love emotional story in hindi पढ़ने वाले पाठकों के लिए यह कहानी रिया और आदित्य के उस रिश्ते की शुरुआत है, जो दोस्ती से शुरू होकर धीरे-धीरे सच्चे प्यार में बदल जाता है। लेकिन क्या दो अलग-अलग परिवारों और परिस्थितियों से आए ये दोनों अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचा पाएंगे?
रिया का जयपुर जाने का फैसला
राजस्थान के कोटा जिले के पास बसे एक छोटे से गांव में रिया अपने माता-पिता के साथ रहती थी। परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता महेश गांव के सरकारी स्कूल में अध्यापक थे और मां सुनीता घर संभालती थीं।
रिया बचपन से ही पढ़ाई में अच्छी थी। उसकी इच्छा थी कि वह आगे पढ़कर पत्रकारिता और मीडिया के क्षेत्र में अपना करियर बनाए। वह चाहती थी कि एक दिन इतनी सफल बने कि अपने माता-पिता के लिए एक अच्छा सा घर बनवा सके और उन्हें गांव की छोटी-छोटी परेशानियों से दूर रख सके।
काफी मेहनत के बाद रिया का दाखिला जयपुर के एक अच्छे कॉलेज में हो गया।
कॉलेज में एडमिशन की खबर सुनकर रिया की खुशी का ठिकाना नहीं था, लेकिन उसके माता-पिता के लिए यह खुशी के साथ-साथ चिंता की भी बात थी।
महेश जी कई दिनों तक सोचते रहे कि बेटी इतनी दूर अकेली कैसे रहेगी।
एक शाम उन्होंने रिया से कहा—
“बेटा, जयपुर बहुत बड़ा शहर है। यहां हम तुम्हारे साथ नहीं रह पाएंगे। मुझे तुम्हारी चिंता हो रही है।”
रिया मुस्कुराते हुए बोली—
“पापा, आप चिंता मत कीजिए। मैं अपना ध्यान रखूंगी। आपने और मां ने मुझे इतना समझदार बनाया है कि मैं खुद को संभाल सकती हूं। अगर मैं यह मौका छोड़ दूंगी तो शायद जिंदगी भर अफसोस रहेगा।”
महेश जी बेटी की बात सुनकर चुप हो गए।
उन्हें पता था कि रिया का सपना बड़ा है।
आखिरकार उन्होंने अपनी बेटी को आगे पढ़ने की इजाजत दे दी।
घर से विदाई
जयपुर जाने वाले दिन सुबह से ही घर में अजीब सी खामोशी थी।
रिया अपना सामान बैग में रख रही थी। मां सुनीता बार-बार उसके कपड़े और जरूरी सामान देख रही थीं।
“यह दवा रख ली?”
“हां मां।”
“और खाना?”
“वह भी रख लिया।”
“फोन चार्जर?”
रिया हंसते हुए बोली—
“मां, आप मुझे जयपुर पढ़ने भेज रही हो या किसी दूसरे देश?”
सुनीता की आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने रिया को गले लगा लिया।
“तू चाहे जितनी बड़ी हो जा, मां के लिए तो हमेशा छोटी ही रहेगी।”
रिया भी अपनी मां से लिपट गई।
महेश जी ने खुद रिया को जयपुर तक छोड़ने की बात कही, लेकिन रिया ने मना कर दिया।
“पापा, आप स्कूल से छुट्टी मत लीजिए। मैं पहले कोटा जाऊंगी और वहां से ट्रेन पकड़कर जयपुर पहुंच जाऊंगी। कॉलेज के हॉस्टल में मेरा कमरा भी बुक है।”
महेश जी ने बेटी की तरफ देखा।
“ठीक है बेटा, लेकिन जयपुर पहुंचते ही फोन करना।”
“सबसे पहले आपको ही करूंगी।”
कुछ देर बाद रिया बस में बैठ गई।
बस धीरे-धीरे गांव से बाहर निकलने लगी।
रिया खिड़की के पास बैठी अपने गांव को देखती रही।
वही गलियां, वही खेत, वही मंदिर, वही पेड़ जिनके नीचे उसने बचपन में घंटों खेला था।
उसे अचानक लगा जैसे वह अपने जीवन का एक हिस्सा पीछे छोड़कर जा रही है।
उसकी आंखें नम हो गईं।
उसने धीरे से अपना सिर सीट से टिकाया और बचपन की यादों में खो गई।
उसे याद आया कि कैसे मां सुबह उसे उठाकर स्कूल के लिए तैयार करती थीं और पापा रात को उसके साथ बैठकर पढ़ाई करवाते थे।
एक पल के लिए उसके मन में आया—
“क्या मुझे सच में घर छोड़कर जाना चाहिए? यहां रहकर भी तो जिंदगी गुजर सकती है।”
लेकिन अगले ही पल उसे अपना सपना याद आया।
वह मन ही मन बोली—
“नहीं रिया, तू सिर्फ अपने लिए नहीं जा रही। तुझे अपने मां-पापा के लिए कुछ करना है।”
उसने अपने आंसू पोंछे और बाहर देखने लगी।
कोटा से जयपुर की यात्रा
कुछ घंटों बाद बस कोटा पहुंची।
रिया बस से उतरी और स्टेशन की तरफ चली गई।
इतने बड़े शहर में अकेले घूमने की उसे आदत नहीं थी। आसपास की भीड़ देखकर वह थोड़ी घबरा गई।
लेकिन उसने खुद को संभाला और ट्रेन में जाकर अपनी सीट ढूंढ ली।
ट्रेन चलने लगी।
रिया ने अपना फोन निकाला और मां को मैसेज किया—
“मां, ट्रेन में बैठ गई हूं। आप चिंता मत करना।”
कुछ ही देर में मां का जवाब आया—
“अपना ध्यान रखना बेटा। पहुंचते ही फोन करना।”
रिया ने फोन अपने सीने से लगा लिया।
करीब पांच घंटे बाद ट्रेन जयपुर पहुंच गई।
स्टेशन पर उतरते ही उसे लगा कि वह सच में एक नई दुनिया में आ गई है।
चारों तरफ भीड़ थी।
ऑटो वाले यात्रियों को आवाज लगा रहे थे।
रिया ने एक ऑटो किया और कॉलेज के लिए निकल गई।
हॉस्टल में नई शुरुआत
कॉलेज के हॉस्टल में पहुंचने के बाद रिया को उसका कमरा मिल गया।
कमरे में पहुंचकर उसने अपना सामान व्यवस्थित किया और कुछ देर बेड पर बैठ गई।
थकान बहुत थी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
उसने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।
नई जगह थी।
नए लोग थे।
नई जिंदगी थी।
तभी उसे मां की बात याद आई—
“अकेलापन लगे तो हमें फोन कर लेना।”
रिया ने तुरंत घर फोन किया।
“मां, मैं पहुंच गई।”
सुनीता ने राहत की सांस ली।
“भगवान का शुक्र है। खाना खाया?”
रिया मुस्कुरा दी।
“अभी नहीं मां।”
“पहले खाना खाना, फिर आराम करना।”
फोन कटने के बाद रिया कुछ देर तक मुस्कुराती रही।
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
एक लड़की अंदर आई।
“तुम रिया हो ना?”
रिया ने पलटकर देखा।
“हां।”
लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा—
“मैं नेहा हूं। इसी कमरे में रहती हूं। मैं तुमसे एक साल सीनियर हूं।”
नेहा का स्वभाव काफी मिलनसार था। थोड़ी ही देर में दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई।
नेहा ने रिया को कॉलेज के बारे में बहुत सी बातें बताईं।
“देख रिया, पढ़ाई तो करनी ही है लेकिन कॉलेज लाइफ भी एंजॉय करना। हर वक्त किताब लेकर बैठी रहेगी तो बोर हो जाएगी।”
रिया हंसते हुए बोली—
“मेरा तो पूरा ध्यान पढ़ाई पर रहेगा।”
नेहा ने मजाक में कहा—
“यह बात कॉलेज शुरू होने के बाद फिर पूछूंगी।”
दोनों हंसने लगीं।
रिया को पहली बार लगा कि शायद वह इस नए शहर में अकेली नहीं रहेगी।
कॉलेज में पहला दिन
अगले दिन रिया कॉलेज पहुंची।
कॉलेज उसकी उम्मीद से भी बड़ा था।
हर तरफ छात्र-छात्राओं की भीड़ थी।
कुछ पढ़ाई में व्यस्त थे तो कुछ दोस्तों के साथ घूम रहे थे।
रिया ने अपनी क्लास अटेंड की और खाली समय में लाइब्रेरी चली गई।
उसे किताबों के बीच बैठना अच्छा लगता था।
वह अपने करियर को लेकर काफी गंभीर थी।
लेकिन कॉलेज में उसकी नजर एक लड़के पर अक्सर जाती थी।
उसका नाम था आदित्य।
आदित्य उसी क्लास में पढ़ता था।
वह बाकी छात्रों से थोड़ा अलग था। हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता और दोस्तों के बीच काफी लोकप्रिय था।
आदित्य एक बड़े होटल कारोबारी का बेटा था।
उसके पिता शहर के कई बड़े होटलों का कारोबार संभालते थे।
घर में सब चाहते थे कि पढ़ाई पूरी करने के बाद आदित्य भी पिता का बिजनेस संभाले।
लेकिन आदित्य का सपना थोड़ा अलग था।
वह अपना खुद का काम शुरू करना चाहता था।
उसे लगता था कि जिंदगी में अपनी पहचान खुद बनानी चाहिए।
हालांकि रिया और आदित्य एक ही क्लास में थे, लेकिन दोनों ने अभी तक ठीक से बात नहीं की थी।
कॉलेज का आउटिंग प्लान
एक दिन नेहा अचानक लाइब्रेरी में रिया के पास पहुंची।
“चल जल्दी!”
रिया ने किताब से नजर उठाई।
“कहां?”
“कॉलेज का आउटिंग प्लान है। सब लोग जा रहे हैं।”
रिया ने तुरंत मना कर दिया।
“मुझे नहीं जाना। मुझे असाइनमेंट पूरा करना है।”
नेहा ने उसकी किताब बंद कर दी।
“एक दिन पढ़ाई नहीं करेगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।”
रिया ने कहा—
“नेहा, तुम जाओ। मैं यहीं ठीक हूं।”
लेकिन नेहा नहीं मानी।
आखिरकार वह रिया को अपने साथ ले गई।
कॉलेज का पूरा ग्रुप जयपुर से थोड़ी दूर एक पहाड़ी इलाके में घूमने पहुंचा।
सभी दोस्त अलग-अलग जगह घूम रहे थे।
कुछ फोटो खिंचवा रहे थे और कुछ आपस में बातें कर रहे थे।
रिया बाकी लोगों से थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे बैठकर पहाड़ियों और आसमान को देख रही थी।
तभी पीछे से आवाज आई—
“तुम यहां अकेली बैठी हो?”
रिया ने पलटकर देखा।
सामने आदित्य खड़ा था।
रिया थोड़ी हैरान हुई।
“हां… बस ऐसे ही बैठी हूं।”
आदित्य उसके पास बैठ गया।
“नेहा कहां है?”
“पता नहीं। शायद बाकी लोगों के साथ होगी।”
आदित्य हंसते हुए बोला—
“तुम्हें देखकर लगता है कि तुम यहां घूमने नहीं, पढ़ने आई हो।”
रिया भी मुस्कुरा दी।
“और तुम्हें देखकर लगता है कि तुम पढ़ने नहीं, घूमने आए हो।”
आदित्य जोर से हंस पड़ा।
“पहली बार किसी ने मुझसे ऐसी बात कही है।”
धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई।
पहली कॉफी
कुछ देर बाद आदित्य ने सामने बने छोटे से कैफे की तरफ इशारा किया।
“कॉफी पियोगी?”
रिया ने पहले मना करने की सोची, लेकिन फिर पता नहीं क्यों उसके मुंह से निकल गया—
“ठीक है।”
दोनों कैफे में जाकर बैठ गए।
आदित्य ने अपने बारे में रिया को बताया।
उसने बताया कि उसके पिता का बड़ा होटल बिजनेस है और घर में उससे उम्मीद की जाती है कि वह आगे चलकर वही काम संभाले।
रिया ने पूछा—
“और तुम क्या करना चाहते हो?”
आदित्य कुछ देर चुप रहा।
“मैं अपना खुद का काम करना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे सिर्फ इसलिए पहचानें क्योंकि मैं किसी बड़े आदमी का बेटा हूं।”
रिया उसकी बात सुनकर प्रभावित हुई।
उसने कहा—
“यह अच्छी बात है। अपनी पहचान खुद बनाना आसान नहीं होता।”
आदित्य ने मुस्कुराकर कहा—
“और तुम्हारा सपना?”
रिया ने बिना सोचे जवाब दिया—
“मैं पत्रकारिता में जाना चाहती हूं। अच्छा काम करके अपने मां-पापा के लिए एक अच्छा घर बनाना चाहती हूं।”
आदित्य कुछ पल उसे देखता रहा।
शायद उसे पहली बार किसी लड़की की बातें इतनी सच्ची लगी थीं।
दोस्ती से बढ़ता रिश्ता
उस दिन के बाद रिया और आदित्य के बीच बातचीत बढ़ने लगी।
अब दोनों अक्सर कॉलेज में साथ दिखाई देने लगे।
कभी कैंटीन में लंच करते तो कभी लाइब्रेरी के बाहर बैठकर बातें करते।
आदित्य रिया को शहर की नई-नई जगहों के बारे में बताता और रिया उसे गांव की जिंदगी के किस्से सुनाती।
दोनों की दुनिया अलग थी, लेकिन सोच कहीं न कहीं एक जैसी थी।
धीरे-धीरे रिया को आदित्य का साथ अच्छा लगने लगा।
उसे पता ही नहीं चला कि कब आदित्य उसकी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
अब जब आदित्य कॉलेज नहीं आता तो रिया बार-बार अपना फोन देखने लगती।
अगर आदित्य का मैसेज नहीं आता तो उसका मन बेचैन हो जाता।
रिया खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि उसके साथ क्या हो रहा है।
नेहा को हुआ शक
एक शाम नेहा ने रिया को कमरे में आते देखा।
रिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।
नेहा ने तुरंत पूछा—
“क्या बात है?”
रिया ने कहा—
“कुछ भी तो नहीं।”
नेहा हंस पड़ी।
“मुझसे झूठ मत बोल। जब से आदित्य से दोस्ती हुई है, तेरी मुस्कान कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है।”
रिया शर्मा गई।
“ऐसा कुछ नहीं है। हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं।”
नेहा ने गंभीर होकर कहा—
“रिया, दोस्ती और प्यार के बीच बहुत पतली सी लाइन होती है। संभलकर आगे बढ़ना।”
रिया चुप रही।
नेहा ने आगे कहा—
“तू यहां एक सपना लेकर आई है। अपने मां-पापा के लिए कुछ करने का सपना। किसी रिश्ते की वजह से अपना लक्ष्य मत भूल जाना।”
रिया ने उसकी बात सुन तो ली, लेकिन कुछ जवाब नहीं दिया।
उस रात वह देर तक सो नहीं पाई।
वह खुद से सवाल करती रही—
“क्या मुझे सच में आदित्य से प्यार हो गया है?”
उसे जवाब नहीं मिल रहा था।
रिया को अपने दिल का एहसास
अगले दिन नेहा ने रिया से कहा—
“अगर तुझे लगता है कि यह सिर्फ दोस्ती है तो एक हफ्ते तक आदित्य से दूर रहकर देख।”
रिया ने तुरंत कहा—
“इसमें क्या मुश्किल है?”
लेकिन जब वह कॉलेज पहुंची और आदित्य सामने नहीं था, तो उसे बेचैनी होने लगी।
क्लास खत्म हुई।
फिर भी रिया का ध्यान बार-बार दरवाजे की तरफ जा रहा था।
उसने खुद से कहा—
“मैं उसे क्यों ढूंढ रही हूं?”
उसी समय उसका फोन बजा।
आदित्य का मैसेज था—
“आज तुम बहुत चुप हो। सब ठीक है?”
रिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
तभी उसे अपने दिल की सच्चाई समझ आने लगी।
वह शाम को हॉस्टल वापस आई और नेहा से बोली—
“शायद तुम सही कह रही थी।”
नेहा ने पूछा—
“क्या?”
रिया ने धीमे से कहा—
“मुझे लगता है… मुझे आदित्य से प्यार हो गया है।”
नेहा कुछ देर उसे देखती रही।
फिर बोली—
“अब बस एक बात का इंतजार कर। देखना कि आदित्य के दिल में भी वही है या नहीं।”
आदित्य का इजहार
कुछ दिन बीत गए।
रिया और आदित्य पहले की तरह मिलते रहे।
एक दिन कॉलेज की क्लास खत्म होने के बाद आदित्य ने रिया को कैंपस के शांत हिस्से में बुलाया।
रिया वहां पहुंची तो आदित्य पहले से खड़ा था।
उसके चेहरे पर आज अलग ही गंभीरता थी।
रिया ने पूछा—
“क्या हुआ? इतने परेशान क्यों हो?”
आदित्य ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—
“रिया, मुझे तुमसे एक बात कहनी है।”
रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।
आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“मैं तुम्हें सिर्फ अपनी दोस्त नहीं मानता।”
रिया कुछ नहीं बोली।
आदित्य ने आगे कहा—
“मुझे तुमसे प्यार हो गया है। मैं नहीं जानता यह कब हुआ, लेकिन अब मैं अपनी जिंदगी तुम्हारे बिना सोच नहीं पाता।”
रिया की आंखें भर आईं।
वह इसी बात का इंतजार कर रही थी।
आदित्य ने कहा—
“मुझे पता है हमारी जिंदगी बहुत अलग है। मेरा परिवार बहुत बड़ा है और तुम्हारा परिवार साधारण है। शायद मेरे घरवाले इस रिश्ते को आसानी से स्वीकार न करें। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा।”
रिया की आंखों से आंसू निकल पड़े।
आदित्य घबरा गया।
“रिया, अगर मैंने कुछ गलत कह दिया तो मुझे माफ कर देना। मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता।”
रिया ने आंसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा—
“पागल हो क्या? मैं तो कब से तुम्हारे मुंह से यही सुनना चाहती थी।”
आदित्य के चेहरे पर खुशी आ गई।
लेकिन रिया ने तुरंत एक सवाल किया—
“अगर तुम्हारे घरवाले हमारे रिश्ते के खिलाफ हुए तो?”
आदित्य ने बिना देर किए कहा—
“मैं उनसे बात करूंगा। और अगर उन्होंने मुझे तुम्हें चुनने से रोकने की कोशिश की, तो मैं अपने फैसले पर कायम रहूंगा।”
रिया ने आदित्य की तरफ देखा।
उस पल उसे लगा कि शायद उसे उसका सच्चा प्यार मिल गया है।
प्यार में खोती रिया
अब दोनों का रिश्ता और गहरा हो गया।
वे घंटों साथ रहते।
कभी कॉलेज के बाद कॉफी पीते तो कभी लंबे समय तक फोन पर बातें करते।
रिया का ध्यान धीरे-धीरे पढ़ाई से हटने लगा।
जिस लड़की को लाइब्रेरी में घंटों बैठना पसंद था, अब वही आदित्य के एक मैसेज का इंतजार करती रहती थी।
कई बार दोनों कॉलेज की क्लास भी छोड़ देते।
उधर रिया भूलने लगी थी कि वह जयपुर क्यों आई थी।
उसके सामने अब दो रास्ते थे।
एक रास्ता उसके माता-पिता के सपनों की तरफ जाता था।
दूसरा रास्ता आदित्य के प्यार की तरफ।
रिया को अभी नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसे अपने प्यार और अपने परिवार के सपनों के बीच कितना बड़ा फैसला लेना पड़ेगा।
और सबसे बड़ा सवाल यह था—
क्या आदित्य अपने परिवार के सामने भी उसी तरह रिया का हाथ थाम पाएगा, जैसा उसने आज वादा किया था?
शेष अगले भाग में…
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