जादूगर का घमंड:-
एक बार विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक प्रसिद्ध जादूगर आया। वह अपने साथ तरह-तरह के जादुई सामान लेकर आया था। दरबार में पहुंचते ही उसने राजा से अनुमति ली और जादू दिखाना शुरू कर दिया।
जादूगर ने कभी हवा में से फूल निकाल दिए, कभी खाली बर्तन से सोने के सिक्के निकाल दिए, तो कभी एक पल में कपड़ा गायब कर दिया। उसके करतब देखकर पूरा दरबार दंग रह गया। दरबारी तालियाँ बजाने लगे और राजा कृष्णदेव राय भी उसकी कला से बहुत प्रसन्न हुए।

जादू खत्म होने के बाद राजा ने उसे ढेर सारे उपहार दिए। सोने के सिक्के, अच्छे कपड़े और सम्मान पाकर जादूगर का घमंड और बढ़ गया। वह अपने आप को सबसे बड़ा कलाकार समझने लगा।
दरबार से जाते-जाते वह ऊँची आवाज में बोला,
“क्या इस दरबार में कोई ऐसा है जो मेरे जैसे जादू दिखा सके? क्या कोई मुझे टक्कर दे सकता है?”
उसकी यह बात सुनकर पूरा दरबार शांत हो गया। कोई भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया। सभी जानते थे कि जादू में उससे मुकाबला करना आसान नहीं है।
लेकिन यह घमंड भरी बातें तेनालीराम को बिल्कुल पसंद नहीं आईं। वे अपनी जगह से उठे और मुस्कराते हुए बोले,
“हाँ, मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ।”
यह सुनकर जादूगर चौंक गया।
“तुम? और मुझसे मुकाबला?” उसने हँसते हुए कहा।
तेनालीराम ने शांति से कहा,
“मैं ऐसा करतब दिखाऊँगा, जिसे तुम खुली आँखों से भी नहीं कर पाओगे, जबकि मैं उसे आँखें बंद करके करूँगा। बताओ, क्या तुम यह चुनौती स्वीकार करते हो?”
जादूगर अपने घमंड में अंधा हो चुका था। उसने बिना सोचे-समझे कहा,
“मुझे मंजूर है।”
अब तेनालीराम ने राजमहल के रसोइये को बुलवाया और उससे मिर्च का पाउडर मंगवाया। दरबार में बैठे लोग हैरान हो गए कि तेनालीराम क्या करने वाले हैं।
तेनालीराम ने सबके सामने अपनी आँखें बंद कीं और एक मुट्ठी मिर्च का पाउडर सीधे अपनी आँखों पर डाल लिया। कुछ पल के लिए पूरा दरबार सन्न रह गया। फिर तेनालीराम ने मिर्च झटकी, कपड़े से आँखें पोंछीं और ठंडे पानी से अपना चेहरा धो लिया।
थोड़ी देर बाद वे बिल्कुल सामान्य दिखने लगे।
फिर तेनालीराम ने जादूगर की ओर देखकर कहा,
“अब तुम अपनी खुली आँखों से यही करतब करके दिखाओ।”
यह सुनते ही जादूगर के चेहरे का रंग बदल गया। उसे समझ आ गया कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है। वह जानता था कि अगर उसने ऐसा किया, तो उसकी आँखों को भारी नुकसान हो सकता है।
जादूगर सिर झुकाकर बोला,
“महाराज, मुझसे गलती हो गई। मैंने अपने ज्ञान और कला का घमंड कर लिया। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए।”
उसने तेनालीराम के सामने हाथ जोड़ लिए और बिना कुछ कहे दरबार से चला गया।
राजा कृष्णदेव राय तेनालीराम की इस बुद्धिमानी पर बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा,
“तेनालीराम, तुमने बिना किसी को चोट पहुँचाए उस घमंडी जादूगर को उसकी गलती समझा दी।”
राजा ने तेनालीराम को इनाम दिया और पूरे दरबार में उनकी तारीफ की। सभी दरबारी तेनालीराम की समझदारी और सूझबूझ के कायल हो गए।
सीख
घमंड इंसान को अंधा बना देता है, जबकि बुद्धिमानी बिना लड़ाई के भी जीत दिला देती है।
मुख्य पेज – तेनालीराम की कहानियाँ
