पड़ोसी राजा : तेनालीराम की बुद्धिमानी भरी कहानी

पड़ोसी राजा : तेनालीराम की बुद्धिमानी भरी कहानी

पड़ोसी राजा:-
विजयनगर राज्य उस समय भारत के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली राज्यों में गिना जाता था। राजा कृष्णदेव राय अपने न्याय, समझदारी और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में कई विद्वान, कवि और मंत्री थे, लेकिन उनमें सबसे अलग थे तेनालीराम।

तेनालीराम सिर्फ हँसी-मज़ाक करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे बहुत ही समझदार, तेज दिमाग और दूर की सोच रखने वाले इंसान थे। राजा उन पर आंख बंद करके भरोसा करते थे। यही बात कई दरबारियों को खटकती थी। वे तेनालीराम से जलते थे और किसी न किसी तरह उन्हें राजा की नजरों से गिराना चाहते थे।

इसी बीच विजयनगर राज्य और उसके पड़ोसी राज्य के रिश्ते ठीक नहीं चल रहे थे। दोनों राज्यों के बीच गलतफहमियाँ बढ़ रही थीं और युद्ध की आशंका भी बनी हुई थी। तेनालीराम के दुश्मनों को लगा कि यही सही मौका है।

एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने बगीचे में अकेले टहल रहे थे। उनके मन में पड़ोसी राज्य की समस्या चल रही थी। तभी एक दरबारी चुपके से उनके पास आया। उसने इधर-उधर देखा और फिर धीरे से राजा के कान में बोला,
“महाराज, क्या आपने कुछ सुना है?”

राजा ने चौंककर पूछा,
“नहीं, क्या बात है?”

दरबारी ने नाटक करते हुए कहा,
“महाराज, पहले वचन दीजिए कि आप मुझे दंड नहीं देंगे, तभी मैं सच बता पाऊँगा।”

राजा बोले,
“जो कहना है साफ-साफ कहो, डरने की कोई बात नहीं।”

तब उस दरबारी ने कहा,
“महाराज, तेनालीराम पड़ोसी राजा से मिले हुए हैं। वे हमारे राज्य के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।”

यह सुनते ही राजा को बहुत गुस्सा आया।
“यह क्या बकवास है!” राजा गरज पड़े। “तेनालीराम ऐसा कभी नहीं कर सकता।”

दरबारी बोला,
“महाराज, आप उन पर बहुत भरोसा करते हैं, इसलिए सच्चाई नहीं देख पा रहे। मैंने पूरी जांच के बाद ही यह बात आप तक पहुँचाई है।”

बार-बार कहने पर राजा के मन में भी हल्का सा शक पैदा हो गया। उन्होंने कहा,
“ठीक है, मैं खुद इस बात की जांच करूंगा।”

अगले दिन राजा ने तेनालीराम को अकेले में बुलाया और सीधे पूछा,
“तेनालीराम, हमें खबर मिली है कि तुम पड़ोसी राजा से मिलकर हमारे राज्य को नुकसान पहुँचाना चाहते हो। क्या यह सच है?”

यह सुनकर तेनालीराम के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे कांपने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दें। राजा ने उनकी चुप्पी को गलत समझा और गुस्से में बोले,
“तो क्या तुम्हारी चुप्पी को अपराध मान लिया जाए?”

तेनालीराम की आँखों में आँसू आ गए। वे बोले,
“महाराज, मैंने कभी आपके खिलाफ सोच भी नहीं सकता। लेकिन मैं आपकी बात काटने का साहस भी नहीं कर सकता।”

राजा उस समय बहुत क्रोधित थे। उन्होंने कहा,
“तुम्हें मेरे राज्य में रहने का कोई अधिकार नहीं। कल तक विजयनगर छोड़ दो और उसी राजा के पास जाकर रहो, जिससे तुम मिले हुए हो।”

तेनालीराम ने शांति से कहा,
“महाराज, इतने बड़े अपराध की इतनी छोटी सजा?”

राजा बोले,
“तुम्हारी पिछली सेवाओं को देखते हुए मैं तुम्हें जीवनदान दे रहा हूँ। किसी और के साथ ऐसा होता तो उसकी जान ले ली जाती।”

तेनालीराम बिना कुछ कहे सिर झुकाकर वहाँ से चले गए।

अगले दिन जब बाकी दरबारियों को पता चला कि तेनालीराम राज्य छोड़कर जा चुके हैं, तो वे बहुत खुश हुए। उन्हें लगा कि अब उनका रास्ता साफ हो गया है।

उधर तेनालीराम सीधे पड़ोसी राज्य की राजधानी पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने राजा से मिलने की अनुमति माँगी। जब वे दरबार में पहुँचे, तो उन्होंने पड़ोसी राजा की तारीफ में सुंदर शब्दों में कविता सुनाई।

राजा खुश हो गया और बोला,
“तुम कौन हो?”

तेनालीराम ने विनम्रता से कहा,
“मैं विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय का निजी सचिव तेनालीराम हूँ।”

राजा यह सुनकर हैरान हुआ,
“जब हमारे और तुम्हारे राजा के रिश्ते अच्छे नहीं हैं, तब तुम यहाँ कैसे आए?”

तेनालीराम मुस्कराए और बोले,
“राजन, आप और हमारे महाराज दोनों ही समझदार और प्रजा का भला चाहने वाले राजा हैं। युद्ध से किसी का फायदा नहीं होता। गलतफहमी दूर करने के लिए ही मुझे भेजा गया है।”

पड़ोसी राजा ने कहा,
“लेकिन हमें खबर मिली है कि राजा कृष्णदेव राय हम पर हमला करने वाले हैं।”

तेनालीराम बोले,
“हमारे गुप्तचरों ने भी यही बात कही थी। इसलिए महाराज चाहते हैं कि सच्चाई सामने आए।”

तेनालीराम ने सुझाव दिया,
“आप एक दूत उपहार और संधि पत्र के साथ विजयनगर भेजिए। मैं भी अपना पत्र दूँगा। अगर उपहार स्वीकार हो जाए तो दोस्ती तय, नहीं तो मुझे सजा दे दीजिए।”

राजा को यह बात समझ में आ गई। अगले ही दिन दूत विजयनगर भेजा गया।

उधर राजा कृष्णदेव राय को भी सच्चाई पता चल चुकी थी कि तेनालीराम निर्दोष हैं। जब उपहार पहुँचे तो राजा बहुत खुश हुए। उन्होंने तुरंत मित्रता स्वीकार की और तेनालीराम को वापस बुलवा लिया।

जब तेनालीराम विजयनगर लौटे, तो राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें इनाम दिया। जिन दरबारियों ने साजिश रची थी, वे शर्मिंदा होकर सिर झुकाए खड़े रहे।

सीख

सच्चाई और बुद्धिमानी देर से ही सही, लेकिन जीत जरूर जाती है।

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