तेनालीराम राजा कृष्णदेव राय के अत्यंत प्रिय और बुद्धिमान मंत्री थे। उनकी समझदारी और राजा के निकट होने के कारण कई लोग उनसे ईर्ष्या करते थे। उन्हीं ईर्ष्यालु लोगों में एक था रघु नाम का फल व्यापारी। वह तेनालीराम को किसी न किसी तरह अपमानित करना चाहता था।
एक दिन रघु ने तेनालीराम को अपने फल की दुकान पर बुलाया। उसने बड़े मीठे स्वर में कहा, “तेनालीराम जी, आज मेरे फल बहुत अच्छे हैं, आप जरूर लीजिए।”
तेनालीराम ने कुछ फल उठाए और उनका दाम पूछा। रघु मुस्कुराते हुए बोला,
“आपके लिए इन फलों का दाम कुछ नहीं है।”
यह सुनकर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भरकर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोक लिया और बोला,
“अरे! मेरे फलों का दाम तो देते जाइए।”
तेनालीराम आश्चर्य से बोले, “अभी तो तुमने कहा था कि दाम कुछ नहीं है।”
रघु चालाकी से बोला, “हाँ, मैंने कहा था दाम कुछ नहीं है। अब बस वही ‘कुछ नहीं’ मुझे दे दीजिए, वरना मैं राजा के दरबार में शिकायत कर दूँगा।”
तेनालीराम उसकी चाल समझ गए, लेकिन उस समय कुछ बोले बिना घर लौट आए। वे सोचने लगे कि आखिर इस ‘कुछ नहीं’ को कैसे दिया जाए।
अगले ही दिन रघु राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुँच गया और शिकायत करने लगा,
“महाराज! तेनालीराम ने मेरे फल खा लिए, लेकिन उनका दाम ‘कुछ नहीं’ मुझे नहीं दिया।”
राजा ने तुरंत तेनालीराम को बुलाया। तेनालीराम पूरी तैयारी के साथ एक रत्न-जड़ित संदूक लेकर दरबार में आए और रघु के सामने रख दिया।
उन्होंने कहा, “महाराज, यही है रघु के फलों का दाम।”
संदूक देखकर रघु की आँखें चमक उठीं। उसे लगा कि इसमें हीरे-जवाहरात भरे होंगे। उसने जल्दी से संदूक खोला और अगले ही पल चिल्ला उठा,
“ये क्या! इसमें तो कुछ भी नहीं है!”
तेनालीराम मुस्कुराते हुए बोले,
“बिलकुल सही। तुमने खुद कहा था कि फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ है। अब अपना ‘कुछ नहीं’ ले लो और यहाँ से जाओ।”
यह सुनते ही राजा कृष्णदेव राय और पूरा दरबार ठहाके लगाकर हँस पड़ा। रघु शर्मिंदा होकर वहाँ से चला गया।
एक बार फिर तेनालीराम ने अपनी बुद्धि से सबको सिखा दिया कि चालाकी हमेशा समझदारी के आगे हार जाती है।
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