Love Emotional Story in Hindi: रिया और आदित्य का प्यार अब धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था। दोनों घंटों एक-दूसरे से बातें करते रहते। रिया को अब जयपुर में अपने कॉलेज से ज्यादा आदित्य की चिंता रहने लगी थी।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिंदगी में जल्द ही ऐसा मोड़ आने वाला है, जो उनके प्यार की परीक्षा लेने वाला था।
रात में आया मां का फोन
उस रात रिया और नेहा हॉस्टल के कमरे में सो रही थीं।
अचानक रिया का फोन बजा।
रात का समय था।
रिया ने उनींदी आंखों से फोन उठाया।
दूसरी तरफ उसकी मां सुनीता थीं।
लेकिन मां की आवाज में घबराहट थी।
“रिया बेटा… तू जल्दी से घर आ जा।”
रिया एकदम उठकर बैठ गई।
“क्या हुआ मां?”
कुछ पल तक सुनीता बोल नहीं पाईं।
फिर उन्होंने कांपती आवाज में कहा—
“बेटा, तेरे पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई है।”
रिया का दिल बैठ गया।
“पापा को क्या हुआ?”
“तू बस जल्दी घर आ जा… अभी कुछ मत पूछ।”
इतना कहकर सुनीता ने फोन रख दिया।
रिया कुछ पल तक फोन को हाथ में लिए बैठी रही।
उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
नेहा की नींद भी खुल चुकी थी।
उसने रिया को रोते देखा तो तुरंत उठकर उसके पास आ गई।
“रिया, क्या हुआ? किसका फोन था?”
रिया ने रोते हुए कहा—
“नेहा… मां का फोन था। पापा की तबीयत बहुत खराब है। मुझे अभी घर जाना होगा।”
नेहा ने बिना कोई सवाल किए उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू घबरा मत। हम अभी देखते हैं टिकट।”
रिया ने तुरंत अपना मोबाइल उठाया और जयपुर से कोटा की ट्रेनें देखने लगी।
काफी कोशिश के बाद उसे उसी रात की ट्रेन में एक सीट मिल गई।
ट्रेन लगभग दो घंटे बाद थी।
रिया ने राहत की सांस ली।
लेकिन तभी उसे आदित्य याद आया।
उसने तुरंत उसका नंबर मिलाया।
फोन बंद था।
रिया ने दोबारा कोशिश की।
फिर भी फोन बंद था।
वह परेशान होकर बोली—
“आज ही इसका फोन बंद होना था।”
नेहा ने कहा—
“अभी आदित्य की चिंता मत कर। पहले घर पहुंचना जरूरी है।”
रिया कुछ नहीं बोली।
उसका पूरा ध्यान अब अपने पापा पर था।
घर जाने की तैयारी
नेहा ने तुरंत रिया का बैग निकाल लिया।
“तू टिकट संभाल। मैं तेरे कपड़े पैक कर देती हूं।”
रिया लगातार मां को फोन कर रही थी लेकिन फोन नहीं उठ रहा था।
उसका डर और बढ़ता जा रहा था।
“नेहा, पता नहीं पापा को क्या हुआ है। मां ने ठीक से कुछ बताया भी नहीं।”
नेहा ने उसे समझाते हुए कहा—
“सब ठीक होगा। तू ज्यादा मत सोच। सुबह घर पहुंचकर सब पता चल जाएगा।”
कुछ ही देर में रिया ने अपना सामान तैयार कर लिया।
हॉस्टल की जरूरी अनुमति लेकर दोनों नीचे आ गईं।
नेहा ने उसके लिए रास्ते में खाने का कुछ सामान भी पैक करवा दिया।
रिया ने उसे गले लगाकर कहा—
“थैंक्यू नेहा। अगर तू मेरे साथ नहीं होती तो मैं पता नहीं क्या करती।”
नेहा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“दोस्त इसी दिन के लिए होते हैं।”
कैब आने के बाद रिया ने अपना सामान रखा।
जाने से पहले नेहा ने उसे एक बात समझाई—
“और सुन, अभी घर में किसी को आदित्य के बारे में मत बताना। पहले अपने पापा को देख। बाकी बातें बाद में।”
रिया ने सिर हिलाया।
“हां, तू सही कह रही है।”
कैब उसे जयपुर रेलवे स्टेशन की तरफ ले चली।
पूरी रात रिया को नींद नहीं आई
ट्रेन समय पर चल पड़ी।
रिया खिड़की के पास बैठी बाहर के अंधेरे को देखती रही।
आंखों के सामने बार-बार पापा का चेहरा आ रहा था।
उसे याद आ रहा था कि कैसे महेश जी बचपन से उसकी पढ़ाई के लिए मेहनत करते आए थे।
उन्होंने अपनी सीमित कमाई के बावजूद कभी रिया को किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी थी।
और आज वही पापा बीमार थे।
रिया की आंखों से लगातार आंसू निकल रहे थे।
वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी—
“भगवान, मेरे पापा को कुछ मत होने देना। उनकी जगह मेरी सारी खुशियां ले लेना, लेकिन उन्हें ठीक कर देना।”
कभी उसे मां की चिंता होती और कभी आदित्य की।
वह आदित्य से बात करना चाहती थी।
लेकिन फिर उसने सोचा—
“पहले पापा ठीक हो जाएं, उसके बाद आदित्य से बात करूंगी।”
किसी तरह पूरी रात गुजर गई।
सुबह ट्रेन कोटा पहुंची।
रिया जल्दी से ट्रेन से उतरी और गांव जाने के लिए बस पकड़ ली।
उसका मन बार-बार यही पूछ रहा था—
“पापा को आखिर हुआ क्या है?”
घर पहुंचते ही बदल गई रिया की दुनिया
कुछ देर बाद रिया अपने गांव पहुंची।
वह लगभग दौड़ती हुई घर के अंदर गई।
जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, उसकी नजर बेड पर लेटे अपने पापा पर पड़ी।
महेश जी आंखें बंद करके आराम कर रहे थे।
पास में सुनीता बैठी थीं।
कमरे में दो-तीन पड़ोसी भी मौजूद थे।
रिया कुछ पल तक अपने पापा को देखती रही।
फिर उसने मां के कंधे पर हाथ रखा।
सुनीता ने रिया की तरफ देखा।
उनकी आंखें लाल थीं।
उन्होंने चुप रहने का इशारा किया और रिया को कमरे से बाहर ले गईं।
बाहर आते ही सुनीता ने बेटी को गले लगा लिया।
रिया भी मां से लिपटकर रोने लगी।
लेकिन कुछ देर बाद उसने अपनी मां को ध्यान से देखा।
वह हमेशा खुश रहने वाली सुनीता आज बिल्कुल बदली हुई लग रही थीं।
चेहरा मुरझाया हुआ था।
आंखों के नीचे काले घेरे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे कई रातों से ठीक से सोई ही न हों।
रिया ने मां का हाथ पकड़कर पूछा—
“मां, आखिर हुआ क्या है?”
सुनीता की आंखों में फिर आंसू आ गए।
उन्होंने कहा—
“बेटा, तेरे पापा स्कूल गए थे। वहीं अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई। स्कूल के लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया।”
रिया की सांस रुक सी गई।
“फिर?”
“डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।”
रिया ने अपना मुंह हाथ से ढक लिया।
सुनीता ने आगे कहा—
“पहले तो डॉक्टरों ने दवा देकर हालत संभाली, लेकिन जांच के बाद पता चला कि दिल की एक नस में गंभीर ब्लॉकेज है। उन्हें तुरंत कोटा के बड़े अस्पताल ले जाना पड़ा।”
रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।
“मां… फिर?”
“वहां डॉक्टरों ने इलाज किया। कुछ दिन अस्पताल में रखना पड़ा। अब हालत पहले से ठीक है। कल ही छुट्टी मिली है।”
रिया हैरान होकर बोली—
“लेकिन मां, आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
सुनीता चुप हो गईं।
फिर बोलीं—
“मैं नहीं चाहती थी कि तू अपनी पढ़ाई छोड़कर परेशान होकर यहां आ जाए। तेरे पापा भी यही कह रहे थे कि रिया को मत बुलाना। वह अपनी पढ़ाई कर रही है, उसे परेशान मत करो।”
यह सुनकर रिया की आंखें भर आईं।
उसे अचानक एहसास हुआ कि उसके माता-पिता उसके लिए कितनी बड़ी चिंता अपने अंदर छिपाकर रखते हैं।
अभी कुछ देर पहले उसे मां पर गुस्सा आ रहा था।
लेकिन अब वह मां की हालत देखकर खुद को रोक नहीं पाई।
उसने मां को फिर से गले लगा लिया।
“मां… आपने यह सब अकेले कैसे संभाला?”
सुनीता ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“मां हूं बेटा… संभालना ही था।”
रिया ने मां की हालत देखी
रिया ने अपनी मां को गौर से देखा।
सुनीता बहुत कमजोर हो गई थीं।
रिया ने कहा—
“मां, आपने खाना खाया?”
सुनीता ने नजरें चुरा लीं।
“हां बेटा।”
रिया समझ गई कि मां झूठ बोल रही हैं।
“मां, सच बताओ।”
सुनीता चुप रहीं।
फिर धीरे से बोलीं—
“अस्पताल में मन ही नहीं करता था। आसपास के लोग खाना दे जाते थे, वही थोड़ा बहुत खा लेती थी। घर आने के बाद भी तेरे पापा के लिए दलिया और खिचड़ी बनाती हूं। खुद खाने का मन नहीं करता।”
रिया की आंखें भर आईं।
उसने मां का हाथ पकड़कर कहा—
“अब आप चिंता मत करो। मैं आ गई हूं। अब मैं सब संभाल लूंगी।”
सुनीता के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।
पिता से मिली रिया
कुछ देर बाद महेश जी की आंख खुली।
उन्होंने सामने रिया को देखा तो उनके चेहरे पर खुशी आ गई।
“अरे रिया! तू आ गई?”
रिया तुरंत उनके पास बैठ गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा… आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”
महेश जी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोले—
“मैं ठीक तो हूं बेटा। तेरी पढ़ाई खराब करवाने के लिए थोड़ी ना बुलाता।”
रिया अपने आंसू नहीं रोक पाई।
“पापा, आप मेरे लिए सबसे जरूरी हैं।”
महेश जी ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।
“तू बस अपनी पढ़ाई पूरी कर। यही मेरी सबसे बड़ी खुशी है।”
रिया कुछ नहीं बोली।
उसके मन में एक साथ बहुत सारी बातें चल रही थीं।
उसे अपनी पढ़ाई भी याद आ रही थी।
आदित्य भी याद आ रहा था।
लेकिन इस समय उसके लिए उसके माता-पिता से बढ़कर कुछ नहीं था।
उधर आदित्य परेशान था
दूसरी तरफ जयपुर में आदित्य को रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
वह कई बार उसे फोन कर चुका था।
लेकिन रिया का फोन बंद था।
अगले दिन कॉलेज में भी वह नहीं आई।
आदित्य ने नेहा को रोक लिया।
“नेहा, रिया कहां है?”
नेहा ने कहा—
“उसके पापा की तबीयत अचानक खराब हो गई थी। वह घर चली गई है।”
आदित्य का चेहरा उतर गया।
“क्या हुआ उन्हें?”
“अभी ज्यादा जानकारी नहीं है। रिया पहुंचकर बताएगी।”
आदित्य कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“उसका फोन क्यों बंद है?”
“शायद रास्ते में बैटरी खत्म हो गई होगी।”
आदित्य ने बेचैनी से कहा—
“अगर रिया से बात हो तो मुझे जरूर बताना।”
नेहा ने सिर हिला दिया।
आदित्य ने कॉलेज जाना छोड़ दिया
अगले कई दिनों तक आदित्य का मन कॉलेज में नहीं लगा।
वह क्लास में बैठता तो सामने रिया की खाली सीट दिखाई देती।
कैंटीन जाता तो उसे रिया की बातें याद आतीं।
लाइब्रेरी के बाहर खड़ा होता तो उसे लगता जैसे रिया अभी किताबें लेकर वहां से आती हुई दिखाई देगी।
एक दिन नेहा ने उसे फोन किया।
“आदित्य, तुम कॉलेज क्यों नहीं आ रहे?”
आदित्य ने कहा—
“रिया के बिना मन नहीं लग रहा।”
नेहा ने समझाया—
“लेकिन तुम्हारी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है।”
आदित्य बोला—
“मैं जानता हूं। लेकिन जब तक रिया वापस नहीं आएगी, पता नहीं क्यों किसी चीज में मन नहीं लग रहा।”
उधर यह बात रिया को पता चली तो उसने तुरंत आदित्य को फोन किया।
इस बार आदित्य ने फोन उठा लिया।
“रिया! तुम ठीक हो?”
उसकी आवाज में घबराहट साफ सुनाई दे रही थी।
रिया ने कहा—
“हां आदित्य, मैं ठीक हूं। पापा भी अब पहले से ठीक हैं।”
आदित्य ने राहत की सांस ली।
“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
“तुम्हारा फोन बंद था। और फिर मैं इतनी परेशान थी कि कुछ समझ ही नहीं आया।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर आदित्य बोला—
“मैं तुम्हें देखने गांव आ जाऊं?”
रिया तुरंत बोली—
“नहीं!”
आदित्य चौंका।
“क्यों?”
रिया ने धीमी आवाज में कहा—
“यह मेरा गांव है आदित्य। यहां सब एक-दूसरे को जानते हैं। मैं किसी को तुम्हारे बारे में क्या बताऊंगी?”
आदित्य चुप हो गया।
रिया ने आगे कहा—
“अभी पापा की तबीयत ठीक नहीं है। मां भी बहुत कमजोर हो गई हैं। मुझे कुछ दिन यहीं रहना पड़ेगा।”
आदित्य ने पूछा—
“और तुम्हारी पढ़ाई?”
रिया कुछ पल चुप रही।
“अभी मैं उसके बारे में नहीं सोच पा रही।”
आदित्य ने कहा—
“लेकिन तुम्हारा सपना?”
रिया की आंखें भर आईं।
“मुझे पता है। मैं अपना सपना नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन इस समय मेरे माता-पिता को मेरी जरूरत है।”
आदित्य ने धीरे से कहा—
“मैं समझता हूं।”
फिर उसने कहा—
“लेकिन तुम मुझसे रोज बात करोगी।”
रिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“ठीक है। लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?”
“तुम कल से कॉलेज जाओगे।”
आदित्य हंस पड़ा।
“तुम घर जाकर भी मेरी पढ़ाई की चिंता कर रही हो?”
“हां। क्योंकि अगर तुमने पढ़ाई छोड़ दी तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगी।”
आदित्य ने तुरंत कहा—
“अच्छा बाबा, कल से कॉलेज जाऊंगा।”
रिया हंसने लगी।
कई दिनों बाद उसके चेहरे पर सुकून की मुस्कान आई थी।
एक नई चिंता
अगले दिन आदित्य कॉलेज चला गया।
लेकिन उसके मन में एक और बात चल रही थी।
उसे अपने पिता की पिछली रात कही बात याद आ रही थी—
“अब तुम्हारी शादी के बारे में भी हमें सोचना चाहिए।”
आदित्य जानता था कि उसके पिता रिया के बारे में कुछ नहीं जानते।
और वह यह भी जानता था कि जिस दिन उसके पिता को उसके और रिया के रिश्ते का पता चलेगा, उस दिन घर में बहुत बड़ा तूफान आ सकता है।
उधर गांव में रिया अपने पिता की सेवा कर रही थी।
उसे लग रहा था कि कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जाएगा और वह वापस जयपुर लौट जाएगी।
लेकिन उसे क्या पता था कि जयपुर में उसके लौटने से पहले ही आदित्य की जिंदगी में एक ऐसा फैसला लिया जा चुका था, जो उनके रिश्ते को पूरी तरह बदल सकता था।
क्या आदित्य अपने पिता को रिया के बारे में बताएगा?
क्या रिया अपने माता-पिता को अपने प्यार की सच्चाई बता पाएगी?
और क्या दोनों परिवारों के बीच खड़ी होने वाली पहली दीवार उनके प्यार को तोड़ पाएगी?
शेष अगले भाग में…
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