गाँव के शांत माहौल में दो मित्र रहते थे – जुम्मन शेख और अलगू चौधरी। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि लोग उनकी मिसाल दिया करते थे। वे साथ में खेती करते थे, लेन-देन भी मिलकर करते थे और एक-दूसरे पर पूरा भरोसा रखते थे। अगर जुम्मन कहीं बाहर जाते, तो अपना घर अलगू के हवाले कर जाते और जब अलगू बाहर जाते, तो जुम्मन उनके घर की जिम्मेदारी संभालते।
उनकी दोस्ती धर्म, जाति या खान-पान पर नहीं, बल्कि आपसी समझ और विश्वास पर टिकी थी। यही उनकी मित्रता की सबसे बड़ी ताकत थी।
जुम्मन और उनकी खाला की कहानी
जुम्मन की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थीं। उनके पास थोड़ी-सी जमीन थी, लेकिन उनका कोई सहारा नहीं था। जुम्मन ने उन्हें बड़े-बड़े वादे करके अपनी जमीन अपने नाम लिखवा ली। उन्होंने कहा था कि वे उन्हें जीवन भर खाना और कपड़ा देंगे।
शुरुआत में खाला की बहुत सेवा की गई। उन्हें अच्छा खाना दिया गया, उनकी हर जरूरत का ध्यान रखा गया। लेकिन जैसे ही जमीन का कागज जुम्मन के नाम हो गया, सब बदल गया।
अब खाला को सूखी रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे। जुम्मन की पत्नी उनसे बुरा व्यवहार करने लगी और खुद जुम्मन भी उनकी तरफ ध्यान नहीं देते थे। बेचारी बूढ़ी खाला रोज-रोज अपमान सहती रहीं, लेकिन एक दिन उनका धैर्य टूट गया।
उन्होंने जुम्मन से कहा,
“बेटा, अब मेरा यहाँ गुजारा नहीं हो सकता। तुम मुझे हर महीने कुछ पैसे दे दिया करो, मैं अपना खाना खुद बना लूँगी।”
जुम्मन ने रूखेपन से जवाब दिया,
“पैसे क्या यहाँ पेड़ पर लगते हैं?”
खाला समझ गईं कि अब न्याय केवल पंचायत से ही मिल सकता है। उन्होंने पंचायत बुलाने का फैसला किया।
पंचायत का दिन और बड़ा फैसला
खाला गाँव-गाँव जाकर लोगों से मदद मांगती रहीं। आखिरकार पंचायत का दिन आ गया। गाँव के पेड़ के नीचे पंचायत बैठी।
जब पंच चुनने की बारी आई, तो खाला ने अलगू चौधरी को सरपंच बना दिया। यह सुनकर सब चौंक गए, क्योंकि अलगू और जुम्मन बहुत अच्छे दोस्त थे।
अलगू पहले हिचकिचाए, लेकिन खाला ने कहा,
“बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में भगवान बसते हैं।”
ये बात अलगू के दिल को छू गई।
अब अलगू सरपंच के रूप में बैठे थे। उन्होंने दोनों पक्षों की बातें ध्यान से सुनीं। जुम्मन को पूरा विश्वास था कि उसका दोस्त उसके पक्ष में ही फैसला देगा।
लेकिन जब फैसला सुनाने का समय आया, तो अलगू ने न्याय को दोस्ती से ऊपर रखा।
उन्होंने कहा,
“जुम्मन शेख! खाला को हर महीने खर्च देना होगा। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते, तो जमीन का हक उन्हें वापस देना होगा।”
यह सुनते ही सब लोग दंग रह गए। जुम्मन को बहुत बड़ा झटका लगा। उसे लगा कि उसके दोस्त ने उसे धोखा दिया है।
दोस्ती में दरार
इस फैसले के बाद दोनों की दोस्ती में दरार आ गई। अब वे पहले जैसे नहीं रहे। जुम्मन के मन में अलगू के लिए गुस्सा भर गया। वह बदला लेने का मौका ढूंढने लगा।
दूसरी पंचायत और बदले का मौका
कुछ समय बाद अलगू ने एक बैल खरीदा, जिसे उन्होंने समझू साहू को बेच दिया। साहू ने बैल से बहुत काम लिया, उसकी ठीक से देखभाल नहीं की और अंत में बैल मर गया।
जब अलगू ने पैसे मांगे, तो साहू ने देने से मना कर दिया। मामला फिर पंचायत में गया।
इस बार पंच चुना गया – जुम्मन शेख।
अलगू डर गए, क्योंकि अब फैसला उनके खिलाफ भी जा सकता था। लेकिन अब जुम्मन सरपंच की कुर्सी पर बैठे थे।
न्याय की जीत
सरपंच बनते ही जुम्मन के अंदर जिम्मेदारी की भावना जाग उठी। उन्होंने सोचा,
“अब मैं दोस्त या दुश्मन नहीं हूँ, मैं सिर्फ न्याय करने वाला हूँ।”
उन्होंने दोनों पक्षों की बातें सुनीं और फिर फैसला सुनाया—
“समझू साहू को बैल का पूरा दाम देना होगा, क्योंकि बैल उनकी लापरवाही से मरा है।”
यह सुनकर सब लोग खुशी से बोल उठे—
“पंच परमेश्वर की जय!”
अंत में सच्चाई की जीत
फैसले के बाद जुम्मन अलगू के पास गए और गले लगकर बोले,
“भाई, जब तुमने मेरे खिलाफ फैसला दिया था, तब मैं तुम्हारा दुश्मन बन गया था। लेकिन आज समझ आया कि पंच के पद पर बैठकर न कोई दोस्त होता है, न दुश्मन। वहाँ सिर्फ न्याय होता है।”
दोनों की आँखों में आँसू आ गए और उनकी पुरानी दोस्ती फिर से मजबूत हो गई।
सीख
जब इंसान न्याय की कुर्सी पर बैठता है, तो उसे अपने रिश्ते और भावनाएँ भूलकर सिर्फ सच्चाई का साथ देना चाहिए।
इसीलिए कहा जाता है –
“पंच में परमेश्वर का वास होता है।”
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