अंगूठी चोर:-
विजयनगर के महाराजा कृष्णदेव राय अपने ठाठ-बाट और शान के लिए पूरे देश में जाने जाते थे। उनके पास कीमती वस्तुओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनमें सबसे प्रिय थी एक खास अंगूठी। यह अंगूठी साधारण नहीं थी। उसमें बड़े-बड़े रत्न जड़े थे और वह इतनी सुंदर थी कि जो भी देखता, बस देखता ही रह जाता।
महाराजा जब भी दरबार में बैठते, अनजाने में उनकी नजर बार-बार उसी अंगूठी पर चली जाती। वे गर्व से अपने मंत्रियों, मेहमानों और खास लोगों को उसके बारे में बताते। कई बार तो वे मजाक में कहते,
“अगर कभी मेरी यह अंगूठी खो गई, तो मेरा दिल भी उसके साथ खो जाएगा।”
लेकिन किसी को क्या पता था कि एक दिन सच में वही होगा।
एक सुबह राजा कृष्णदेव राय बहुत उदास बैठे थे। दरबार लगा हुआ था, लेकिन राजा की आंखों में वह चमक नहीं थी। मंत्री आपस में फुसफुसाने लगे कि आखिर महाराज इतने परेशान क्यों हैं।
उसी समय तेनालीराम दरबार में पहुंचे। राजा के चेहरे को देखते ही उन्होंने समझ लिया कि जरूर कोई बड़ी बात है। उन्होंने आगे बढ़कर पूछा,
“महाराज, आज आप कुछ दुखी दिखाई दे रहे हैं। क्या कोई समस्या है?”
राजा ने गहरी सांस ली और बोले,
“तेनालीराम, मेरी सबसे प्रिय अंगूठी गायब हो गई है।”
यह सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया। तेनालीराम ने हैरानी से पूछा,
“महाराज, अंगूठी कैसे खो सकती है? आप तो हमेशा कड़ी सुरक्षा में रहते हैं।”
राजा बोले,
“यही तो बात है। मेरे आसपास बारह अंगरक्षक हर समय रहते हैं। बाहर का कोई आदमी मेरे पास आ ही नहीं सकता। मुझे पूरा शक है कि अंगूठी इन्हीं बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने चुराई है।”
यह सुनकर अंगरक्षक घबरा गए। कुछ के चेहरे पीले पड़ गए, तो कुछ ने खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश की।
तेनालीराम ने शांत स्वर में कहा,
“महाराज, आप चिंता न करें। मैं बहुत जल्द अंगूठी चोर को पकड़ लूंगा।”
राजा यह सुनकर थोड़े शांत हुए और बोले,
“अगर तुम सच में ऐसा कर सके, तो मैं तुम्हारा हमेशा आभारी रहूंगा।”
तेनालीराम ने तुरंत कहा,
“महाराज, कृपया सभी बारह अंगरक्षकों को यहाँ बुलवाइए।”
जब सभी अंगरक्षक सामने खड़े हो गए, तो तेनालीराम बोले,
“आपमें से किसी एक ने महाराज की अंगूठी चुराई है। जो निर्दोष है, उसे डरने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन जो दोषी है, उसे सजा के लिए तैयार रहना चाहिए।”
यह सुनकर कुछ अंगरक्षक और ज्यादा घबरा गए।
फिर तेनालीराम ने कहा,
“अब हम सबको काली माता के मंदिर चलना है।”
राजा चौंक गए,
“तेनालीराम, यह क्या कर रहे हो? हमें चोर पकड़ना है, मंदिर दर्शन नहीं!”
तेनालीराम मुस्कराए और बोले,
“महाराज, आप बस थोड़ा धैर्य रखिए। सच्चाई खुद सामने आ जाएगी।”
सब लोग काली माता के मंदिर पहुंचे। तेनालीराम सीधे पुजारी के पास गए और धीरे से कुछ बातें कीं। पुजारी ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
इसके बाद तेनालीराम ने अंगरक्षकों से कहा,
“आप सबको एक-एक करके मंदिर के अंदर जाना है, माता काली के चरण छूने हैं और तुरंत बाहर आ जाना है। माता आज रात मुझे सपने में चोर का नाम बता देंगी।”
यह सुनकर राजा और बाकी लोग चकित रह गए, लेकिन किसी ने सवाल नहीं किया।
अब अंगरक्षक बारी-बारी से अंदर जाने लगे। जैसे ही कोई बाहर आता, तेनालीराम उसका हाथ पकड़कर हल्के से सूंघते और एक लाइन में खड़ा कर देते।
कुछ ही देर में सभी बारह अंगरक्षक एक कतार में खड़े थे।
राजा ने पूछा,
“तेनालीराम, चोर का नाम तो रात में सपने में पता चलेगा। तब तक इनका क्या होगा?”
तेनालीराम मुस्कराए और बोले,
“नहीं महाराज, चोर का पता तो अभी लग चुका है।”
राजा हैरान होकर बोले,
“अभी? कैसे?”
तेनालीराम ने बिना देर किए कहा,
“सातवें नंबर पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।”
यह सुनते ही सातवें नंबर वाला अंगरक्षक घबरा गया और अचानक भागने लगा। लेकिन पास खड़े सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया।
राजा और बाकी लोग दंग रह गए।
“तेनालीराम, बिना सपना देखे तुमने कैसे पता लगाया?” राजा ने पूछा।
तब तेनालीराम ने सबको सच बताया,
“महाराज, मैंने पुजारी से पहले ही माता काली की मूर्ति के पैरों पर तेज खुशबू वाला इत्र छिड़कवा दिया था। जिसने भी मूर्ति के पैर छुए, उसके हाथ में खुशबू आ गई।”
उन्होंने आगे कहा,
“लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक का हाथ सूंघा, तो उसमें कोई खुशबू नहीं थी। इसका मतलब यह है कि उसने डर के कारण माता के पैर छुए ही नहीं। उसके मन में पहले से ही पाप था, इसलिए वही चोर है।”
यह सुनकर राजा कृष्णदेव राय तेनालीराम की बुद्धिमानी से बहुत खुश हुए। उन्होंने तुरंत चोर से अंगूठी वापस मंगवाई और उसे जेल में डाल दिया।
राजा ने तेनालीराम को सोने की मुद्राओं से सम्मानित किया और बोले,
“तेनालीराम, तुम सच में हमारे राज्य की सबसे बड़ी शक्ति हो।”
सीख
जो सच्चा होता है, उसे डरने की जरूरत नहीं पड़ती और बुद्धि से हर समस्या का हल निकाला जा सकता है।
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