राजा कृष्णदेवराय के दरबार में तेनालीराम अपनी बुद्धि और चतुराई के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। लेकिन दरबार में कुछ लोग ऐसे भी थे जो तेनालीराम से ईर्ष्या करते थे। खासकर राजगुरु, जो हमेशा तेनालीराम को नीचा दिखाने का मौका ढूँढते रहते थे।
एक दिन तेनालीराम से जलने वाले कुछ ब्राह्मण राजगुरु के पास पहुँचे। वे जानते थे कि राजगुरु तेनालीराम के सबसे बड़े विरोधी हैं। इसलिए उन्होंने मिलकर एक चाल चलने की योजना बनाई। उन्होंने सोचा कि क्यों न तेनालीराम को अपना शिष्य बनाने का बहाना किया जाए। शिष्य बनाने की विधि के दौरान शरीर को गरम शंख और लोहे के चक्र से दागा जाता था। इसी बहाने वे तेनालीराम को कष्ट देना चाहते थे और बाद में उसे निम्न कोटि का ब्राह्मण कहकर शिष्य बनाने से मना कर देंगे।
अगले ही दिन राजगुरु ने तेनालीराम को अपने घर बुलाया और कहा,
“मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाना चाहता हूँ।”
चतुर तेनालीराम तुरंत समझ गया कि इस बात के पीछे जरूर कोई चाल है, लेकिन उसने अनजान बनते हुए पूछा,
“महाराज, मुझे अपना शिष्य कब बनाएंगे?”
राजगुरु बोले,
“आने वाले मंगलवार को। उस दिन तुम स्नान करके मेरे दिए हुए नए वस्त्र पहनकर मेरे घर आना। मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएँ भी दूँगा और विधिवत रूप से तुम्हें अपना शिष्य बना लूँगा।”
तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए कहा,
“ठीक है, मैं अवश्य आऊँगा।”
घर पहुँचकर तेनालीराम ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई। उसकी पत्नी चिंतित होकर बोली,
“मुझे लगता है इसमें जरूर कोई चाल है। राजगुरु बिना मतलब के ऐसा प्रस्ताव नहीं देंगे।”
तेनालीराम हँसते हुए बोला,
“चिंता मत करो। अगर वह शेर है तो मैं सवा शेर हूँ।”
फिर उसने योजना बनाई। उसे पता था कि कुछ दिन पहले कुछ ब्राह्मण राजगुरु के घर सभा में गए थे। उनमें सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण था, जिसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी।
अगले दिन तेनालीराम सोमदत्त के घर पहुँचा। उसने कुछ देर बातचीत करने के बाद उसे दस स्वर्ण मुद्राएँ दीं और कहा,
“तुम्हारी हालत ठीक नहीं लगती। ये मुद्राएँ रख लो और मुझे बताओ कि राजगुरु के घर क्या योजना बनी थी।”
पहले तो सोमदत्त डर गया, लेकिन तेनालीराम के भरोसा दिलाने पर उसने सारी सच्चाई बता दी।
अब तेनालीराम को राजगुरु की चाल का पूरा पता चल चुका था।
मंगलवार का दिन आया। तेनालीराम सुबह स्नान करके राजगुरु के घर पहुँचा और उनके दिए हुए सुंदर वस्त्र पहन लिए। राजगुरु ने उसे सौ स्वर्ण मुद्राएँ दीं और बैठने को कहा। तभी शिष्य बनाने की विधि के लिए शंख और लोहे का चक्र आग में गरम किया जा रहा था।
जैसे ही वे पूरी तरह गरम हो गए, तेनालीराम अचानक खड़ा हुआ। उसने पचास स्वर्ण मुद्राएँ राजगुरु की ओर फेंकते हुए कहा,
“आधी ही बहुत हैं, बाकी आप रख लीजिए।”
इतना कहकर वह वहाँ से तेजी से भाग गया।
राजगुरु और बाकी ब्राह्मण भी गरम शंख और लोहे का चक्र लेकर उसके पीछे दौड़ पड़े। रास्ते में यह अजीब दृश्य देखकर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।
भागते-भागते तेनालीराम सीधे राजा कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचा और बोला,
“महाराज, मुझे न्याय चाहिए! राजगुरु मुझे अपना शिष्य बना रहे थे, लेकिन मुझे अचानक याद आया कि मैं उनका शिष्य नहीं बन सकता क्योंकि मैं निम्न कोटि का ब्राह्मण हूँ। इसलिए आधी विधि होने के कारण मैंने पचास स्वर्ण मुद्राएँ रख लीं और बाकी उन्हें लौटा दीं। लेकिन फिर भी वे मुझे दागने के लिए मेरे पीछे पड़े हैं।”
इतने में राजगुरु और ब्राह्मण भी वहाँ पहुँच गए।
राजा कृष्णदेवराय ने जब राजगुरु से सच्चाई पूछी, तो उन्हें मजबूर होकर स्वीकार करना पड़ा कि तेनालीराम वास्तव में उनका शिष्य नहीं बन सकता।
राजा सब समझ चुके थे। वे मुस्कुराए और बोले,
“तेनालीराम की ईमानदारी और बुद्धिमानी के लिए उसे पुरस्कार मिलना चाहिए।”
यह कहकर राजा ने तेनालीराम को एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दे दीं।
इस तरह राजगुरु और ब्राह्मणों की चाल उन्हीं पर भारी पड़ गई, और तेनालीराम अपनी बुद्धि से फिर एक बार सब पर भारी साबित हुआ।
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