन्हें धरती पर सुलाया और बट बाबा से मनौती माँगी। दादी की आस्था इतनी गहरी थी कि उन्होंने मानो अपना सब कुछ उस देवता के भरोसे छोड़ दिया था। उनके लिए यह बरगद उनके पोते के जीवन की रक्षा करने वाला देवता था।
रेणु स्वीकार करते हैं कि वे भी बचपन से अंधविश्वासों के बीच पले-बढ़े। उनके लिए बट बाबा सचमुच एक जीवित शक्ति थे। जिस तरह गाँव के लोग बरगद को देवता मानते थे, उसी तरह बीमारी को भी किसी अदृश्य शक्ति के रूप में देखते थे। उस समय चिकित्सा सुविधाएँ बहुत कम थीं और गाँव के लोगों में बीमारी के कारणों को लेकर अनेक तरह की मान्यताएँ प्रचलित थीं।
रेणु अपने बचपन के समय में फैले मलेरिया और काला-आजार जैसे रोगों को याद करते हैं। उन बीमारियों का गाँव में इतना डर था कि उनका नाम सुनकर ही लोग घबरा जाते थे। मलेरिया उस समय बहुत गंभीर बीमारी थी। गाँव में लगभग हर साल इसका प्रकोप फैल जाता था। कई लोग बीमार पड़ते और अनेक लोगों की जान चली जाती थी।
रेणु स्वयं भी बचपन में बार-बार मलेरिया की चपेट में आते थे। वे बताते हैं कि अलग-अलग अंतराल पर आने वाले बुखारों को गाँव के लोग अलग-अलग नामों से पहचानते थे। कभी एक दिन छोड़कर बुखार आता, कभी दो दिन के अंतर से और कभी अचानक तेज बुखार चढ़ जाता। बीमारी इतनी भयानक होती थी कि मजबूत से मजबूत व्यक्ति भी कुछ ही समय में कमजोर पड़ जाता था।
गाँव में हर साल वर्षा और उसके बाद के महीनों में मलेरिया का डर छा जाता था। किसान खेतों में काम नहीं कर पाते थे। मजदूरों की कमी हो जाती थी और कई बार किसानों की फसल खेत में ही खराब हो जाती थी। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती थी। जब सर्दी खत्म होती और फागुन की हवा चलती, तब रेणु जैसे बच्चे स्कूल पहुँचते तो पता चलता कि उनके कई साथी अब इस दुनिया में नहीं रहे।
ऐसे समय में पूरे गाँव में डर का वातावरण बना रहता था। लोगों को हमेशा यह चिंता सताती रहती थी कि इस बार बीमारी किसके घर जाएगी। लोग मन ही मन बट बाबा से प्रार्थना करते थे कि उनका परिवार सुरक्षित रहे। वे चाहते थे कि गाँव किसी बड़ी बीमारी, संकट और विपत्ति से बचा रहे। इस तरह बट बाबा ग्रामीण जीवन में केवल धार्मिक विश्वास का केंद्र नहीं थे, बल्कि लोगों की उम्मीद और सुरक्षा की भावना से भी जुड़े थे।
रेणु बताते हैं कि उनके बचपन में जब दवा और इलाज से भी उनका बुखार ठीक नहीं हुआ, तब उनकी दादी ने बट बाबा की शरण ली। कई दिनों तक दवा लेने के बाद भी उनका तेज बुखार कम नहीं हो रहा था। उन्हें बहुत तेज ज्वर था और वे बीमारी के कारण परेशान थे। तब दादी ने उपवास किया और बट बाबा से मनौती माँगी।
उस समय लेखक की हालत बहुत खराब थी। उनका शरीर तेज बुखार से तप रहा था। दादी उनके पास बैठीं और उनके माथे पर हाथ रखा। लेखक को आज भी दादी के हाथ के उस स्पर्श की याद है। उनके लिए दादी का वह स्पर्श केवल प्यार का स्पर्श नहीं था, बल्कि सुरक्षा और अपनापन देने वाला अनुभव था।
इसके बाद लेखक को एक अद्भुत सपना दिखाई दिया। उन्होंने सपने में देखा कि बट बाबा की हर डाल नई-नई कोमल पत्तियों से भर गई है। पेड़ की शाखाओं पर लालिमा लिए हुए नए पत्ते हवा में हिल रहे हैं। धीरे-धीरे वे पत्ते टूटकर गिरने लगे और लेखक का पूरा शरीर उन कोमल पत्तों से ढक गया।
उनके सिर, चेहरे, छाती, पेट, पैरों और हाथों तक पर बरगद के पत्ते फैल गए। जैसे-जैसे पत्ते उनके शरीर को ढकते गए, वैसे-वैसे उनके शरीर का ताप कम होने लगा। उन्हें ऐसा लगा जैसे बट बाबा स्वयं उन्हें अपनी ठंडी छाया और पत्तों से ढककर आराम दे रहे हों।
सपने में लेखक अपनी दादी से पत्तों को हटाने के लिए कहते हैं क्योंकि उन्हें ठंड लगने लगी थी। लेकिन दादी उन्हें बताती हैं कि वहाँ कोई पत्ते नहीं हैं। जब रेणु आँख खोलते हैं तो उन्हें अपनी दादी का प्रसन्न चेहरा दिखाई देता है। पास ही बरगद की फुनगी पर एक चिड़िया बैठी हुई थी। उसके स्वर में जैसे कोई संदेश था—शिव का नाम लेने का संदेश।
इस अनुभव के बाद लेखक को याद नहीं कि वे फिर कभी उसी तरह मलेरिया से पीड़ित हुए हों। उनके मन में यह विश्वास और गहरा हो गया कि बट बाबा ने उनकी रक्षा की थी। बचपन की इस घटना ने बरगद के पेड़ को उनके मन में हमेशा के लिए एक विशेष स्थान दे दिया।
बट बाबा केवल रेणु के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं थे। पूरा गाँव उनसे जुड़ा हुआ था। गाँव के उत्तर में सड़क के किनारे खड़ा वह विशाल बरगद राहगीरों और यात्रियों के लिए आराम करने की जगह था। बैलगाड़ियों के साथ चलने वाले व्यापारी और गाड़ीवान उसकी छाया में बैठते थे। विवाह की बारातें भी वहाँ से गुजरती थीं। जब किसी दुल्हन की पालकी बरगद के नीचे रुकती, तो गाँव के लोग उसे देखने के लिए इकट्ठा हो जाते।
नई दुल्हन जब लाल डोली से बाहर निकलती तो वह बट बाबा के सामने सिर झुकाती और प्रणाम करती। गाँव के बच्चे खुशी से गीत गाते। कुछ वर्षों बाद वही दुल्हन जब अपने बच्चे को लेकर मायके या गाँव लौटती, तब भी उसकी गाड़ी बट बाबा के पास रुकती। वह अपने बच्चे को लेकर पेड़ के सामने आशीर्वाद माँगती।
इस प्रकार बट बाबा गाँव के लोगों के जीवन के हर महत्वपूर्ण अवसर का हिस्सा थे। जन्म, विवाह, यात्रा, बीमारी, त्योहार और संकट—हर अवसर पर उस पेड़ की उपस्थिति महसूस होती थी।
रेणु के बचपन में पक्षियों की दुनिया भी बट बाबा से जुड़ी हुई थी। पेड़ की शाखाओं पर तरह-तरह के पक्षी रहते थे। लेखक की दादी उन्हें इन पक्षियों के बारे में बताया करती थीं। कौन-सी चिड़िया किस मौसम में आती है, उसकी आवाज कैसी है, उसका व्यवहार कैसा है और उसकी बोली का क्या अर्थ माना जाता है—दादी इन सब बातों की जानकारी रेणु को देती थीं।
इस तरह दादी उनके लिए केवल परिवार की बुजुर्ग महिला नहीं थीं, बल्कि गाँव के लोकज्ञान और प्रकृति की एक जीवित पुस्तक थीं। उन्होंने रेणु को पेड़-पौधों, पक्षियों, लोकविश्वासों और गाँव की परंपराओं से परिचित कराया।
बट बाबा पर दिनभर पक्षियों का शोर सुनाई देता था। सुबह से शाम तक तरह-तरह की आवाजें आती रहती थीं। कुछ पक्षी दिन में सक्रिय रहते थे और सूर्यास्त के बाद शांत हो जाते थे। फिर रात में दूसरे पक्षियों की आवाजें सुनाई देती थीं।
रात के समय बरगद की दुनिया और भी रहस्यमय हो जाती थी। उल्लू और दूसरे निशाचर पक्षियों की आवाजें वातावरण में गूँजती थीं। गाँव के लोग इन आवाजों को कई तरह के संकेतों से जोड़ते थे। कुछ पक्षियों की आवाज को शुभ माना जाता था तो कुछ की आवाज से लोग डरते थे।
रेणु ने बचपन में इन लोकविश्वासों को बहुत करीब से देखा था। उनकी दादी उन्हें बताती थीं कि कौन-सा पक्षी किस बात का संकेत देता है। किसी पक्षी की आवाज बच्चे के लिए अशुभ मानी जाती थी तो किसी पक्षी की आवाज को आने वाले संकट से जोड़कर देखा जाता था।
इन विश्वासों में वैज्ञानिक आधार भले ही न रहा हो, लेकिन ग्रामीण जीवन में इनका अपना महत्व था। ये मान्यताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुँचती थीं और गाँव की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थीं।
बट बाबा पर केवल पक्षी ही नहीं रहते थे। बरगद की शाखाओं पर कई छोटे जीव भी रहते थे। रात के समय उनकी आवाजें सुनाई देती थीं। लेखक को इन आवाजों को सुनना अच्छा लगता था। उनके लिए रात का वह संसार डरावना होने के साथ-साथ रोमांचक भी था।
रेणु बचपन से ही देर रात तक जागते थे। उन्हें जल्दी नींद नहीं आती थी। कई बार वे रात के दो या ढाई बजे तक जागते रहते थे। परिवार के बाकी लोग सो जाते, लेकिन वे जागते रहते। दादी उन्हें नींद लाने के लिए तरह-तरह के उपाय बताती थीं।
कभी वे उन्हें आँखें बंद करके कास के फूलों के गुच्छे की कल्पना करने को कहतीं। कभी दवा या घरेलू उपाय किए जाते। लेकिन रेणु को जल्दी नींद नहीं आती थी।
आखिरकार उन्होंने अपने मन को बट बाबा की ओर लगा लिया। जब पूरी दुनिया सो रही होती, तब वे खिड़की से बाहर बरगद की फुनगी को देखते रहते। पेड़ की शाखाएँ अँधेरे आकाश में फैली रहतीं और उनके बीच जुगनू चमकते रहते।
कभी उल्लू की आवाज सुनकर वे डर जाते। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगता कि शायद बट बाबा उन्हें चिढ़ा रहे हैं और कह रहे हैं कि चिड़ियों की आवाज से डरने वाला भी कोई डरपोक होता है क्या?
एक रात उन्होंने जैसे बट बाबा की चुनौती स्वीकार कर ली। वे बिस्तर से उठे और अँधेरे में पेड़ की ओर चले गए। बरगद के नीचे पहुँचकर उन्होंने उसके चारों ओर घूमते हुए जोर-जोर से कहा कि वे किसी से नहीं डरते। वे डरपोक या कायर नहीं हैं।
इस घटना के बाद उनके परिवार ने इसे बीमारी माना। शहर से एक डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर ने बताया कि नींद में उठकर चलना एक प्रकार की बीमारी है। लेकिन इलाज के बाद भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
इसी बीच उनके पिता आर्य समाज के विचारों से प्रभावित होने लगे। उन्होंने धार्मिक मान्यताओं को नए तरीके से देखना शुरू किया। घर के पुराने देवी-देवताओं से जुड़े विश्वासों को चुनौती दी जाने लगी। लेकिन दादी के लिए बट बाबा की आस्था बहुत गहरी थी।
एक दिन गाँव में आर्य समाज का प्रचार करने के लिए एक प्रचारक आया। यह तय हुआ कि बरगद के नीचे आर्य समाज का कीर्तन होगा। उससे पहले हवन किया जाना था। गाँव में इसकी खबर फैलाई गई।
हवन शुरू हुआ ही था कि एक छोटी-सी गौरैया का बच्चा उड़ते-उड़ते हवनकुंड में गिर गया। गाँव के लोगों ने इसे एक अपशकुन की तरह देखा। हवन का कार्यक्रम रोक दिया गया।
दादी ने इस घटना को बट बाबा की चेतावनी माना। उनके लिए यह संयोग नहीं था। उनका विश्वास था कि बट बाबा इस बात से नाराज हैं कि उनके नीचे कोई ऐसी धार्मिक गतिविधि की जा रही है जो उनकी पुरानी आस्था के विपरीत है।
दादी ने रेणु को समझाया कि दूसरे देवी-देवताओं की बात अलग हो सकती है, लेकिन बट बाबा उनके लिए जाग्रत देवता हैं। उनसे कभी मजाक नहीं करना चाहिए और न ही उनकी शक्ति पर संदेह करना चाहिए।
यह प्रसंग रेणु के बचपन के उस वातावरण को दिखाता है जहाँ परंपरा और नए विचारों के बीच संघर्ष शुरू हो रहा था। एक तरफ नई शिक्षा और सुधारवादी विचार थे, तो दूसरी तरफ पीढ़ियों से चली आ रही ग्रामीण आस्था थी।
समय बीतता गया। रेणु बड़े हुए और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। उन्हें राजनीतिक गतिविधियों के कारण जेल भी जाना पड़ा। लगभग साढ़े तीन साल की नजरबंदी के बाद जब वे वर्ष 1945 में भागलपुर सेंट्रल जेल से रिहा होकर अपने गाँव लौटे, तब उनके मन में अपने गाँव को देखने की बहुत इच्छा थी।
वे सिमराहा स्टेशन से गाँव की ओर आ रहे थे। रास्ते में उन्हें अपने गाँव की पहचान तलाशने की कोशिश हो रही थी। उन्हें लगा कि वे शायद किसी अनजान गाँव की ओर जा रहे हैं। उन्हें अपना गाँव पहचान में नहीं आ रहा था।
फिर अचानक उनके मन में एक सवाल उठा—बट बाबा कहाँ हैं?
गाँव के उत्तर में सड़क के किनारे जहाँ हमेशा विशाल बरगद खड़ा रहता था, वहाँ अब कुछ नहीं था।
बट बाबा गायब थे।
रेणु के लिए यह केवल एक पेड़ का खत्म हो जाना नहीं था। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके गाँव की पहचान ही खत्म हो गई हो। उन्हें अपना गाँव खाली, उजड़ा और अजनबी दिखाई देने लगा। जिस बरगद की छाया में उन्होंने अपना बचपन बिताया था, वह अब वहाँ नहीं था।
जब उन्होंने गाँव पहुँचकर इसके बारे में पूछा, तो उन्हें बताया गया कि पिछले वर्ष एक रात अचानक बट बाबा जड़ से उखड़कर गिर गए थे। कोई बड़ा तूफान नहीं आया था। अचानक एक भयानक आवाज हुई और पेड़ गिर पड़ा। पूरा गाँव जाग गया था।
जिस पेड़ को लोग देवता मानते थे, उसके गिरने पर पूरा गाँव दुखी हो गया। औरतें, पुरुष, बच्चे, बूढ़े—सब रो रहे थे। लोगों को लग रहा था कि गाँव का रक्षक चला गया है। वे पूछ रहे थे कि अब उनकी रक्षा कौन करेगा।
लेकिन बट बाबा के गिरने के बाद भी उनकी जीवन शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। उनकी जड़ों और शाखाओं में हरियाली बनी रही। नए पत्ते भी निकल आए थे। इससे लोगों को लगा कि शायद बाबा अभी जीवित हैं।
लेकिन समय और परिस्थितियों ने उस पेड़ को भी नहीं छोड़ा।
युद्ध के समय महँगाई बढ़ गई थी। लकड़ी की कीमत बढ़ने लगी थी। एक सरकारी ठेकेदार ने उस विशाल बरगद को खरीद लिया। मशीनों की मदद से कुछ ही दिनों में उस पेड़ को काट दिया गया।
जिस बट बाबा ने वर्षों तक पूरे गाँव को छाया दी थी, जिसकी शाखाओं पर हजारों पक्षियों का घर था और जिसके नीचे गाँव की अनेक पीढ़ियों ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षण बिताए थे, उसका नामोनिशान मिट गया।
दादी ने रेणु को बताया कि अब गाँव के घर उत्तर की ओर से आने वाली तेज हवा को आसानी से नहीं झेल पाते। बरगद की छाया और उसकी विशाल शाखाएँ गाँव के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा की तरह थीं। उसके जाने के बाद कई झोपड़ियाँ आँधी में उड़ने लगीं।
रेणु ने दादी से पूछा कि उन पक्षियों का क्या हुआ जो बट बाबा की शाखाओं पर रहते थे।
दादी ने उदास मुस्कान के साथ कहा कि रेणु अभी भी बचपन की बातें करते हैं। लेकिन यह सवाल वास्तव में बहुत गहरा था। पेड़ के चले जाने के साथ केवल एक पेड़ नहीं गया था। उसके साथ पक्षियों के घर भी चले गए थे।
यहाँ लेखक का मन बहुत उदास हो जाता है। बट बाबा के बिना उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनके मन के पक्षी भी भटक रहे हैं। उनके भीतर बचपन की स्मृतियाँ बार-बार लौटती हैं।
उन्हें याद आता है कि कैसे गाँव के लोग बट बाबा से प्रार्थना करते थे। वे बीमारी से बचाने की विनती करते थे। वे चाहते थे कि खेतों में अनाज भरा रहे, घरों में सुख रहे और गाँव पर कोई विपत्ति न आए।
बट बाबा उनके बचपन की स्मृतियों का केंद्र बन चुके थे।
कई सप्ताह तक रेणु के मन में यही यादें घूमती रहीं। फिर एक दिन उन्हें लगा कि जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें बैठाकर लिखने के लिए मजबूर कर दिया हो।
उन्होंने लिखना शुरू किया।
लिखते समय उनके मन में फिर वही विशाल बरगद दिखाई देने लगा। उसकी शाखाएँ आकाश में फैल गईं। उसकी जटाएँ हवा में झूलने लगीं। उसकी डालियों पर असंख्य पक्षी चहचहाने लगे।
उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका बचपन फिर से उनके सामने जीवित हो गया हो।
उन्होंने अपनी कहानी का नाम ‘बट बाबा’ रखा और उसे कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘विश्वमित्र’ के संपादक के पास भेज दिया। कुछ समय बाद उन्हें संपादक का पत्र मिला। उनकी पहली कहानी ‘बट बाबा’ प्रकाशित हो चुकी थी।
यह रेणु के लिए बहुत भावुक क्षण था। वे अपनी दादी के पास दौड़कर गए और उनके चरण छुए। उन्होंने दादी से कहा कि बचपन में उन्होंने उन्हें न जाने कितनी कहानियाँ सुनाई हैं, लेकिन इस बार वे दादी को एक कहानी सुनाना चाहते हैं।
रेणु ने दादी को ‘बट बाबा’ की कहानी सुनाई।
कहानी सुनने के बाद दादी की आँखों में खुशी और गर्व दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि बट बाबा की महिमा लिखकर रेणु ने अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने मानो पूरे गाँव की ओर से बट बाबा की समाधि पर पहला फूल चढ़ाया है।
यह प्रसंग इस पूरे निबंध का सबसे भावुक हिस्सा है। यहाँ लेखक समझता है कि उसने केवल एक कहानी नहीं लिखी, बल्कि अपने बचपन, अपनी दादी, अपने गाँव और उस विशाल बरगद की स्मृति को शब्द दे दिए हैं।
बट बाबा अब वास्तविक रूप में वहाँ नहीं थे, लेकिन वे रेणु की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहे।
आज भी जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, जब उन्हें लगता है कि वे किसी दिशा को नहीं पहचान पा रहे हैं, जब मन भारी हो जाता है और अपने आसपास की दुनिया कुछ अजनबी-सी लगती है, तब वे आँखें बंद कर लेते हैं।
आँखें बंद करते ही उनके मन में वही पुरानी तस्वीर उभर आती है—एक विशाल बरगद के नीचे खेलता हुआ एक छोटा-सा बच्चा।
वह बच्चा उनका अपना बचपन है।
वह बरगद उनके गाँव की पहचान है।
वह बट बाबा उनकी स्मृतियों का आधार है।
और उस पेड़ से जुड़ी आवाजें, पक्षियों का कलरव, दादी का प्यार, गाँव की मान्यताएँ, बीमारी के दिन, खेत-खलिहान, विवाह की बारातें, बच्चों के गीत और ग्रामीण जीवन के छोटे-छोटे दृश्य उनके मन में आज भी जीवित हैं।
इस प्रकार ‘बट बाबा’ केवल एक पेड़ के बारे में लिखा गया निबंध नहीं है। यह एक लेखक की अपने बचपन और अपनी मिट्टी से जुड़ी आत्मीय स्मृति है। इसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच के संबंध को बहुत सुंदर तरीके से दिखाया गया है। बट बाबा एक पेड़ होते हुए भी लेखक के लिए परिवार के किसी बड़े सदस्य की तरह हैं।
इस निबंध में दादी का चरित्र भी बहुत महत्वपूर्ण है। दादी के माध्यम से रेणु ने ग्रामीण लोकजीवन, लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को सामने रखा है। दादी पक्षियों को पहचानती हैं, उनकी आवाजों के अर्थ जानती हैं, पेड़ को देवता मानती हैं और अपने पोते की बीमारी में उसी पेड़ से प्रार्थना करती हैं। उनके माध्यम से लेखक ने उस समय के ग्रामीण समाज की मानसिकता को बहुत स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत किया है।
निबंध में प्रकृति का भी बेहद सुंदर चित्रण है। बरगद की शाखाएँ, उसकी जटाएँ, नए पत्ते, पक्षियों की आवाजें, जुगनुओं की चमक, रात का सन्नाटा और गाँव का वातावरण पाठक के सामने एक पूरा दृश्य खड़ा कर देते हैं।
रेणु की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे किसी सामान्य घटना को भी इस तरह लिखते हैं कि उसमें भावनाओं की गहराई दिखाई देने लगती है। उनके लिए बरगद केवल पेड़ नहीं है। वह बचपन है, परिवार है, गाँव है, आस्था है, प्रकृति है और स्मृति है।
निबंध के अंत में बट बाबा का वास्तविक रूप भले ही समाप्त हो चुका है, लेकिन लेखक के मन में वह हमेशा जीवित रहता है। यह बात हमें यह समझाती है कि किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का हमारे जीवन में महत्व केवल उसके भौतिक रूप से नहीं होता। उससे जुड़ी यादें उसे हमारे मन में हमेशा जीवित रख सकती हैं।
‘बट बाबा’ में रेणु ने अपने बचपन को याद करते हुए एक पूरे ग्रामीण संसार को जीवित कर दिया है। इस रचना में बीमारी का भय है, दादी का प्रेम है, लोकविश्वास है, प्रकृति की सुंदरता है, गाँव का सामूहिक जीवन है, पक्षियों की दुनिया है और सबसे बढ़कर अपनी जन्मभूमि के प्रति गहरा लगाव है।
यही कारण है कि यह रचना केवल रेणु की व्यक्तिगत स्मृति नहीं रह जाती, बल्कि यह उस ग्रामीण भारत की स्मृति बन जाती है जहाँ एक विशाल पेड़ पूरे गाँव के जीवन का हिस्सा हुआ करता था। रेणुका निबंध के रूप में ‘बट बाबा’ को पढ़ते हुए हमें फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य की वह खासियत भी समझ में आती है जिसमें सामान्य जीवन की छोटी-छोटी घटनाएँ बड़ी मानवीय संवेदनाओं में बदल जाती हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि फणीश्वरनाथ रेणु का ‘बट बाबा’ निबंध उनके बचपन, गाँव, दादी, प्रकृति और स्मृतियों का भावपूर्ण दस्तावेज है। बट बाबा उनके जीवन में इतना गहरा स्थान रखते थे कि उनके बिना वे अपनी कहानी की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। पेड़ कट गया, पक्षियों के बसेरे उजड़ गए और गाँव का पुराना दृश्य बदल गया, लेकिन रेणु के मन में बट बाबा की छवि कभी नहीं मिट सकी।
आज भी जब वे अपने जीवन की कठिनाइयों के बीच दिशाहीन महसूस करते हैं, तो उनके मन में वही विशाल वटवृक्ष उभर आता है। उसके नीचे उनका बचपन खेलता हुआ दिखाई देता है और उन्हें ऐसा लगता है जैसे कोई उन्हें प्यार से पुकार रहा हो। यही स्मृति ‘बट बाबा’ को एक साधारण पेड़ की कहानी से उठाकर एक गहरे भावनात्मक और साहित्यिक अनुभव में बदल देती है।
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