गाँव की रिया और शहर का आदित्य — सच्चे प्यार की कहानी | भाग 5

गाँव की रिया और शहर का आदित्य — सच्चे प्यार की कहानी | भाग 5

Love Emotional Story in Hindi: पिछली रात रिया के लिए उसकी जिंदगी की सबसे मुश्किल रात थी। एक तरफ उसके पिता का गुस्सा था और दूसरी तरफ आदित्य का प्यार। वह अपने माता-पिता को छोड़ना नहीं चाहती थी और आदित्य को भी अपनी जिंदगी से निकालने की कल्पना नहीं कर सकती थी।

लेकिन असली फैसला अभी बाकी था।

सुबह होने वाली थी और रिया जानती थी कि यह सुबह उसकी जिंदगी बदल सकती है।

सुबह का फैसला

रिया रात भर ठीक से सो नहीं पाई।

कभी उसे पापा का गुस्से से भरा चेहरा याद आता तो कभी आदित्य की आवाज।

उसने कई बार मोबाइल उठाकर आदित्य को फोन करने का सोचा, लेकिन फिर रुक गई।

वह खुद से कहती—

“नहीं… पहले पापा से बात करूंगी। चाहे जो हो जाए, मैं अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाऊंगी।”

सुबह की पहली किरण कमरे में पहुंची तो रिया उठ गई।

वह सीधे रसोई में गई।

सुनीता चुपचाप चूल्हे के पास बैठी थीं।

रिया ने धीरे से कहा—

“मां…”

सुनीता ने उसकी तरफ देखा लेकिन कुछ नहीं बोलीं।

रिया उनके पास बैठ गई।

“मां, आप मुझसे नाराज हैं तो नाराज रहिए। लेकिन मुझसे बात तो कीजिए।”

सुनीता की आंखें भर आईं।

“बेटी, नाराज तुझसे नहीं हूं। डर गई हूं।”

“किस बात से?”

“तेरे भविष्य से… तेरे पापा की हालत से… और इस बात से कि कहीं तेरे एक फैसले से हमारा पूरा परिवार बिखर न जाए।”

रिया ने मां का हाथ पकड़ लिया।

“मां, मैं आपको छोड़कर नहीं जाना चाहती। मैं बस चाहती हूं कि आप दोनों मुझे समझें।”

सुनीता ने कहा—

“तेरे पापा को समझाना आसान नहीं होगा।”

रिया ने दृढ़ आवाज में कहा—

“तो मैं कोशिश करूंगी।”

रिया पापा के सामने पहुंची

महेश जी रात भर सो नहीं पाए थे।

उन्हें रिया और सुनीता की सारी बातें याद आ रही थीं।

सुबह रिया कमरे में आई तो महेश जी खिड़की की तरफ मुंह करके बैठे थे।

रिया कुछ देर दरवाजे पर खड़ी रही।

फिर धीरे से बोली—

“पापा…”

महेश जी ने उसकी तरफ देखा।

चेहरे पर गुस्सा अब भी था।

“क्या चाहिए?”

रिया की आंखों में आंसू आ गए।

“आपसे बात करनी है।”

“कल भी बहुत बातें सुनी हैं मैंने।”

“पापा, मेरी बात एक बार पूरी सुन लीजिए। उसके बाद जो सजा देना चाहें दे दीजिए।”

महेश जी चुप रहे।

रिया उनके पास जाकर बैठ गई।

“पापा, मुझे पता है मैंने आपको बहुत दुख दिया है। आपने मुझे शहर पढ़ने भेजा था। आप चाहते थे कि मैं पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होऊं। लेकिन मुझे खुद नहीं पता चला कि कब आदित्य मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया।”

महेश जी ने कठोर आवाज में पूछा—

“तुम्हें पता है वह तुम्हारे लिए सही है?”

रिया ने कहा—

“हां पापा।”

“किस आधार पर?”

“क्योंकि उसने कभी मुझे मेरे परिवार से दूर करने की कोशिश नहीं की। बल्कि जब भी मैंने आपके बारे में बताया, उसने कहा कि वह सबसे पहले आपका आशीर्वाद लेना चाहता है।”

महेश जी कुछ नहीं बोले।

रिया ने आगे कहा—

“मैं आपसे यह नहीं कह रही कि आप तुरंत हां कर दीजिए। मैं बस चाहती हूं कि आप एक बार उससे मिल लें।”

महेश जी ने गुस्से में कहा—

“मैं उस लड़के से नहीं मिलूंगा।”

रिया की आंखों से आंसू बह निकले।

“पापा, अगर आपको उससे मिलने के बाद लगे कि वह मेरे लायक नहीं है, तो मैं आपकी बात मान लूंगी।”

महेश जी ने उसकी तरफ देखा।

“सच?”

रिया ने सिर हिलाया।

“हां पापा। लेकिन मेरी बात सुने बिना मुझे गलत मत समझिए।”

महेश जी कुछ देर तक बेटी को देखते रहे।

फिर उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

“मुझे सोचने दो।”

रिया के लिए यही बहुत था।

वह चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।

आदित्य को सच बताया

रिया ने बाहर आकर तुरंत आदित्य को फोन किया।

“आदित्य…”

“हां रिया, मैं कब से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रहा था।”

“मैंने पापा से बात की है।”

“उन्होंने क्या कहा?”

“वह बहुत नाराज हैं। लेकिन मैंने उनसे कहा है कि एक बार तुमसे मिल लें।”

आदित्य की आवाज में उम्मीद आ गई।

“रिया, मैं आज ही आ जाऊंगा।”

“लेकिन अकेले मत आना।”

“क्या मतलब?”

“अगर तुम सच में मुझे अपनी जिंदगी में चाहते हो तो अपने परिवार से भी बात करो।”

कुछ पल आदित्य चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“तुम सही कह रही हो। मैं अपने पापा से बात करूंगा।”

रिया ने कहा—

“मुझे किसी लड़ाई की जरूरत नहीं है आदित्य। मैं चाहती हूं कि सबकी मर्जी से हमारी शादी हो।”

आदित्य ने कहा—

“ठीक है। मैं पूरी कोशिश करूंगा।”

पहली बार आदित्य ने पिता से बात की

उधर आदित्य घर पहुंचा।

उसके पिता राजीव जी अपने ऑफिस के काम में व्यस्त थे।

आदित्य काफी देर तक उनके सामने खड़ा रहा।

राजीव जी ने पूछा—

“क्या बात है? कुछ कहना है?”

आदित्य ने गहरी सांस ली।

“पापा, मैं आपसे अपने जीवन के बारे में एक जरूरी बात करना चाहता हूं।”

राजीव जी ने लैपटॉप बंद कर दिया।

“बोलो।”

“मैं किसी से प्यार करता हूं।”

राजीव जी का चेहरा गंभीर हो गया।

“कौन है?”

“उसका नाम रिया है।”

“कहां की है?”

“राजस्थान के एक गांव की।”

राजीव जी कुछ पल चुप रहे।

फिर बोले—

“और तुमने शादी के बारे में सोच लिया?”

“हां।”

“उसका परिवार?”

“उसके पापा शिक्षक हैं।”

राजीव जी ने कुर्सी से पीछे टिकते हुए कहा—

“आदित्य, तुम जानते हो हमारे परिवार और उनके परिवार में कितना अंतर है?”

“जानता हूं पापा।”

“फिर भी?”

“हां।”

“क्यों?”

आदित्य ने शांत आवाज में कहा—

“क्योंकि मुझे रिया उसके परिवार, गांव या पैसों की वजह से नहीं पसंद है। मुझे वह उसके स्वभाव की वजह से पसंद है।”

राजीव जी कुछ नहीं बोले।

आदित्य ने आगे कहा—

“अगर आप मेरी खुशी चाहते हैं तो एक बार उससे और उसके परिवार से मिल लीजिए। अगर आपको लगे कि वह मेरे लिए सही नहीं है, तो मैं आपकी बात सुनूंगा। लेकिन बिना मिले सिर्फ इसलिए मना मत कीजिए कि वह हमारे बराबर परिवार से नहीं है।”

राजीव जी ने बेटे की तरफ देखा।

पहली बार उन्हें लगा कि उनका बेटा अब बच्चा नहीं रहा।

वह अपने जीवन का फैसला खुद लेने की उम्र में आ चुका था।

उन्होंने कहा—

“ठीक है। पहले उस लड़की और उसके परिवार से मिलते हैं।”

आदित्य के चेहरे पर राहत आ गई।

गांव की तरफ रवाना

अगले दिन आदित्य अपने पिता राजीव जी के साथ रिया के गांव पहुंचा।

आदित्य ने रिया को फोन किया।

“हम गांव के बाहर हैं।”

रिया घबरा गई।

“क्या? आप आ गए?”

“हां।”

रिया ने तुरंत मां को बताया।

सुनीता के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

“बेटी, तेरे पापा को पता है?”

रिया ने कहा—

“हां मां। मैंने उन्हें बताया है।”

सुनीता ने गहरी सांस ली।

“जो होना है अब सामने ही होगा।”

रिया ने पापा के कमरे की तरफ देखा।

महेश जी चुपचाप लेटे हुए थे।

सुनीता ने जाकर उन्हें बताया—

“आदित्य और उसके पापा आए हैं।”

महेश जी कुछ देर तक आंखें बंद किए रहे।

फिर बोले—

“उन्हें अंदर बुला लो।”

रिया के दिल की धड़कन तेज हो गई।

आमने-सामने हुए दो परिवार

आदित्य और राजीव जी घर के अंदर आए।

आदित्य ने महेश जी को नमस्कार किया।

“नमस्ते अंकल।”

महेश जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

राजीव जी ने आगे बढ़कर कहा—

“नमस्ते। मैं आदित्य का पिता हूं।”

महेश जी ने उनकी तरफ देखा।

“बैठिए।”

कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा।

राजीव जी ने कहा—

“महेश जी, मुझे पता चला कि बच्चों ने एक-दूसरे को पसंद किया है। मैं यहां किसी पर दबाव डालने नहीं आया हूं।”

महेश जी बोले—

“लेकिन आपके और हमारे बीच बहुत अंतर है।”

राजीव जी ने शांत आवाज में कहा—

“मैं मानता हूं। लेकिन शादी दो परिवारों की हैसियत से नहीं, दो लोगों के जीवन से चलती है।”

महेश जी ने आदित्य की तरफ देखा।

“तुम्हें पता है मेरी बेटी ने कितने सपने देखे हैं?”

आदित्य ने कहा—

“हां अंकल।”

“वह पढ़ना चाहती है।”

“और मैं चाहता हूं कि वह पढ़ाई पूरी करे।”

“उसे अपने माता-पिता की चिंता रहती है।”

“और मैं चाहता हूं कि शादी के बाद भी वह आपके साथ वैसे ही रहे जैसे आज रहती है।”

महेश जी पहली बार शांत हुए।

उन्होंने पूछा—

“अगर कभी मेरे पास तुम्हारे पिता जितने पैसे नहीं हुए तो?”

आदित्य मुस्कुराया।

“अंकल, मुझे रिया से शादी करनी है, आपकी संपत्ति से नहीं।”

कमरे में बैठे सभी लोग चुप हो गए।

महेश जी की आंखों में नमी आ गई।

पिता का सबसे बड़ा सवाल

महेश जी ने कहा—

“आदित्य, प्यार करना आसान है। लेकिन जिंदगी भर साथ निभाना मुश्किल।”

आदित्य ने कहा—

“मैं जानता हूं।”

“आज तुम रिया के लिए अपने परिवार के सामने खड़े हो। कल अगर मुश्किल आई तो?”

आदित्य ने बिना झिझक कहा—

“तब भी उसके साथ खड़ा रहूंगा।”

महेश जी ने पूछा—

“अगर कभी तुम्हें लगे कि तुमने गलत फैसला किया है?”

आदित्य ने रिया की तरफ देखा।

“तब सबसे पहले उसे बताऊंगा और समस्या को साथ मिलकर हल करूंगा। उसे छोड़कर भागना मेरा तरीका नहीं है।”

यह सुनकर रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

सुनीता भी अपनी आंखें पोंछने लगीं।

महेश जी का दिल पिघल गया

महेश जी ने अपनी बेटी को पास बुलाया।

“रिया।”

रिया उनके पास आकर बैठ गई।

महेश जी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

“तूने मुझसे यह बात छिपाकर अच्छा नहीं किया।”

रिया रोते हुए बोली—

“माफ कर दीजिए पापा।”

“लेकिन शायद मैं भी गलत था।”

रिया ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

महेश जी बोले—

“मैं अपनी बीमारी के बाद डर गया था। मुझे लगने लगा था कि पता नहीं मेरे बाद तेरा क्या होगा। इसलिए जल्दी से तेरी शादी करके अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता था।”

उन्होंने रिया के सिर पर हाथ रखा।

“लेकिन बेटा, बेटी की शादी सिर्फ पिता की जिम्मेदारी पूरी करने का नाम नहीं है। बेटी की खुशी भी जरूरी है।”

रिया फूट-फूटकर रोने लगी।

“पापा…”

महेश जी ने उसे गले लगा लिया।

“बस एक वादा कर।”

“क्या पापा?”

“कभी अपने माता-पिता से कोई बात छिपाना मत।”

रिया ने सिर हिलाते हुए कहा—

“वादा।”

मां ने भी बेटी को गले लगाया

सुनीता इतने समय से खुद को रोक रही थीं।

अब वह भी रिया के पास आईं।

उन्होंने बेटी को गले लगाकर कहा—

“मुझे माफ कर दे बेटी। कल मैंने तुझे थप्पड़ मार दिया था। उस बात का दुख मुझे खुद से ज्यादा है।”

रिया ने मां का हाथ पकड़ लिया।

“मां, मुझे पता है आप डर गई थीं।”

सुनीता रोते हुए बोलीं—

“मैं बस तुझे खोने से डर रही थी।”

रिया ने कहा—

“मैं कहीं नहीं जा रही मां।”

यह सुनकर सुनीता मुस्कुरा दीं।

राजीव जी ने भी एक बात कही

राजीव जी ने महेश जी की तरफ देखकर कहा—

“मैं भी आपसे एक बात कहना चाहता हूं।”

महेश जी ने उनकी तरफ देखा।

“आपकी बेटी हमारे घर आएगी तो बहू बनकर नहीं, बेटी बनकर आएगी। और अगर कभी उसे लगे कि वह अपने माता-पिता से दूर हो रही है तो मैं खुद उसे आपके पास भेजूंगा।”

महेश जी की आंखों में आंसू आ गए।

उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा—

“फिर मुझे और क्या चाहिए?”

राजीव जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“हाथ मत जोड़िए। अब तो हम समधी हैं।”

कमरे में पहली बार हंसी गूंज उठी।

रिया ने आदित्य की तरफ देखा।

आदित्य मुस्कुरा रहा था।

उन दोनों की आंखों में एक ही खुशी थी।

लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी

कुछ दिनों बाद रिया वापस जयपुर जाने की तैयारी करने लगी।

इस बार उसके साथ विदाई के आंसू थे, लेकिन डर नहीं था।

महेश जी ने कहा—

“जा बेटा, अपनी पढ़ाई पूरी कर। अपने सपने पूरे कर। शादी की चिंता मत कर।”

सुनीता ने उसके बैग में खाना रखते हुए कहा—

“और समय पर खाना खाना।”

रिया हंसते हुए बोली—

“मां, अब मैं बच्ची नहीं हूं।”

महेश जी बोले—

“हमारे लिए तो हमेशा बच्ची ही रहेगी।”

रिया ने दोनों को गले लगा लिया।

फिर आदित्य की तरफ देखा।

वह कुछ दूरी पर खड़ा था।

उसने मुस्कुराकर पूछा—

“चलें?”

रिया ने कहा—

“हां।”

लेकिन जाने से पहले रिया वापस मुड़ी।

वह अपने घर को देखने लगी।

वही छोटा सा आंगन।

वही मिट्टी की खुशबू।

वही घर जहां उसने अपना बचपन बिताया था।

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

आदित्य ने पूछा—

“क्या हुआ?”

रिया मुस्कुराई।

“कुछ नहीं… बस अपना आशियाना छोड़कर एक नए आशियाने की तरफ जा रही हूं।”

आदित्य ने उसका हाथ थाम लिया।

“लेकिन इस बार तुम अपना आशियाना छोड़कर अकेली नहीं जा रही।”

रिया ने उसकी तरफ देखा।

“फिर?”

आदित्य ने कहा—

“अपने दो परिवारों की दुआएं साथ लेकर जा रही हो।”

रिया मुस्कुरा दी।

कुछ महीने बाद…

रिया ने अपनी पढ़ाई पूरी की।

उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई।

आदित्य ने अपने पिता के कारोबार में काम करना शुरू कर दिया।

दोनों ने अपने परिवारों की मौजूदगी में शादी की।

शादी के बाद भी रिया ने अपने माता-पिता से रिश्ता कभी कमजोर नहीं होने दिया।

वह हर सप्ताह गांव जाती।

महेश जी की दवाइयों का ध्यान रखती।

सुनीता के लिए सामान लेकर आती।

और जब भी वह गांव आती, आदित्य भी उसके साथ होता।

एक दिन महेश जी ने आदित्य से कहा—

“बेटा, मैंने कभी सोचा नहीं था कि शहर का लड़का हमारे गांव में इतना घुल-मिल जाएगा।”

आदित्य हंसकर बोला—

“पापा, मैं शहर का हूं ही कहां? मेरी पत्नी तो गांव की है।”

महेश जी जोर से हंस पड़े।

सुनीता भी मुस्कुरा उठीं।

रिया दूर खड़ी यह सब देख रही थी।

उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

उसे याद आया वह दिन जब उसने पहली बार इस घर को छोड़कर शहर का रास्ता पकड़ा था।

तब उसे लगा था कि शायद पढ़ाई और प्यार के बीच उसे किसी एक को चुनना पड़ेगा।

लेकिन जिंदगी ने उसे एक ऐसी राह दिखाई जहां उसने दोनों पा लिए।

उसे अपना प्यार भी मिला।

और अपने माता-पिता का आशीर्वाद भी।

सच्चे प्यार की सबसे बड़ी जीत

रिया ने आदित्य का हाथ पकड़ा और कहा—

“आदित्य, अगर उस दिन मैं गुस्से में घर छोड़ देती तो शायद आज यह सब नहीं होता।”

आदित्य ने कहा—

“और अगर तुमने अपने माता-पिता से लड़ने की जगह उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की होती तो शायद हम दोनों की कहानी भी अलग होती।”

रिया मुस्कुराई।

“तो असली जीत किसकी हुई?”

आदित्य ने कहा—

“प्यार की।”

रिया ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

आदित्य ने पूछा—

“फिर?”

रिया ने अपने माता-पिता की तरफ देखते हुए कहा—

“उस प्यार की, जिसमें अपने साथ अपनों की खुशी भी शामिल हो।”

महेश जी ने दोनों की बात सुन ली थी।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“और याद रखना बच्चों, सच्चा प्यार वही है जो किसी को तोड़ता नहीं, बल्कि दो परिवारों को जोड़ देता है।”

रिया की आंखों से आंसू निकल पड़े।

वह अपने पिता के पास गई और उनके गले लग गई।

सुनीता भी दोनों के पास आ गईं।

आदित्य ने भी झुककर महेश जी के पैर छुए।

महेश जी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।

उस छोटे से गांव के आंगन में उस दिन सिर्फ एक शादी की खुशी नहीं थी।

वहां एक बेटी के सपनों की जीत थी।

एक मां के डर की हार थी।

एक पिता के भरोसे की जीत थी।

और दो लोगों के उस प्यार की जीत थी, जिसने आखिरकार दो परिवारों को एक कर दिया था।

कभी-कभी सच्चे प्यार को पाने के लिए घर छोड़ना नहीं पड़ता…

बस अपनों को अपने प्यार की सच्चाई समझाने के लिए थोड़ा वक्त, थोड़ा धैर्य और बहुत सारा विश्वास चाहिए।

समाप्त

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भाग 1भाग 3
भाग 2भाग 4

ऐसी और भी बहुत सारी प्रेम कहानियाँ पढ़ने के लिए क्लिक करे: Love Emotional Story in Hindi

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