गाँव की रिया और शहर का आदित्य — सच्चे प्यार की कहानी | भाग 4

गाँव की रिया और शहर का आदित्य — सच्चे प्यार की कहानी | भाग 4

Love Emotional Story in Hindi: रिया के पिता महेश जी की तबीयत अब पहले से बेहतर थी। बेटी के घर लौट आने से उन्हें काफी सुकून मिला था। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि रिया के दिल में एक ऐसा राज छिपा है, जो सामने आते ही पूरे परिवार की जिंदगी बदलने वाला है।

एक तरफ रिया अपने माता-पिता की चिंता में उलझी थी और दूसरी तरफ आदित्य से किया हुआ अपना प्यार का वादा उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रहा था।

घर में आई रिश्ते की बात

रिया के गांव के सरपंच हरिराम जी, महेश जी के पुराने परिचित थे। दोनों की कई वर्षों से दोस्ती थी।

एक दिन वे महेश जी का हालचाल पूछने उनके घर आए।

“महेश भाई, अब कैसी तबीयत है?”

महेश जी ने मुस्कुराकर कहा—

“पहले से काफी ठीक हूं। डॉक्टर ने अभी कुछ दिन आराम करने को कहा है।”

हरिराम जी ने राहत की सांस ली।

“भगवान का शुक्र है। उस दिन अगर समय पर अस्पताल नहीं पहुंचते तो पता नहीं क्या हो जाता।”

महेश जी बोले—

“आपने उस दिन बहुत मदद की थी भाई। समय पर गाड़ी नहीं मिलती तो परेशानी और बढ़ जाती।”

हरिराम जी हंसते हुए बोले—

“अरे इसमें धन्यवाद किस बात का? पड़ोसी और दोस्त किस दिन काम आएंगे?”

दोनों कुछ देर तक पुरानी बातें करते रहे।

फिर हरिराम जी अचानक गंभीर हो गए।

“महेश भाई, एक बात कहूं?”

“हां, बोलिए।”

“आप बुरा मत मानना। मैं काफी समय से यह बात सोच रहा था।”

महेश जी उनकी तरफ देखने लगे।

हरिराम जी ने कहा—

“मेरा भतीजा मोहित शहर में पढ़ाई करके अब यहीं अपना कारोबार संभाल रहा है। लड़का समझदार है, मेहनती है और परिवार भी अच्छा है। अगर आपको ठीक लगे तो हम रिया के लिए बात आगे बढ़ा सकते हैं।”

महेश जी कुछ पल के लिए चुप हो गए।

उनके मन में कई बातें चलने लगीं।

उन्हें अपना हाल का हार्ट अटैक याद आ गया।

उन्होंने धीमी आवाज में कहा—

“हरिराम जी, रिया अभी पढ़ रही है। मैंने उसके लिए कुछ सपने देखे हैं।”

हरिराम जी बोले—

“मैं समझता हूं भाई। लेकिन आप भी जानते हैं कि जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। अगर दोनों बच्चों की सहमति हो तो पढ़ाई भी शादी के बाद जारी रह सकती है।”

महेश जी के मन में यह बात बैठ गई।

उन्होंने कहा—

“आपने बात रखी है तो मैं रिया की मां से और रिया से बात करूंगा। आखिर फैसला उसी का होगा।”

हरिराम जी मुस्कुराए।

“बस यही चाहता हूं कि बात अच्छे से हो। बाकी किसी तरह का दबाव नहीं है।”

कुछ देर बाद वे वहां से चले गए।

महेश जी ने सुनीता को बताया

हरिराम जी के जाने के बाद सुनीता रसोई से बाहर आईं।

उन्होंने पूछा—

“क्या बात कर रहे थे हरिराम जी?”

महेश जी ने कहा—

“रिया के रिश्ते की बात कर रहे थे।”

सुनीता एक पल के लिए चुप रह गईं।

“इतनी जल्दी?”

महेश जी ने गहरी सांस ली।

“मुझे नहीं पता शांति… लेकिन मेरे मन में अब एक डर बैठ गया है। डॉक्टर ने कहा है कि मुझे अपनी सेहत का ध्यान रखना होगा। मैं चाहता हूं कि रिया की जिम्मेदारी पूरी करके चैन से रहूं।”

सुनीता की आंखें भर आईं।

“आप ऐसी बातें क्यों करते हैं? भगवान ने चाहा तो आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगे।”

महेश जी मुस्कुराए।

“मैं भी यही चाहता हूं। लेकिन बेटी के भविष्य की चिंता तो पिता को हमेशा रहती है।”

सुनीता ने कुछ नहीं कहा।

उनके मन में भी रिया की शादी का विचार घूमने लगा।

रिया को जब पता चला

रिया उस समय घर से थोड़ी दूर अपनी बचपन की सहेली से मिलने गई थी।

जब वह वापस आई तो मां के चेहरे पर कुछ अलग ही भाव देखकर रुक गई।

“मां, क्या हुआ? आप इतनी चुप क्यों हैं?”

सुनीता ने कहा—

“कुछ नहीं बेटा।”

रिया ने मुस्कुराते हुए कहा—

“मां, मुझे देखकर भी आप झूठ बोल रही हो?”

सुनीता ने उसकी तरफ देखा लेकिन कुछ नहीं कहा।

रिया सीधे अपने पापा के पास चली गई।

“पापा, अब तबीयत कैसी है?”

महेश जी बोले—

“ठीक हूं बेटा। तू आ गई है तो और अच्छा लग रहा है।”

रिया उनके पास बैठ गई।

कुछ देर बाद महेश जी ने कहा—

“बेटा, आज हरिराम जी आए थे।”

रिया ने सामान्य तरीके से पूछा—

“अच्छा, क्यों?”

महेश जी थोड़ी देर चुप रहे।

फिर बोले—

“वो तुम्हारे लिए एक रिश्ता लेकर आए हैं।”

रिया का चेहरा अचानक बदल गया।

उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली हो।

“रिश्ता?”

महेश जी ने कहा—

“हां बेटा। लड़का अच्छा है। परिवार भी अच्छा है। अभी हमने कुछ तय नहीं किया है। पहले तुमसे पूछना जरूरी है।”

रिया कुछ नहीं बोल पाई।

उसके सामने तुरंत आदित्य का चेहरा आ गया।

उसे आदित्य की वह बात याद आई—

“मैं तुम्हारे लिए पूरी दुनिया से लड़ जाऊंगा।”

रिया उठकर अपने कमरे में चली गई।

दरवाजा बंद करके वह बेड पर बैठ गई।

उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।

वह खुद से कहने लगी—

“मैंने सोचा था पापा ठीक हो जाएं, फिर मैं उन्हें आदित्य के बारे में बताऊंगी। लेकिन अब तो शादी की बात शुरू हो गई।”

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।

एक तरफ उसके पापा की कमजोर हालत थी।

दूसरी तरफ उसका प्यार।

आदित्य को बताना जरूरी था

शाम हो चुकी थी।

घर के सभी लोग खाना खा चुके थे।

रिया चुपचाप छत पर चली गई।

उसने आसमान की तरफ देखा।

फिर अपना फोन निकाला और आदित्य को कॉल किया।

आदित्य ने तुरंत फोन उठा लिया।

“रिया, मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रहा था। आज कैसी हो?”

रिया की आवाज सुनते ही आदित्य समझ गया कि कुछ ठीक नहीं है।

“क्या हुआ? तुम रो रही हो?”

रिया ने खुद को संभालते हुए कहा—

“आदित्य… घर में मेरी शादी की बात चल रही है।”

कुछ सेकंड तक आदित्य बिल्कुल चुप रहा।

फिर बोला—

“क्या?”

“हां।”

“लेकिन तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

रिया की आवाज भर्रा गई।

“नहीं। पापा की तबीयत ठीक नहीं थी। मैं सही समय का इंतजार कर रही थी।”

आदित्य बेचैन हो गया।

“रिया, अब और इंतजार मत करो। मैं तुम्हारे साथ हूं। अगर जरूरत पड़ी तो मैं खुद तुम्हारे घर आकर तुम्हारे पापा से बात करूंगा।”

रिया ने तुरंत कहा—

“नहीं आदित्य! अभी तुम यहां मत आना।”

“लेकिन क्यों?”

“पापा अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं। अगर अचानक यह सब सुनेंगे तो उनकी तबीयत फिर बिगड़ सकती है।”

आदित्य चुप हो गया।

रिया ने कहा—

“मुझे पहले मां से बात करनी होगी।”

आदित्य ने पूछा—

“और अगर तुम्हारे घरवाले नहीं माने तो?”

रिया कुछ देर चुप रही।

फिर बोली—

“मुझे नहीं पता।”

आदित्य की आवाज में दर्द था।

“रिया, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

रिया की आंखों से आंसू निकल पड़े।

“मैं भी तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

दोनों काफी देर तक चुप रहे।

फिर आदित्य ने कहा—

“बस एक बात याद रखना। जो भी हो, मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा।”

रिया ने धीरे से कहा—

“मुझे तुम पर भरोसा है।”

मां के सामने रिया ने खोला राज

रिया फोन रखकर अभी छत पर ही खड़ी थी कि पीछे से आवाज आई—

“रिया!”

वह घबरा गई।

सुनीता उसके पीछे खड़ी थीं।

“तू यहां अकेली क्या कर रही है?”

रिया ने नजरें झुका लीं।

“बस मां… नींद नहीं आ रही थी।”

सुनीता उसके पास आकर बैठ गईं।

उन्होंने रिया का चेहरा देखा।

“बेटा, तू बहुत परेशान है।”

रिया चुप रही।

सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“क्या शादी की बात से परेशान है?”

रिया की आंखें भर आईं।

सुनीता बोलीं—

“देख बेटा, हमने अभी कुछ तय नहीं किया। लेकिन हरिराम जी का परिवार अच्छा है। लड़का भी ठीक है। तेरे पापा चाहते हैं कि उनकी जिम्मेदारी पूरी हो जाए।”

रिया ने धीमे से कहा—

“मां, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”

सुनीता ने कहा—

“मुझे पता है। तू पढ़ना चाहती है। लेकिन तेरे पापा ने कहा है कि शादी के बाद भी अगर तू पढ़ाई जारी रखना चाहे तो कोई रोक नहीं होगी।”

रिया ने अपनी मां की तरफ देखा।

वह समझ गई कि अब चुप रहने से बात नहीं बनेगी।

उसने कांपती आवाज में कहा—

“मां, मुझे आपसे एक बात कहनी है।”

“क्या?”

“लेकिन आप पापा को अभी मत बताना।”

सुनीता ने चिंतित होकर पूछा—

“ऐसी क्या बात है?”

रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।

“मां… मुझे जयपुर में एक लड़के से प्यार हो गया है।”

सुनीता जैसे पत्थर की हो गईं।

कुछ पल तक उन्होंने कुछ नहीं कहा।

फिर अचानक उनका हाथ उठा और रिया के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ गया।

रिया वहीं चुप खड़ी रही।

सुनीता की आंखों से भी आंसू निकल आए।

“इसीलिए भेजा था तुझे शहर पढ़ने?”

रिया ने अपना गाल पकड़ लिया।

सुनीता रोते हुए बोलीं—

“हमने सोचा था हमारी बेटी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होगी। हमें क्या पता था कि वहां जाकर तू प्यार के चक्कर में पड़ जाएगी।”

रिया कुछ नहीं बोली।

सुनीता लगातार बोलती रहीं—

“तुझे पता है तेरे पापा की हालत क्या है? अगर उन्हें यह बात पता चली तो पता नहीं क्या होगा।”

रिया रोते हुए बोली—

“मां, वह बहुत अच्छा लड़का है। उसने कभी मेरे साथ गलत व्यवहार नहीं किया। वह मेरा सम्मान करता है और मेरे लिए अपने परिवार से भी लड़ने को तैयार है।”

सुनीता ने कहा—

“लेकिन उसका परिवार?”

रिया चुप हो गई।

सुनीता ने फिर पूछा—

“क्या वह तुम्हारे जैसा साधारण परिवार है?”

रिया ने सिर हिलाकर कहा—

“नहीं।”

“फिर?”

“उसके पिता बहुत बड़े कारोबारी हैं।”

सुनीता ने अपना माथा पकड़ लिया।

“हे भगवान… यह तूने क्या कर दिया?”

रिया ने आदित्य के बारे में सब बताया

रिया ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

“मां, आप एक बार उससे मिल लो। आप खुद समझ जाओगी कि वह कैसा है।”

सुनीता ने कहा—

“तुझे लगता है इतनी आसानी से सब हो जाएगा? लोग क्या कहेंगे? तेरे पापा क्या सोचेंगे? हमारे गांव में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी?”

रिया ने कहा—

“मां, अगर वह मुझे छोड़ देता तो मैं भी शायद आपकी बात मान लेती। लेकिन वह मुझे छोड़ने को तैयार नहीं है। वह कहता है कि जरूरत पड़ी तो अपने घर की सारी सुविधाएं छोड़कर भी मेरे साथ रहेगा।”

सुनीता ने कांपती आवाज में पूछा—

“और तू?”

रिया ने रोते हुए कहा—

“मैं भी उसके बिना नहीं रह सकती मां।”

यह सुनते ही सुनीता का दिल कांप उठा।

वह अपनी बेटी को देखती रहीं।

जिस बच्ची को उन्होंने कभी गोद में लेकर सुलाया था, आज वही उनके सामने अपने प्यार के लिए खड़ी थी।

सुनीता के अंदर मां और समाज के बीच एक लड़ाई शुरू हो गई थी।

पूरी रात सुनीता परेशान रहीं

उस रात सुनीता की आंखों में नींद नहीं थी।

महेश जी कमरे में आराम से सो रहे थे।

उन्हें देखकर सुनीता की आंखों से आंसू निकल आए।

वह मन ही मन सोच रही थीं—

“अगर महेश को यह सब पता चला तो उनकी तबीयत पर क्या असर होगा?”

उन्हें रिया पर गुस्सा भी था।

लेकिन उससे ज्यादा डर था।

डर समाज का।

डर पति की तबीयत का।

और डर बेटी के भविष्य का।

दूसरी तरफ रिया भी अपने कमरे में बैठी रो रही थी।

उसे मां के थप्पड़ का दुख था, लेकिन वह यह भी समझ रही थी कि मां ने गुस्से में ऐसा किया था।

वह धीरे से बोली—

“मां मुझे समझने की कोशिश करो। मैं आदित्य को छोड़ नहीं सकती।”

अगली सुबह

सुबह होते ही रिया का फोन बजा।

आदित्य का फोन था।

“रिया, कल रात से तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है। क्या हुआ?”

रिया ने कहा—

“मैंने मां को सब बता दिया।”

आदित्य कुछ पल चुप रहा।

“उन्होंने क्या कहा?”

रिया की आवाज धीमी हो गई।

“वह बहुत नाराज हैं।”

“लेकिन तुम ठीक हो?”

“हां।”

“मैं तुम्हारे घर आ रहा हूं।”

रिया तुरंत बोली—

“नहीं आदित्य!”

“लेकिन रिया…”

“मैंने कहा ना, अभी मत आना। मुझे थोड़ा समय दो।”

आदित्य चुप हो गया।

फिर उसने कहा—

“ठीक है। लेकिन मैं इंतजार करूंगा। तुम अकेली नहीं हो।”

रिया ने फोन रख दिया।

जब वह कमरे से बाहर आई तो उसकी मां रसोई में चाय बना रही थीं।

दोनों की नजरें मिलीं।

कल रात की बात के बाद पहली बार दोनों आमने-सामने थीं।

सुनीता कुछ नहीं बोलीं।

रिया भी चुप रही।

वह सीधे अपने पापा के पास जाकर बैठ गई।

महेश जी ने बेटी को देखा।

“क्या हुआ बेटा? आज इतनी चुप क्यों है?”

रिया कुछ बोलने ही वाली थी कि सुनीता तीन कप चाय लेकर कमरे में आ गईं।

उन्होंने बात संभालते हुए कहा—

“आप किसी बात की चिंता मत कीजिए। बेटी घर आई है तो थोड़ी थकान है। सब ठीक है।”

महेश जी ने दोनों की तरफ देखा।

उन्हें महसूस हो रहा था कि घर में कुछ तो बदला है।

लेकिन अभी वह कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

उन्होंने चाय का कप उठाया।

“बस तुम दोनों मेरे सामने हंसती रहो। तुम्हें खुश देखकर ही मुझे जल्दी ठीक होने की ताकत मिलती है।”

रिया ने अपने आंसू रोक लिए।

सुनीता ने भी नजरें झुका लीं।

लेकिन दोनों जानती थीं कि यह शांति ज्यादा देर रहने वाली नहीं है।

क्योंकि अब रिया का प्यार सिर्फ उसका अपना राज नहीं रहा था।

एक तरफ था पिता का सपना…

दूसरी तरफ था आदित्य का प्यार…

और बीच में खड़ी थी एक मां, जिसे तय करना था कि वह बेटी का साथ दे या समाज का।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—

जब महेश जी को रिया और आदित्य के प्यार के बारे में पता चलेगा, तो क्या उनकी कमजोर हालत इस रिश्ते को स्वीकार कर पाएगी?

और क्या आदित्य अपने परिवार के सामने रिया के लिए खड़ा हो पाएगा?

शेष अगले भाग में…

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भाग 1भाग 3
भाग 2भाग 5

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